कहानी - लखनऊ वाले वकील साहब
राइटर - जमशेद क़मर सिद्दीक़ी
हमारे पड़ोस में एक वकील साहब रहते थे... किसी वक्त में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत किया करते थे लेकिन ज़बान के बड़े माहिर आदमी थे। ‘स’ और ‘श’ का फर्क छोड़िए, वो तो क और क़ के भी पूरी पाबंद थे। कोई ग़लत उर्दू बोल दे तो चाहे कितना बड़ा आदमी हो उसे वहीं टोक देते थे, और कहीं कोई गरीब-कमज़ोर बोल दे तो उसे तो सुना ही देते थे... बल्कि उनकी इस सनक के बारे में ये किस्सा मशहूर था कि एक बार उन्होंने केस लड़ते हुए अदालत में अपने ही मुअक्किल को जेल करवा दे थी क्योंकि उसने जज साहब के सामने ‘गवाही’ को ‘ग़वाही’ बोल दिया था।
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तो ख़ैर... मुझे याद है कि वकील साहब... कि इलाके में चलती तो थी.. कोई छोटा-मोटा इज्तिमाई प्रोग्राम हो, कोई सियासी रैली हो, या कोई और मसला हो... वकील साहब को बुलाया जाता था। इसीलिए अक्सर वो शहर के किसी बड़े जलसे में मंच पर ख़ास लोगों के बीच बैठे दिखाई देते थे। और हां, अगर किसी ने मंच पर कोई ग़लत लफ्ज़ बोल दिया तो वहीं उसके पास जाकर माइक पर ही करेक्ट करने लगते थे, हज़ारों लोगों के बीच। उठकर जाएंगे कहेंगे... “देखिए भई आप ने कहा, खवातीन ओ हजरात... माफ कीजिएगा... खवातीन नहीं, ख़वा.. ख़..ख़..ये गले से निकलता है...”
वो... कहेगा... जी.. वो... समझ गए...
- नहीं नहीं, बोलिए तो… ऐसे कीजिए... ख़ख़..
इस हद तक की सनक थी वकील साहब में सही तलफ़्फुज़ की...
मेरे बड़े अज़ीज़ थे... मैं जब अपनी थीसिस कमप्लीट कर रहा था मीर तक़ी मीर पर तो अक्सर उनसे मुलाकात करने जाता था। बड़े महरबान थे, शफ़कत थी उनमें बहुत… अपने बेटे की तरह पढ़ाते थे... मदद करते थे। जब भी घर जाता था तो अपने उसी किताबों वाले कमरे में कत्थई रंग का गाउन पहने हुए कुर्सी पर बैठे पाइप पीते रहते थे... वहां उनके एक दोस्त महेंद्र सिंह... अग्रीकलचर डिपार्टमेंट में शायद हेड क्लर्क थे... वो हमेशा बैठे मिलते थे। “भई ये हमारे दोस्त हैं महेंदर” वो महेंदर ही कहते थे... कहते “भई ये भई शायरी सुख़न है... इनसे भी कुछ मदद लेना चाहो तो ले सकते हो” मैं उन्हें नमस्ते करता था... महेंद्र साहब मुस्कुराकर जवाब देते।
एक बार मैं उसे मिलने गया... तो वकील साहब बड़े खुश थे... बेड पर लेटे थे... बीमार चल रहे थे... बगल में कुर्सी पर महेंद्र अंकल बैठे थे टीवी पर ख़बरें चल रही थीं... मैं जैसे ही दाखिल हुआ तो मैंने सुना बोले, “अरे ये टीवी वाले कैसे गधे होते हैं... देखो कह रहे हैं हम इस पर खुलासा करेंगे... अरे खुलासा का मतलब होता है समरी या किसी बात का निचोड़ या संक्षेप में पूरी बात कहना... ये लोग खुलासा का मतलब समझते हैं राज़फाश करना... हमेशा गलत इस्तेमाल करते हैं.... बेवकूफ लोग” तभी मुझे देखा... “अरे आओ आओ जमशेद मियां क्या हाल है, भई बड़े मुबारक दिन पर आए हो” मैंने कहा “अरे वाह, बताइये क्या खुशखबरी है” कहने लगे “अरे भई महेंदर ने हमाई छोटी बेटी इरम के लिए रिश्ता लगाया है, लड़का अमीनाबाद डाकखाने में है, खानदान भी अच्छा है... तो हमने बुलाया है परसों घर पर.. तुम भी आ जाना” मैंने कहा, “अरे बिल्कुल ये भी कोई कहने की बात है.. मैं हाज़िर हो जाऊंगा सर” अच्छा कुछ देर के बाद मैंने