कहानी : हमशक्ल | STORYBOX WITH JAMSHED

कैसा हो अगर कभी कहीं घूमते हुए किसी सुनसान जगह पर आपको मिल जाए आपका एक 'हमशक्ल' जिसकी आवाज़ भी आपकी जैसी ही हो. बातचीत में पता चलता है कि उसका और आपका शहर भी एक ही है और उसकी जेब में उतने ही पैसे जितने आपके हैं. आप की पहली प्रेमिका के नाम से लेकर, कॉलेज में आए नंबर तक सब कुछ एक जैसा है... ऐसे में क्या आप जानना चाहेंगे कि ये अजनबी कौन है और आप दोनों के बीच इतनी समानताएं क्यों हैं? कहीं ये कोई साज़िश तो नहीं, जो कहानी को क़त्ल तक ले जाती है… सुनिये सत्यजीत रे की लिखी थ्रिलर कहानी 'हमशक्ल' स्टोरीबॉक्स में जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से

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Jamshed Jamshed

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • नोएडा,
  • 10 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:27 PM IST

कहानी: हमशक्ल
ओरिजिनल कहानी: रतन बाबू आर सेई लोकता
 

रतन बाबू ने ट्रेन से उतरकर प्लेटफार्म पर कदम रखा और पूरे स्टेशन पर एक गहरी नज़र डाली। इस स्टेशन पर वो पहली बार आए थे। सामान के नाम पर रतन बाबू के पास एक छोटा सा बिस्तर और एक चमड़े का सूटकेस था, तो कुली की जरूरत थी नहीं। वो सामान लेकर स्टेशन से बाहर आए और एक रिक्शे वाले को आवाज़ दी... “सुनो”
रिक्शे वाले ने रिक्शा रोका “जी साहब, कहां जाना है” (बाकी की कहानी नीचे लिखी है लेकिन अगर आप इसी कहानी को अपने फोन पर SPOTIFY APPLE PODCAST पर सुनना चाहते हैं तो नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें)

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बाकी की कहानी यहां नीचे पढ़ें - 

“आ...वो क्या नाम था... हां, महामना होटल जानते हो”
“अरे बिल्कुल जानते हैं, महामना होटल तो अक्सर सवारियों को छोड़ते हैं, बैठिये”

रतन बाबू रिक्शे पर बैठकर महामना होटल चले गए… वो घूमने के बड़े शौकीन थे। वैसे तो 24 साल से Geological Survey of India के कलकत्ता दफ्तर में क्लर्क थे। लेकिन पूरी साल अपनी छुट्टियां बचाते थे और फिर दुर्गा पूजा की छुट्टियों को साथ मिलाकर साल में एक महीने की छुट्टी लेते थे और किसी अंजान और अजनबी जगह पर अकेले निकल जाते... उन्हें अकेले ही घूमना पसंद था। और वैसे भी, वो जैसी जगहों पर जाते थे, वहां कौन उनके साथ जाएगा… लोग तो जाते हैं मशहूर जगहों पर… जहां फोटो वोटो खिंचवा सकें, जहां सैलानी आते हों, टैक्सी और बड़े होटलों की सुविधा हो ... रतन बाबू जाते थे ऐसी अजनबी जगह जहां बड़ी मुश्किल से छोटा सा रेलवे स्टेशन होता था और होटल तो छोटा मोटा भी बड़ी मुश्किल से मिलता था... ज़्यादातर लोगों ने उस जगह का नाम भी नहीं सुना होता था…  उन्हें ऐसी ही कम-एक्सप्लोर्ड जगहें घूमने में मज़ा आता था।

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इस बार रतन बाबू ने टाटा नगर से 15 मील दूर शिनी नाम के एक कस्बे में जाने का फैसला किया था। शिनी का नाम रतन बाबू के एक सहकर्मी मुकुल मित्रा ने उन्हें बताया था। उन्होंने ही रतन बाबू को महामना होटल में ठहरने का सुझाव भी दिया था। रतन बाबू को होटल भी ठीक ही लगा... बहुत सुविधाएं उन्हें चाहिए भी नहीं थी... ठंड का मौसम था तो नहाने गर्म पानी मिल जाता था… एक हेल्पर भी था वहां सेवक नाम का। वो दौड़ दौड़ कर काम करता था।

