लोकतंत्र को सबसे ज्यादा खतरा अभी है: अशोक वाजपेयी

साहित्य आजतक में लेखक अशोक वाजपेयी ने कहा कि कविता कहीं से पैदा नहीं होती है और कविता बनानी होती है. इसे लिखने का एक कौशल होता है और यह सीखना होता है.

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अशोक वाजपेयी अशोक वाजपेयी

मोहित पारीक

  • नई दिल्ली,
  • 18 नवंबर 2018,
  • अपडेटेड 12:00 AM IST

साहित्य आजतक में लेखक अशोक वाजपेयी ने 'साहित्य के अशोक' सत्र में हिस्सा लिया और लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति और साहित्य पर चर्चा की. इस दौरान उन्होंने अपने जीवन से जुड़े कई किस्से भी बताए. चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को सबसे ज्यादा खतरा अभी है.

अशोक वाजपेयी ने अपनी पहले किताब संग्रह को लेकर बताया, 'पहला कविता संग्रह 'शहर अब भी संभावना है' आने से पहले मैं करीब 200 कविताएं लिख चुका था, लेकिन मैंने अपने पहले संग्रह में करीब 150 कविताओं खारिज कर दी थी और उसमें सिर्फ 50-55 किताबें शामिल की गई थी. इस पुस्तक से एक पुस्तक के रुप में मेरा साहित्य में प्रवेश हुआ.'

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'एक वाजपेयी दूसरे वाजपेयी को राय नहीं देता'

उन्होंने बताया, 'एक हिंदी चैनल पर हिंदी पर एक कार्यक्रम था. उस दौरान चैनल के एंकर ने कहा था कि आप भी एक कवि हैं और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी एक कवि हैं और उनकी कविताओं पर टिप्पणों क्यों नहीं करते. तब मैंने कहा- एक वाजपेयी को दूसरे वाजपेयी पर राय नहीं देना चाहिए. लेकिन कुछ दिन बाद एक रोचक घटना हुई.

दरअसल उस दौरान मैंने प्रधानमंत्री से टाइम मांगा और मुझे मिल गया. जब मैं मिलने गया तो वहां बैठा. उस दौरान वाजपेयी जी ने मुझसे कहा- अरे बगल में आकर बैठिए... एक वाजपेयी का दूसरे वाजपेयी पर बैठना तो वर्जित नहीं है ना... तब मैं चौंक गया था.

भोपाल गैस त्रासदी के दौरान दिए गए एक बयान को लेकर वाजपेयी ने कहा, 'भोपाल गैस त्रासदी के तीन दिन बाद वहां सब कुछ समान्य हो गया था. उस दौरान एक पत्रकार ने पूछा- क्या आपको लगता है कि भोपाल में सब कुछ सामान्य हो गया है, तब मैंने कहा था- ''हां, किसी मरने वाले से साथ मरा नहीं जा सकता.'' जिसको गलत तरीके से दिखाया गया था. बता दें कि भोपाल गैस त्रासदी के दौरान उन पर कवि सम्मेलन रद्द ना करने और एक संवेदनहीन बयान देने का आरोप लगा था.

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एक पोलिश कवि चेश्वाव मीवोष के इंटरव्यू को लेकर उन्होंने कहा, 'उनके बारे में और उनकी रचनाओं को पढ़कर उनको सवाल भेजे. लेकिन जब इंटरव्यू हुआ तो उन्होंने कई सवालों के जवाब नहीं दिए. तब मुझे समझ आया कि ऐसे शख्स से सवालों के जवाब पूछना ही मूर्खता है. हालांकि उस दौरान उन्होंने एक जवाब दिया था कि मैं बौद्ध दर्शन की तरह आकर्षित हुआ, लेकिन उसे स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि वो शून्यता का दर्शन है. कवि होकर में शून्यता को स्वीकार नहीं कर सकता.

क्यों हैं निर्लज्ज कवि?

वाजपेयी ने बताया कि वो खुद को निर्लज प्रेम कवि क्यों कहते हैं? उन्होंने बताया, 'एक तो निर्लज हूं, इसलिए कहता हूं. मैं अपने जीवन के 80 साल से थोड़ा सा पीछे हूं, लेकिन ना मैंने प्रेम करना और ना प्रेम की कविताएं लिखना छोड़ा है. कविता प्रेम और मृत्यु के बिना सार्थक कविता नहीं लिखी जा सकती. संभवत: मैंने अपने जीवन में मृत्यु, प्रेम पर कविताएं लिखी हैं.

उन्होंने विष्णु खरे के एक इंटरव्यू को लेकर कहा कि मैं भारतीय जनता पार्टी, हिंदुत्व और आरएसएस तीनों को हिंदु धर्म का सबसे बड़ा दुश्मन मानता हूं. मैंने उनका विरोध अभी से नहीं किया है और मैं पहले भी करता रहा हूं. साथ ही मुझे लगता है कि लोकतंत्र को सबसे ज्यादा खतरा अभी है और अभी लोकतंत्र डर के आधार पर खड़ा है. इसमें तीन भुजाएं हिंसा, अन्याय और नफरत की है और उनकी कलाओं की समझ बहुत खराब है.

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उन्होंने कहा कि कविता कहीं से पैदा नहीं होती है और कविता बनानी होती है. इसे लिखने का एक कौशल होता है और यह सीखना होता है. यह आप दूसरों की कविताओं से सीखना होता है. साथ ही लोग पढ़ते नहीं है, जो कि बहुत जरूरी है. वहीं उन्होंने कहा, 'कविता का अर्थ अधूरा होता है और जब आप इसमें अपना थोड़ा अर्थ मिलाते हैं, तो यह पूरा होता है.

बता दें कि अशोक वाजपेयी ने 1970 में निबंध-संग्रह 'फिलहाल' से हिंदी आलोचना के क्षेत्र में प्रवेश किया. वह लगभग 35 साल तक आई ए एस अफसर रहे पर एक कवि-आलोचक, लेखक के रूप में ही जाने पहचाने गए. कविता, साहित्य, संस्कृति, संगीत, रूपंकर कलाओं आदि पर हिंदी और अंग्रेजी में उन्होंने खूब लिखा है.

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