उनसे इजाज़त ली और मैं घर से निकलने को हुआ तो जैसे ही उनके कमरे से निकला तो देखा कि बाहर वाले कमरे में इरम खड़ी थी आंखों में आंसू लिये हुए। अब क्योंकि उस घर में मेरा बहुत सालों से आना-जाना था और इरम मेरी छोटी बहन जैसी थी... तो मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो उसने कहा, “ये शादी मुझे नहीं करनी” मैंने कहा, “लेकिन क्यों क्या तुम्हें ये लड़का जो महेंद्र अंकल ने बताया है ये तुम्हें पसंद नहीं” इरम सर झुकाए खड़ी रही, फिर बोली, “मुझे कोई और पसंद है.. उसका नाम शाहरुख है.. शाहरुख सिद्दीक़ी” मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी... मैंने कहा कि ‘बस इतनी सी बात? अरे तुम बिल्कुल परेशान मत हो... वकील साहब को मैं जानता हूं वो बहुत प्रोग्रेसिव हैं... मैं बात करता हूं... तुम फिक्र मत करो.. पर ऐसा करो कि एक बार मुझे उससे मिलवा दो ताकि मैं कह सकूं कि मेरा जानने वाला है तो तुम्हारे पापा के लिए भरोसा करना आसान हो जाएगा’ इरम मान गयी... मिलने का वक्त अगली दोपहर... वो रकाबगंज की ढलान के पास एक कबाब पराठे की दुकान है… थोड़ा ऊपर सीढ़ियों पर चढ़कर दुकान है... वहीं मुलाकात हुई।
मैं और इरम मिलने पहुंचे तो शाहरुख सिद्दीक़ी वहां पहले से मौजूद था… लेकिन जब गौर से देखा ... एक अजीब सा लड़का था... वो रील-वील बनाते थे, वहीं उनका काम था... सेहत ऐसी थी कि लगता था कि खाने-पीने से कोई खास रिश्ता नहीं है… बिल्कुल दुबले-पलते... लेकिन थे स्टाइलिश... वो जो होते हैं ना... पतली-पतली जींस पहनते हैं घुटन्ने जैसी, बालों की एक लट नीली करवाए रहते हैं और इधर एक भवों पर बाली छिदवाए रहते हैं... यहां साइड में गर्दन पर DEVIL लिखवाए थे…
मैं थोड़ा घबराया कि गलत बयाना ले लिया मैंने भी… अब ये माल तो इतना खराब है कि वकील साहब को कैसे बेचूंगा… ख़ैर.. मैंने हाथ बढ़ाया, उसने भी हाथ बढ़ाया… लेकिन हाथ ऐसे बढ़ाया...यूं... लेकिन ख़ैर मैं सच बताऊं.. यहां तक भी मैंने सोचा था कि मैं वकील साहब से बात कर लूंगा... समझा लूंगा कि भई आजकल की नस्ल है… अब यही सब चल रहा है… और मुझे यकीन था कि वो आज़ाद ख़्याल आदमी हैं लेकिन उन्होंने जब हाथ बढ़ाते हुए अपना नाम लिया तब मेरी सांसे अटक गयीं... बोले, “सारुख.. सारुख सिद्दीक़ी”
तभी उस पचरंगे लड़के ने आगे कहा, “साम को इस दुकान में बहुत भीड़ होती है, सीरमाल यहां की बहुत मसूर है” मेरा वक्त हो गया आउट... मन में सोचा कि इस आदमी के लिए तो अल्लाब मियां भी पैरवीं कर दें तो भी वकील साब न मानें
ख़ैर थोड़ी बातचीत की मैंने कहने लगे, “सर, हम इंश्टाग्राम की रील बनाते हैं... सुरु तो सौक-सौक में किये थे लेकिन अब समझ लीजिए यही हमाई शैलरी है... तीन लाख इंश्टा पर है, सत्तर हजार जू टूब पर... बाकी सर हम बहुत सरीफ आदमी है... ऐसा वैसा सौक है नहीं, सराफत से जिंदगी गुजारते हैं... आप को हम अपनी रील भेजेंगे सेयर कर दीजिएगा.. मेरी आईडी सो मैन साहरुख के नाम से है”
मैंने इरम की तरफ देखा... उसने मेरी तरफ बेचारगी से देखा जैसे कह रही हो... अब क्या बताएं जमशेद भाई... दिल साहरुख पर आ गया है तो शाहरुख खान क्या चीज़ है। ख़ैर अब जो भी कहिए भाई... मामला था तो बड़ा मुश्किल... लेकिन इरम से वादा था... तो ख़ैर कोशिश तो करनी ही थी। लेकिन कैसे....