तो बहरहाल, रतन बाबू होटल में अपना सामान वगैरह रख कर, थोड़ा आराम करके फिर शाल लपेट कर शिनी में घूमने निकल गए। वो खूबसूरत इलाका था... हरियाली और छोटे पहाड़ों से घिरा हुआ... रास्ते ऊबड़ खाबड़ थे... जो उस समय हल्के कोहरे से धुंधलाए हुए थे। गहरी खामोशी थी वहां... उस रास्ते से गुज़रते हुए वो काफी दूर निकल आए... एक तालाब था जो नीले कमलों से भरा हुआ था और तालाब के चारों तरफ कई तरह के परिंदे उड़ रहे थे। रतन बाबू ने उनमें से कुछ परिंदों को तो पहचान लिया। जैसे सारस, चिराइया, नीलकंठ लेकिन कुछ नई परिंदे थे... जिन्हें उन्होंने पहली बार देखा था... उनकी आवाज़ें कुछ अजीब तरह की थीं…

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ख़ैर, रतन बाबू देर शाम तक उस जगह पर बैठे रहे… जब उठे और वहां से वापस होटल आ गए।

अगली सुबह वो फिर थोड़ा जल्दी ही होटल से निकले... और फिर से एक अजनबी रास्ते पर निकल गए.... लगभग एक मील चलने बाद, उन्हें एक जगह पर रुकना पड़ा क्योंकि बकरियों का एक झुंड सामने से आ रहा था... जैसे ही रास्ता खाली हुआ, वो आगे बढ़े और लगभग 5 मिनट बाद उन्हें एक लकड़ी का पुल दिखाई दिया। वो पुल पर गए रुक गए। पूरब की तरफ एक रेलवे स्टेशन था। ट्रेन की पटरियां इस पुल के नीचे से गुज़र रही थीं... यानि ट्रेन पुल के नीचे से जाती होगी।

अभी रतन बाबू पुल पर खड़े ही थे… कि तभी उस सुनसान जगह पर एक आदमी आकर उनसे कुछ दूर उसी पुल पर खड़ा हो गया। रतन बाबू ने देखा तो थोड़ा चौंक गए। उस आदमी ने धोती और कमीज पहनी हुई थी और कंधे पर गहरे पीले-भूरे रंग का शॉल था। चश्मा लगाया हुआ था और पैरों में भूरे रंग के कैनवस के जूते थे। उम्र उनसे कुछ चार-पांच साल कम होगी... उस आदमी ने रतन बाबू को देखकर हैलो में हाथ हिलाया… इन्होंने नकली मुस्कुराहट दी… और करीब आकर ग़ौर से उसका चेहरा देखा... तो चौंक गए.... उसका चेहरा वैसा ही था जैसे वो खुद थे पाँच साल पहले…

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हां बस फर्क सिर्फ इतना था कि इसका रंग थोड़ा अलग था। वह थोड़ा ज़्यादा गोरा था। भौंहें थोड़ी घनी थीं और सिर के पीछे के बाल थोड़े लंबे थे।

यहां पहली बार आए हैं, मैं भी पहली बार आया हूं,” उसने कहा, तो रतन बाबू को एक और झटका लगा। ये तो बिल्कुल उन्हीं की आवाज़ थी... ये हैरान रह गए... ऐसा लग रहा था कि कोई नाटक चल रहा है।

"मेरा नाम मनीलाल मजूमदार है, आप न्यू महामना में रुके हैं ना?" रतनलाल और मनीलाल – नाम भी एक जैसे।
“हां, मैं आ.. वहीं रुका हूं... पर मुझे नहीं लगता मैं आपको जानता हूं”
मनीलाल बोला, “हां आप मुझे नहीं जानते पर मैंने आपको देखा है एक बार... पिछले साल आप घोलिया में था ना”
रतन बाबू की भौंहें तन गईं, “आप भी वहीं थे””
जी मैं हर साल दुर्गा पूजा में जाता हूं... असल में मुझे अकेले घूमना अच्छा लगता है और मैं ऐसी जगहों पर जाता हूं जो कम मशहूर हो

रतन बाबू को थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि अकेले ऐसी जगहों पर घूमना तो उन्हें भी पसंद है। वो आगे बोला, “दरअसल, मेरे एक कुलीग ने मुझे शीनी देखने का सुझाव दिया था। अच्छी जगह है ये, नहीं?”

