मैं भीड़ में भी अकेला हूं, कोरोना से मेरे लिए कुछ नहीं बदलाः सुरेंद्र मोहन पाठक

ई-साहित्य आज तक की महफिल के तीसरे दिन यानि रविवार को दिग्गज लेखक सुरेंद्र मोहन पाठक ने तमाम मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए.

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सुरेंद्र मोहन पाठक सुरेंद्र मोहन पाठक

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 मई 2020,
  • अपडेटेड 6:07 PM IST

ई-साहित्य आज तक की महफिल के तीसरे दिन यानि रविवार को दिग्गज लेखक सुरेंद्र मोहन पाठक ने तमाम मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए. सुरेंद्र ने कोरोना वायरस और लॉकडाउन को लेकर काफी बातें की. मॉड्रेटर शम्स ताहिर खान के साथ बातचीत में सुरेंद्र ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान क्राइम कम हुआ है क्योंकि लोग बाहर ही नहीं निकल रहे हैं. जब सड़कों पर लोग ही नहीं होंगे तो क्राइम किस तरह से हो सकेगा.

सुरेंद्र ने कहा कि मर्डर रोज नहीं होते हैं. जहां तक जेब काटने की बात है तो वो दिन में हजारों हो सकते हैं लेकिन वो तभी हो पाएगा जब जिंदगी अपने ढर्रे पर चलेगा. जब कोरोना खत्म होगा तो लाइफ अपने आप नॉर्मल हो जाएगी. लॉकडाउन के दौरान उनकी खुद की जिंदगी किस तरह कोरोना से प्रभावित हुई है इस सवाल के जवाब में सुरेंद्र ने कहा, "राइटर को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ख्यालों को कैद नहीं किया जा सकता है." हालांकि उन्होंने ये भी बताया कि संभव है अगले साल तक कोई किताब प्रकाशित नहीं हो सके.

निजी जिंदगी के बारे में सवाल पर सुरेंद्र ने कहा, "संकोच के साथ कह रहा हूं कि मेरी जो इस वक्त लाइफ है वो कोरोना से अफेक्टेड नहीं है. जब कोरोना का हाहाकार हुआ था तब भी मैं घर में था. लॉकडाउन हुआ तो भी घर में हूं. लॉकडाउन खुल जाएगा तो भी मुझे घर में रहना है. मैं भीड़ में भी अकेला हूं. मैं लोनर हूं. तो मुझे कोरोना दखल नहीं दे रहा है. मेरा जो लाइफस्टाइल था वही चल रहा है. 80 साल का इंसान हूं भटकने की मेरी उम्र नहीं है."

एक शेर के जरिए उन्होंने अपनी भावनाएं जाहिर करते हुए कहा-
"मुझे दुनिया से क्या मतलब मैं अपनी आप दुनिया हूं."

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इस तरह लिखा पहला नॉवल

अपनी पहली किताब के बारे में उन्होंने बताया, "जब मैंने पहला नॉवल लिखा तो मैं 23 साल का था. तब ये पल्प का धंधा बहुत फैला हुआ था. बहुत राइटर और बहुत रीडर नहीं थे. तब बहुत साधन नहीं था मनोरंजन का. फिल्में सस्ती नहीं थी न इंटरनेट था. किताबें सस्ती थीं. जब मैंने पहला नॉवल था तो मेरे सामने सवाल ये था कि मैं हीरो किसे बनाऊं. मेरे को मेजर जनरल टाइप हीरो पसंद नहीं थे. तो मैंने पत्रकार को कहानी का हीरो बनाने का फैसला किया था."

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