पता नहीं... हमने सोचा कि चलिए ऐसा करते हैं कि मिलवा के देख लेते हैं… हो सकता है अपनी बेटी का मन रखने के लिए वकील साहब तैयार ही हो जाएं... औलाद की मुहब्बत से बड़ी चीज़ क्या है दुनिया में.... तो ख़ैर... जाकर हमने वकील साहब से बता दिया कि भई इरन ने एक लड़का पसंद किया है, आप एक बार मिल लें... वो वाकई थे प्रोग्रेसिव आदमी बोले, “अरे बिल्कुल, उसने पसंद किया है तो साहिब ए ज़बान, पढ़ा लिखा आदमी ही होगा... मिल लेते हैं... उसमें क्या है” तो अगले इतवार का दिन तय हो गया…
अब साहब ये बात महेंद्र जी को तो बुरी लगी ही क्योंकि पहले वाला रिश्ता उन्होंने रखवाया था... लेकिन उन्होंने ज़ाहिर नहीं किया... बोले, “अरे भई बिल्कुल, रिश्ते तो ऊपर आसमानों में तय होते हैं... आप इस लड़के को भी बुला लें... जो रिश्ता मुनासिब हो.. वही कर दिया जाएगा” लेकिन मन ही मन मुझे कोस रहे थे।
ख़ैर इतवार की एक खासियत है... आप लोगों ने नोटिस किया होगा… कि वो 6 दिन के बाद आ जाता है... तो साहब आ गया इतवार...
इरम शर्माई हुई अपने कमरे में... मैं महेंद्र और वकील साहब, वकील साहब के कमरे में.. .वकील साहब की तबियत खराब हो गयी थी तो उनके बगल में एक मशीन लगी थी जिसमें से कुछ वायर निकल कर उनके हाथ में थे... उस मशीन में उनका बीपी वगैरह दिख रहा था। बीच बीच में बीप-बीप की आवाज़ आ रही थी। तो ख़ैर थोड़ी देर में दरवाज़े पर दस्तक हुई.... हमने दरवाज़ा खोला तो देखा कि वही पतली पलती टांगों पर कसी हुई जींस मढ़े हुए और बाल जैसे पुरानी झाड़ू.. लिए हुए शाहरुख सिद्दीकी साहब बरामद हुए... हमारा सांवला रंग तो आप लोगों ने देखा है... वो हमसे एक शेड और समझ लीजिए थोड़े ज़्यादा होंगे... और उस चेहरे पर गोल लेंस वाला नीले रंग का चश्मा.. वो जैसा बॉबी देओल ने पहना था ना सोलजर में... वैसा... अंधेरे में पता नहीं चल रहा कि चेहरा कहां से शुरु हो रहा है, चश्मा कहां खत्म...
“सांले कुम” उन्होंने चश्मा उतारते ही पीछे फंसा लिया… अमा हम ने देखकर हैरान रह गए.. ये कहां घुसा लिया...
अच्छा उनको देखते ही वकील साहब थोड़ा ठिठके तो ज़रूर... बिस्तर पर लेटे-लेटे उन्होंने एक नज़र शाहरुख मियां पर ऐसे डाली जैसे लोग मेले में...
वो मेलों में होते हैं ना... जो पैरों में डंडा फसाएं ऊपर ऊपर चलते रहते हैं... वैसे।
“बैठिये.. बैठिये” ख़ैर एहतरामन उन्होंने कहा, तो एक किनारे बैठ गए। महेंद्र साहब खुश लग रहे थे क्योंकि उनको अंदाज़ा हो गया था कि यहां तो बात नहीं बनेगी। अब भई इस चिमरखी टाइप से कहां वो… हां कह देंगे
अब महेंद्र ने जानबूझ कर कहा, “भई बातें तो होती रहेंगी शाहरुख, लीजिए ये पीजिए अरे ... आपने चाय ले ली वरना ये शर्बत पिलाता, ख़स का स्पेशल है... आपने पिया है?” जानबूझ कर नुक्ता गाढ़ा किया.. ये बोला... “खस का है सर्बत हमने सकीला फूफी की सादी में पिया था” अचानक वकील साहब की बीपी की मशीन आवाज़ करने लगी
मैंने बात को थोड़ा संभाला, “अरे भई, ये बहुत शानदार और बहुत मशहूर इनफ्लूएंसर हैं.. लाखों लोग इनको फॉलो करते हैं” ये बीच में बोले, “हां फालोअर तो.. तीन लाख इंश्टा पर है, सत्तर हजार जू टूब पर...” मैंने इशारा किया चुप हो जा थोड़ी देर। मैंने आगे कहा, “शरीफ घराने से हैं, महिलाबादा में इनके बागात हैं दसहरी के और माशाल्लाह... इनके चचा बहुत मशहूर आदमी हैं परधानी के तीन चुनाव लड़ चुके हैं.. एक बार तो सिर्फ तीन वोटों से हारे थे”
वकील साहब बोले, “हां वो तो ठीक है लेकिन इलेक्शन कोई कारोबार तो नहीं है, भई ये अर्ज़ कीजिए कि उनका ज़रिए माश क्या है?” ज़रिया ए माश यानि आमदनी का ज़रिया क्या है, करते क्या हैं..