रतन बाबू ने थूक निगला शिनी का सुझाव उनके भी एक दोस्त ने ही तो दिया था... ये क्या चल रहा था... जैसे कोई नाटक हो... रतन बाबू के काम गर्म हो रहे थे… ऐसा लग रहा था कि कोई ड्रामा चल रहा हो।

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वो अजनबी बहुत ही आराम से खड़ा था, बिल्कुल नार्मल... फिर उसने पुल से एक तलाब की तरफ इशारा करते हुए कहा, “आपने तालाब का वह किनारा देखा है, वहां शाम को बहुत सारे परिंदे इकट्ठा होते हैं?”

ये बोले, “हां, मैंने देखा है... मैं कल शाम था वहा पर
अच्छा, “इत्तिफाक से मैं भी गया था वहां, लेकिन वहां कुछ परिंदो को तो मैंने पहचान लिया कुछ शायद प्रवासी थे... उनकी आवाज़ भी अजनबी थी... मैं नहीं पहचान पाया

रतन बाबू... का सर चकरा रहा था... ये.. ये क्या हो रहा था? तभी उन्हें ट्रेन की घड़घड़ाहट की आवाज़ सुनाई दी। दोनों ने देखा तो दूर सामने दिख रही ट्रेन की पटरियों पर ट्रेन चली आ रही थी... दोनों जल्दी से पुल की रेलिंग के पास आ गए… क्योंकि ट्रेन पुल के नीचे से गुज़रनी थी। रतन बाबू को आती-जाती ट्रेन देखना बचपन से पसंद था।

कुछ देर में डिब्बा गड़गड़ाता हुआ आया और तेज़ी से पुल के नीचे से गुज़र गया। दोनों आँखों से ओझल होने तक उसे देखते रहे। मनीलाल बोला, "कितनी अजीब बात है! इस उम्र में भी ट्रेनों का आना-जाना मुझे उतना ही रोमांचित करता है" रतन बाबू ने उसे अबकी शक से देखा... और सोचा ये कौन है जो... बिल्कुल मेरी ज़िंदगी जी रहा है... कहीं ये कोई पैरलल दुनिया से आया कोई शख्स तो नहीं… इतनी चीज़ें कॉमन कैसे हो सकती हैं… कहीं कोई मेरे साथ मज़ाक तो नहीं कर रहा… वो अब मनीलाल मजूमदार से कुछ कुछ घबराने लगे थे। वो मशकूक लग रहा था, संदिग्ध लग रहा था।

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ख़ैर, कुछ देर के बाद वो लोग लौटने लगे... तो लौटते हुए मनीलाल ने बताया कि वो तीन दिन पहले शिनी आया है और कलिका होटल में ठहरा है। उसका घर कलकत्ता में था जहाँ वो एक ट्रेनिंग कंपनी में काम करता है। रतन बाबू को ये राहत हुई कि वो कम से कम उसी महामना होटल में नहीं है जहां वो ठहरे हैं, और उसकी नौकरी भी अलग कंपनी में है। पर इतनी सारी चीज़ें कॉमन हो गयी थीं कि अब रतन खुद जानबूझ कर ऐसी ऐसी चीज़ें पूछ रहे थे ताकि देख सके कि ये भी कॉमन तो नहीं, बोले,

मनी बाबू, वैसे पूछना तो नहीं चाहिए, लेकिन कितनी तनख्वाह है आपकी

अरे साहब, क्या तनख्वाह, बस दाल रोटी चल जाती है
“नहीं मतलब फिर भी”
“अरे पूछ ही रहे हैं तो ये समझ लीजिए कि ₹437 हर महीने मिल जाते हैं”
सुनते ही रतन बाबू अचानक चलते-चलते ठहर गए।

क्या हुआ, रुक क्यों गए
नहीं, वो... कुछ नहीं चलिए

हाथ कांप रहे थे उनके... ये कैसे हो सकता है? बिल्कुल बराबर तनख्वाह... अगर ये झूठ भी बोल रहा तो सवाल ये है कि इसे मेरी तनख्वाह का पता कैसे चला... वो तो मैं किसी को भी नहीं बताता, रतन बाबू ने सोचा।