अब ये कहां जाने ज़रिया ए माश... मेरी तरफ देखा... कि ये क्या बोल रहे हैं, मैंने इशारे से समझाने की कोशिश की... कि आमदनी कहां से होती है... शाहरुख समझ नहीं पाए... बोले, “अब माश का क्या है सर... हम तो अरहर, माश, मसूर, उड़द सभी खा लेते हैं.. वैसे सोरबे साथ सीरमाल जादा पसंद है”
अचानक मशीन बीपी मशीन पीपीपीपी... बोलने लगी वकील साहब का चेहरा ग़ुस्से से तमतमा उठा... वो बेहोश से होने लगे... सीने पर हाथ रखकर आईईईई... ऐसे करने लगे... हम लोग दौड़े... क्या हुआ... क्या हुआ... कहने लगे... “इस मसखरे को हटाओ मेरे सामने से... ये क्या है… हटा लो वरना मैं ये दवा की शीशी फेंक कर मारूंगा... इसका शीन क़ाफ़ दुरुस्त नहीं है... कैसे ये हमारा दामाद बन सकता है?”
ये बेचारा हैरान, “अरे चच्चा, क्या बात हो गयी… बिलेड पिरेसर कुछ गड़बड़ाए गया है क्या?”
“अरे भईय्या तुम जाओ अभी... गड़बड़ हो जाएगी... मैं बाद में कॉल करता हूं... अभी जाओ”
मैंने देखा कि महेंद्र साहब के चेहरे पर कुछ मुस्कुराहट सी थी... वो खुश हो गए थे कि चलिए उनके वाले रिश्ते के लिए रास्ता साफ हो गया... लकिन मैंने देखा कि दरवाज़े की आढ़ में खड़ी इरम की आंखों में आंसू के कतरे चमक रहे थे।
देखिए मुहब्बत ऐसी ही चीज़ है साहब, जिससे हो जाए तो उसकी हर खराबी भी खूबी हो जाती है.. मैं आपको कहानी के बीच में एक सच्चा किस्सा बताता हूं एक और साहब का.. रामपुर में एक बड़ी मशहूर गज़ल गायिका हुआ करती थीं... उन्हें एक शख्स से मुहब्बत सिर्फ इसलिए हो गयी क्योंकि वो आदमी गज़ल सुनते हुए बिल्कुल सम पर सर हिलाकर अपनी रान पर ताली मारते थे। कि जैसे... मान लीजिए जौन को सुन रहे हैं...