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एक कहावत है, शायद आप लोगों ने सुनी हो… कि दुनिया में एक ही शक्ल के सात लोग होते हैं। कहा जाता है कि उनकी ज़िंदगी के घटनाक्रम भी काफी हद तक मिलते-जुलते हैं। रतन बाबू जानना चाहते कि ये कहीं ये आदमी उन्हीं सात में से एक तो नहीं, जो इत्तिफाक से उन्हें मिल गया है। अब उनका खुद उस आदमी में इंट्रेस्ट जाग रहा था…

बोले, “सुनिये आप कलिका होटल में हैं ना... ऐसा करते हैं शाम को मिलते हैं... आठ बजे.. क्या ख्याल है

  • हां ठीक है, मिलते हैं… वैसे भी मेरा कोई दोस्त नहीं है… असल में मुझे जो चीज़ें पसंद आती हैं, वो किसी और को नहीं आती... थोड़ा विचित्र हूं मैं... पर आपके साथ अच्छा लग रहा है

रतन बाबू ने नकली मुस्कुराते हुए हां में सर हिलाया क्योंकि यही कहानी उनकी भी थी... उनके अजीब-ओ-गरीब शौक की वजह से उनका कोई दोस्त नहीं था। वो इसीलिए अकेले ही घूमते थे।

ख़ैर, शाम के वक्त दोनों मिले... जगन्नाथ रेसटोरेंट में... सामने मेज़ पर खाना था। और अब वो ये देखना चाहते थे कि आदमी खाने से पहले क्या उन्हीं की तरह दाल में नींबू निचोड़ेगा या नहीं...

मनीलाल ने दाल की महक नाक में भरते हुए कहा, “वाह खुश्बू तो बढ़िया है रतन बाबू” फिर अचानक दाएं बाएं देखा और होटल में काम करने वाले को आवाज़ दी, “अरे भाई साहब, नींबू... रख दीजिए सलाद में

रतनलाल को अब बेचैनी होने लगी… उन्होंने ग़ौर किया कि दूसरी टेबल्स पर बैठे लोग उनकी तरफ छुप छुप कर देखकर खुसर-फुसर कर रहे हैं

“देखो दोनों एक जैसे ही लग रहे हैं, जुड़वां होंगे...”

अब उन्हें घबराहट होने लगी थी... कहीं ये कोई फ्रॉड तो नहीं है... या कोई मेरे बारे में सारी बातें पता करके किसी साज़िश के तहत आया हो... मुझे लूटने... लेकिन फिर सोचा... क्या ही लूटेगा... बैंक में रकम नाम भर की है, किराए पर रहते हैं... भई कोई जालसाज़ी करेगा तो किसी फायदे के लिए करेगा ना... तो फिर ये कौन है... वो बेमन से खाना खाते हुए उसे घूरते रहे। कुछ देर बाद दोनों ने विदा ली और अगली सुबह फिर मिलने के वादे के साथ अपने-अपने होटल की तरफ चले गए।

रतन बाबू को एक डर ये भी था कि अगर वो उसकी हकीकत जाने बगैर अलग हो गए... और फिर उससे कभी नहीं मिले... तो वो पूरी ज़िंदगी बेचैन रहेंगे... इसलिए अगले दिन फिर मिलने का वादा किया था।

रात को होटल में उन्हें नींद नहीं आ रही थी... तकिया मुंह पर रखकर करवटें बदलते रहें… लेकिन एक एक बात याद आ रही थी कि होटल में खाना खाते हुए मनीलाल उन्हीं की तरह तर्जनी उंगली उठाकर खा रहा था... ये सब बातें उन्हें पागल कर रही थीं… वो पूरी रात मुशकिल से दो-एक घंटे सोए होंगे।

ख़ैर, किसी तरह सुबह हुई... सेवक से गर्म पानी मंगाया... नहाया धोया... चेक वाला कुर्ता पहना और अपनी जेब में एल्यूमीनियम की चमकीली सी डिबिया रखी जिसमें वो सुपारी रखा करते थे। और सूजी हुई आंखें लिए हुए होटल से बाहर निकले... तो उन्हें सामने से मनीलाल आता दिखा... और आते ही पहली बात पता है क्या बोले,
गुड मार्निंग, कैसे हैं रतन बाबू... यार कल रात तो मुझे नींद ही नहीं आयी.. बस समझ लीजिए मुश्किल से दो एक घंटे सोया होगा… पता नहीं क्यों... शायद कल खाने के बाद वाली चाय ज़्यादा ही स्ट्रांग पी थी.. ख़ैर आइये चले

रतन बाबू और मनीलाल सामने वाली सड़क पर पैदल जाने लगे। कुछ दूर पर एक मेला लगा था... वो लोग वहीं जाने वाले थे। रास्ते में एक गली से होकर निकले तो खंबे की टेक लगाकर खड़े कुछ लोफर टाइप लड़कों ने उनको हैरानी से देखा और फिर आपस में हंसते हुए बोले, “अबे ये तो एक जैसे लग रहे हैं बिल्कुल.. हैं देखो तो... एक नागनाथ दूसरा सापनाथ” और लड़के ज़ोर से हसने लगे।

बुरा लगा रतन बाबू को... लेकिन वो खुद ऐसे रहस्य में उलझे थे कि नज़रअंदाज़ कर दिया। ख़ैर थोड़ी देर में मेले पहुंचे... पता चला कि शिनी इलाके में आज़ादी के पहले से हर साल एक बड़ा मेला लगता था… काफी चहल-पहल थी। फलों, सब्जियों, बर्तनों, कपड़ों की दुकानें थीं और मवेशियों की भी खरीद-बिक्री हो रही थी। गाने बज रहे थे... एक किनारे करतब हो रहे थे... दुकाने देखते देखते रतन बाबू और मनीलाल अलग अलग हो गए... रतन बाबू भीड़ में अकेले घूम रहे थे कि तभी भीड़ में एक चेहरा देखकर वो चौंक गए…

ऐ... सेवक... तुम यहां क्या कर रहे हो” ये तो वही होटल वाला लड़का था... उन्हें देखकर वो ऐसे हो गया जैसे कोई चोरी पकड़ ली गयी...

“आ... कुछ नहीं ... मैं तो बस... मेले आ गया था... मेला देखने आया था.. आप घूमिये... मैं उधर जा रहा हूं कुछ काम है”

उन्हें कुछ अजीब लगा... पर ये कोई इतनी बड़ी बात नहीं थी… सेवक यहीं रहता है… पूरा गांव आया है मेले में तो वो भी आ सकता है... वो आगे बढ़ गए। मेले में घूमते हुए वो सोच रहे थे कि वो हमेशा सोचते थे कि काश कोई उनका भी दोस्त होता, काश कोई उनकी तरह होता... लेकिन अब एक मिला है तो ये उसके साथ घूमना भी पसंद नहीं कर रहे हैं। उससे बात करने में लग रहा है कि खुद से बात कर रहे हैं। इसका मतलब तो ये हुआ कि हमें दोस्ती, अपने जैसों से नहीं... ऐसे लोगों से करनी चाहिए जो अलग तरह सोचते हों... जिनमें कभी-कबार इख्तिलाफ भी हों.. दोनों एक से होंगे तो ज़िंदगी में रंग ही क्या बचेगा...

टहलते-टहले रतन बाबू मेले में एक छड़ी की दुकान पर पहुंचे... वो लंबे वक्त से एक छड़ी खरीदना चाहते थे दुकानदार से मोलभाव करके बात बनी नहीं... उन्हें लगा कि ज़्यादा महंगी बता रहा है… अच्छा मनीलाल उन्हें मोलभाव करते हुए देख रहा था… कुछ देर बाद... वो रतन बाबू के सामने आया, हाथ में दो छड़िया लिए हुए... बोला, "लीजिए, मुझे उम्मीद है कि अब आप इसे हमारी दोस्ती की निशानी के तौर पर लेने से मना नहीं करेंगे।"
- अरे नहीं, मैं तो बस देख रहा था…
- कोई बात नहीं, मैंने भी एक ली है... ये हमारी दोस्ती की निशानी है... लीजिए

यहां तक तो मामला ठीक-ठाक था… लेकिन मेले से लौटते हुए... जब पुराने समय की बातें हुईं... तो रतनलाल का दिमाग़ खराब होने लगा… क्योंकि मनीलाल ने उन्हें अपने कॉलेज के दिनों के बारे में ऐसी ऐसी बातें बताईं जो बिल्कुल उन्हीं की तरह थीं। मां-बाप का नाम, बचपन की घटनांए, प्रेमिकाएं, सब कुछ हूबहू।

रतन बाबू के कनपटी से पसीना बह रहा था… ऐसा लग रहा था कि जैसे उनकी अपनी ज़िंदगी आंखों के सामने चल रही हो... वो डर रहे थे कि ये आदमी तो अब उन्हें वापस कलकत्ता जाकर भी मिलेगा… और एक अजीब सी कैफियत हमेशा रहेगी… एक आदमी दो ज़िंदगी जीता हुआ.. या दो आदमी एक ज़िंदगी...

आज रात उन्हें फिर रतन बाबू को नींद नहीं आई... उनके अंदर मनीलाल को लेकर न जाने क्यों एक नफरत सी उभरने लगी... सीधी साधी ज़िंदगी थी उनकी... इस आदमी ने सब गड़बड़ कर दिया। रतन बाबू का दिमाग़ी तवाज़ुन खोने लगा था… वो उस आदमी से छुकारा पाना चाहते थे… वो पागल होने लगे थे… और इसी पागलपन में उन्होंने एक खतरनाक फैसला कर लिया… एक बेहद खतरनाक फैसला... उसका कत्ल करने का...

रतनबाबू ने योजना बनाई... मनीलाल को उसी पुल पर बुलाया... जिसके नीचे से ट्रेन गुज़रती थी... मनीलाल को गुज़रती ट्रेन देखना पसंद था ही, वो आ गया। दोपहर करीब ढाई बजे दोनों उस पुल पर खड़े थे। मौसम सर्द था… कोहरे से दूर का आधा पहाड़ ढक गया था। दोनों रेलिंग के सहारे खड़े हो गए... रतन बाबू ने चुपके से अपनी कलाई घड़ी पर नज़र डाली… ट्रेन आने में अभी बारह मिनट थे। नार्मल दिखने के लिए उन्होंने जम्हाई ली… तभी मनीलाल ने उन्हें देखा और अपनी जेब से एक एलमुनियम की चमकीली सी डिबिया निकाली... जिसमें सुपारी थी...

ये बिल्कुल वैसी ही डिबिया थी… जो रतन बाबू की जेब में भी थी… लेकिन अब रतन बाबू हैरान नहीं हुए... मनीलाल ने उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “लीजिए थोड़ी सुपारी खाइये” रतन बाबू ने डिबिया से थोड़ी सुपारी निकाली ज़रूर लेकिन खाई नहीं, नज़र बचाकर फेक दी और डिबिया लौटा दी। मनीलाल ने अपनी डिबिया अपनी जेब में रखते हुए कहा, “आने ही वाली होगी ट्रेन” कुछ देर बाद दूर से ट्रेन का हार्न सुनाई दिया। रतन बाबू की आंखे लाल हो रही थीं। ट्रेन करीब आ रही थी, शोर तेज़ हो रहा था... रतन बाबू की आंखें खून सी लाल हो रही थीं... ट्रेन का शोर और उनके मन का शोर बढ़ रहा था... उन पर एक पागलपन सवार हो रहा था… चेहरे पर शैतानी भाव लाते हुए वो मनीलाल के करीब आए... ट्रेन अभी थोड़ी दूर थी... वो मनीलाल के पीछे हुए... कि तभी प्लैटफ़ॉर्म के किनारे एक साइकिल की घंटी की आवाज़ सुनाई दी...

देखा तो एक साइकल सवार उधर से गुज़र रहा था... रतन बाबू संभल हए। साइकिल सवार तेजी से उनके पास से गुजरा और सड़क के दूसरी ओर बढ़ते अंधेरे में गायब हो गया। ट्रेन और करीब आ गई थी। रफ्तार तेज़ हो रही थी। कुछ ही पलों में पुल कांपने लगा। मनीलाल बाबू दोनों हाथों से रेलिंग पकड़े नीचे देख रहे थे। आसमान में बिजली चमकी और रतन बाबू ने अपनी पूरी ताकत जुटा ली। पीछे हुए अपनी हथेलियाँ मनीलाल बाबू की पीठ पर फैला दीं, गहरी सांस ली। और ज़ोर का धक्का दिया... मनीलाल का जिस्म चार फुट ऊंची रेलिंग से होते हुए और अचानक नीचे पटरी पर गिर गया.... और ठीक उसी वक्त.... ट्रेन उस पर से गुज़र गयी।

ट्रेन गयी... और खामोशी पसर गई… गहरी खामोशी... जैसे कुछ नहीं हुआ... रतन बाबू ने गले में शॉल कसा और चल दिए। कुछ देर बाद वो लगभग हांफते हुए होटल में दाखिल हुए। लेकिन होटल में दाखिल होते ही उन्हें अजीब लगा… ये किस होटल आ गए वो.... ये तो किसी गलत होटल में आ गए…

भैय्या ये कौन सा होटल है?” उन्होंने रिसेप्शन पर खड़े शख्स से पूछा तो वो बोला, “कलिका होटल” कलिका... नाम सुनकर गए .... ये तो... ये तो मनीलाल का होटल है… मैं यहां कैसे आया… मुझे तो महामना होटल जाना था। वो घबराए... और चलने के मुड़े ही थे कि एक आदमी जिसने हरे रंग की शॉल ओढ़ी थी... जो उसी होटल में काम करता था... हाथ में चाय लिये हुए आया और बोली, “मनी लाल बाबू लीजिए चाय पीजिए, बारिश का मज़ा बिना चाय के कहां आता है.. लीजिए”

रतन बाबू हड़बड़ाए... “माफ कीजिए... मेरा नाम रतन है... मैं मनीलाल नहीं हूं”

  • अरे क्या मज़ाक कर रहे हैं आप सर.
  • मैं क्यों मज़ाक करूंगा… मैं तो इस होटल में हूं भी नहीं... मुझे जाना है यहां से...

कहते हुए वो वहां से तेज़ी से निकल गए। अब उनपर घबराहट तारि हो रही थी और वो सोच रहे थे कि किसी ने उन्हें ये जुर्म करते देखा तो नहीं... आज नहीं तो कल मनीलाल की लाश पटरी से मिलेगी ही.... वो साइकल सवार कौन था... उसने मुझे आखिरी बार वहां देखा था... लेकिन इतना कोहरे में वो पहचान तो नहीं पाया होगा…

ख़ैर... किसी तरह अपनी होटल पहुंचे और बिल्कुल सामान्य रहे... अब उन्हें सुकून मिल रहा था… अब फिर से उनका कोई दोस्त नहीं था… कोई उनकी तरह नहीं था… सब पहले जैसा था… वो अपनी तरह अकेले थे… जैसे सब लोग होते हैं। बाहर बिजली कड़क रही थी, हल्की बारिश भी थी… और रतन बाबू बहुत दिनों बाद सुकून से सोए… बहुत अच्छी नींद आई उन्हें…

सुबह उठे तो बड़ी सी अंगड़ाई ली… आज बहुत फ्रैश महसूस कर रहे थे... तभी कमरे में दस्तक हुई तो सेवक आया था… ट्रे में चाय लेकर...

नमस्ते साहब, लीजिए चाय लीजिए....
चाय रखते हुए सेवक की नज़र कमरे के एक कोने पर गई और उसने पूछा...
"ये छड़ी आपने मेले से ली थी?”
आ... हां, हां वहीं ली थी... तुम भी तो थे..
जी था... तो कितने की ली थी ये
अब रतन बाबू, मनीलाल का ज़िक्र नहीं करना चाहते थे… बोले, “पांच रुपये की ली थी
अच्छा... कहते हुए वो चला गया।

अब वो कहते हैं ना कि कातिल एक बार मौका ए वारदात पर ज़रूर जाता है... रतन बाबू मौका-ए-वारदात पर तो नहीं लेकिन कलिका होटल के पास ज़रूर गए... ये पता करने के लिए कि क्या बातचीत हो रही है।

होटल से कुछ दूर खड़े होकर उन्होंने देखा कि वहां लोग बातें कर रहे थे… ज़्यादातर लोगों का यही मानना था कि मनीलाल ने पुल से छलांग लगा दी... और अपनी जान दे दी। मनीलाल बाबू का शव पुल के नीचे रेलवे ट्रैक के पास मिला था। वो घुंघराले बाल वाला आदमी जिसने रतन बाबू को मनीलाल समझकर चाय दी थी... वो लोगों से कह रहा था, “अजीब तरह का आदमी था, किसी से बात नहीं करता था। यहाँ किसी को नहीं जानता था”

रतन बाबू को सुकून हुआ और वो वापस लौट आए.... होटल आकर खाना खाया और कल पहने हुए कपड़े धोने के लिए सेवक को देते हुए अचानक ठहर गए.... उन्होंने देखा कि कमीज़ का एक बटन टूटा हुआ है…

आ.. सेवक ऐसा करो... ये वाली कमीज़ रहन दो... बाकी कपड़े ले जाए.. ये अभी एक बार और चल जाएगी” सेवक ने हैरानी से देखा... पर उसने वैसा ही किया। उसके जाते ही रतन बाबू ने जल्दी से कमीज़ देखी… ज़रूर कल मनीलाल को धक्का देते हुए पुल पर टूट गया होगा... उन्होंने बहुत जासूसी कहानियां पढ़ी थीं जिनमें कातिल बटन से पकड़ा जाता है। वो फौरन होटल से निकले और पास मे एक दर्ज़ी की दुकान ढूंढी.. उससे कमीज़ में नया बटल लगवाया... लेकिन काम अभी भी अधूरा था... क्योंकि टूटा हुआ बटन पुल पर पड़ा होगा... उसे भी उठाना ज़रूरी था।

शाम हो रही थी... रतन बाबू हड़बड़ाते हुए पुल के पास लगभग हांफते हुए पहुंचे… गहरी खामोशी थी.... दूर तक कोई नहीं था... उन्होंने इधर-उधर देखा लेकिन बटन तो नहीं दिखा पर हाँ... पुल की रेलिंग के किनारे लकड़ी की दरार में कोई चमकदार चीज़ पड़ी थी। रतन बाबू झुके और उसे बाहर निकाला। यह सुपारी से भरा एक छोटा गोल टिन का डिब्बा था। रतन बाबू मुस्कुराए। उन्होंने डिबिया उठाई और ऊपर से पटरी पर फेंक दिया। उन्हें डिब्बे के जमीन पर गिरने की आवाज सुनाई दी।

वो चलने को हुए कि तभी ट्रेन का हार्न सुनाई दिया... “इस वक्त” उन्होंने हैरानी से घड़ी देखी... वो रेलिंग पर टेक लगाकर खड़े हो गए… और इंजन के शाफ्ट पर लगे लैंप की तेज़ रोशनी को निहारने लगे। अचानक हवा का एक तेज़ झोंका आया और उनका शॉल उनके कंधे से हट गया। उन्होंने शॉल को फिर से ठीक से लपेट लिया। अब उन्हें ट्रेन की आवाज़ सुनाई दे रही थी। यह किसी आने वाले तूफान की हल्की गड़गड़ाहट जैसी थी। रतन बाबू को अचानक लगा जैसे कोई उनके पीछे खड़ा है। उन्होंने घबराकर पीछे देखा... कोई नहीं था। फिर से अपनी कोहनियों को रेलिंग पर टिकाया और ट्रेन को नीचे से गुजरते देखने के लिए आगे झुक गए। ठीक उसी वक्त.... पीछे से दो हाथ आए... वो हाथ किसके थे... पता नहीं... और रतन बाबू को ज़ोर का धक्का दिया। रतन बाबू चार फुट ऊंची रेलिंग के ऊपर से धड़ाम से नीचे गिर पड़े। और ट्रेन धड़धड़ाती हुई उनके ऊपर से गुज़र गयी।

ट्रेन गुज़री.... तो गहरी खामोशी फैल गई… जैसे कुछ नहीं हुआ... अब पुल खाली है.... आसमान अभी-अभी नीला हुआ है, लेकिन उनकी मौजूदगी के तौर पर पुल की लकड़ी की रेलिंग की दरार में एक छोटी सी चमकदार चीज़ फंसी हुई है। यह एक एल्युमीनियम की डिबिया है...

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---- समाप्त ----

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