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे, जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
वो जो ना आने वाला है ना, उस से मुझ को मतलब था, आने वालों से क्या मतलब आते हैं, आते होंगे
बस इस बात पर उन्हें इश्क हो गया… तो इश्क का क्या है भाई.. वो किसी से भी हो सकता है... तो अब इरम की पसंद पर हैरानी क्यों... और वैसे भी शाहरुख सिद्दीक़ी में वैसे कोई दिक्कत नहीं थी... नेक लड़का था, छोटा-मोटा सिलेब्रिटी था अपने शहर का, घर पर ज़िम्मेदार बेटा था, बड़ों की इज़्ज़त करता था.. ठीक ठाक शोहरत कमा ली थी... ब ज़बान का एक मसला था... तो था।
तो साहब इधर घर में तो तमाशा हो गया... वकील साहब ने इरम को सुनाना शुरू कर दिया, “हमें इस बात से ऐतराज़ नहीं कि तुम अपनी पसंद से शादी करो... लेकिन ये लखनऊ के शीन क़ाफ सुख़न लोगों का घर है, कोई सक्कर, सोरबा सीरमाल बोलने वाला इस घर का दामाद क़तई नहीं हो सकता.. लोग क्या कहेंगे वकील साहब जो औरों को टोका करते थे आज अपना दामाद अपना नाम शाहरुख की जगह सारुख बताता है”
फिर एक लंबी खामोशी घर में पसर गयी... कुछ दिन दोनों ने नाराज़दी में एक दूसरे से बात नहीं की। इरम चुपचाप आती, उन्हें दवा खिलाती, बीपी की मशीन की बेल्ट चेक करती और चली जाती। ये लेटे लेटे उसकी आंखों के सूख चुके आंसू महसूस करते... बीच-बीच में महेंद्र साहब आते तो इन्हें और भड़का देते… “अरे अच्छा हुआ आपने मना कर दिया... वरना थू-थू हो जाती… जमशेद को भी अक्ल नहीं है, अरे उस लड़के को घर लाना ही नहीं था… वहीं मना कर देना था भई... रिश्ता बराबरी में होता है.. हड्डी से हड्डी मिलनी भी तो चाहिए”
वकील साहब बहुत दिनों तक उनके असर में रहे... लेकिन फिर धीरे-धीरे उन्हें इरम की खामोशी खलने लगी। एक दिन मौका पाकर मैंने उन्हें समझाया और कहा कि “भई देखिए वकील साहब, उर्दू क्या है, एक ज़बान है... वो आपकी और मेरी ज़बान है लेकिन शाहरुख की नहीं है... वो वो ज़बान बोलता है जिसमें उसने होश संभाला... जो उसके आसपास थी... और हम एक-दूसरे की ज़बान बिल्कुल ठीक-ठीक बोलें मुमकिन नहीं है... आप शाहरुख को बोल रहा हैं लेकिन आप भी तो तो हिंदी औऱ अंग्रेज़ी का तलफ़्फ़ुज़ गलत़ करते हैं” वकील चौंक गए। मैंने कहा “आप अपने दोस्त को हमेशा महेंदर कहते हैं... उनका नाम महेंद्र है, बलड प्रेशर नहीं ब्लड प्रेशर, कालेज नहीं कॉलेज होता है। उर्दू हिंदी आपकी मादरी ज़बान नही है इसलिए आप सही तलफ़्फ़ुज़ नहीं करते... इसमें कोई बुराई नही है... शाहरुख भी धीरे-धीरे सीख जाएगा... बल्कि उसने उर्दू सीखनी शुरु कर दी है... इंसान दिलों से तौले जाते हैं, ज़बानों से नहीं”
वकील साब पर्दे की आढ़ में खड़ी इरम का आँंसुओं से धुला चेहरा देख रहे थे। “बाकी आपकी मर्ज़ी” इतना कहकर हम वहां से उठे और चले आए। अच्छा भारी बात कहने के बाद वहां से चल देना चाहिए... उसका असर पड़ता है... जब भी आपको लगे डायलॉग अच्छा निकल गया है... तो वहां से चल पड़िए… हमेशा काम करता है ये पैंतरा...
तो साहब फिर होना क्या था... वकील साहब ने बहुत सोचा... फिर तीन दिन के बाद एक सुबह हमाए पास फोन आया वकील साहब का कहने लगे, “अमा चलो ठीक है, श और स तो हम उसका दुरुस्त कर देंगे लेकिन उससे पूछो बाल वाल कटवा लेगा कि ऐसे ही लकड़बग्घे बनकर आएगा बारात लेकर”
हमारे चेहरे पर खुशी झूमने लगी... मैंने कहा, “अरे बिल्कुल वकील साहब, लड़का रोज़ उर्दू की क्लास ले रहा है... अब मुझसे बाकायदा उर्दू में ही बात करता है” वकील साहब मुतमइन हो गए और ये बात सच भी तथी वो वाकई उर्दू सीख रहा था। मैंने फोन देखा तो इरम का एक मैसेज पड़ा था – लिखा था – शुक्रिया जमशेद भाई.. तभी मेरी स्क्रीन पर शाहरुख सिद्दीकी का नाम चमका... मैंने उठाया तो उधर से आवाज़ आई – “शुक्रिया ज़मसेद भाई, आपने जिस सफ़्क़त और सऊर से सीरीं के सोहरत-पसंद लेकिन सदीद सक्की वालिद से सादी की सराइत पर साइस्तगी से बातचीत की, उससे हमारी सादी का रास्ता सानदार सक्ल में साफ़ हो गया.. बहुत सुक्रिया.. इसी खुसी में आज साम को आपको हमाई तरफ से खस का सर्बत”
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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी