मुरथल के ढाबों में क्यों नहीं मिलता नॉनवेज? क्या है बाबा काली नाथ की वो 'चेतावनी', जिससे आज भी डरते हैं ढाबा मालिक!

दिल्ली-एनसीआर के लोगों का पसंदीदा वीकेंड स्पॉट 'मुरथल' अपने लजीज पराठों के लिए मशहूर है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यहां नॉनवेज क्यों नहीं मिलता? दरअसल, संत बाबा काली नाथ ने एक चेतावनी दी थी, जिसके चलते आज भी लोग यहां नॉनवेज परोसने से डरते हैं.

Advertisement
मुरथल के ढाबों में नॉनवेज न मिलने के पीछे कोई कानून नहीं, बल्कि एक पुरानी मान्यता है. (Photo: ITG) मुरथल के ढाबों में नॉनवेज न मिलने के पीछे कोई कानून नहीं, बल्कि एक पुरानी मान्यता है. (Photo: ITG)

आजतक लाइफस्टाइल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 3:54 PM IST

क्या आप भी दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं और आपको पराठे खाना बहुत पसंद है? अगर हां, तो आप भी उन लोगों में शामिल होंगे, जिनके लिए 'वीकेंड' का मतलब सिर्फ छुट्टी नहीं बल्कि मुरथल जाकर पराठों का मजा लेना होता है. मुरथल जाने में दो फायदे होते हैं. एक तो स्वादिष्ट पराठे खाने को मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर लॉन्ग ड्राइव भी हो जाती है. चाहे रात के 2 बज रहे हों या सुबह के 6, अगर आपको हाईवे पर गाड़ियों का हुजूम और देसी मक्खन की खुशबू आए. तो समझ जाइए कि आप मुरथल की सरहद में हैं.

आज जो जगह सब लोगों का पसंदीदा स्पॉट है, वो जगह कभी सिर्फ ट्रक ड्राइवरों के सुस्ताने का एक छोटा सा ठिकाना हुआ करता था. आज वो छोटा सा ठिकाना फूड लवर्स के लिए जन्नत बन चुकी है. अपने पराठों के लिए मशहूर मुरथल के ढाबों में सिर्फ पराठे ही नहीं और बहुत सी डिश मिलती हैं, जिन्हें खाकर लोग उंगलियां चाटते रह जाते हैं. लेकिन अगर आपने कभी ध्यान दिया हो तो मुरथल के किसी भी ढाबे के मेन्यू कार्ड में आपको नॉनवेज का नाम-ओ-निशान देखने को नहीं मिलता है. ऐसे में क्या आपने कभी सोचा है कि जिस जगह पर खाने के दीवानों का मेला लगा रहता है, वहां मेन्यू कार्ड से नॉनवेज पूरी तरह गायब क्यों है? चलिए जानते हैं ऐसा क्यों है.

मुरथल का खाना क्यों है इतना खास?
जब भी मुरथल का नाम आता है, तो वहां के ढाबों को पर आने वाली देसी पंजाबी स्वाद की महक दिलों-दिमाग में घूमने लगती है. यहां की सबसे बड़ी पहचान ये पंजाबी स्वाद और हर चीज की भरपूर मात्रा है. तंदूर में सिके यहां के पराठे सिर्फ खाने के लिए नहीं, बल्कि पेट और दिल दोनों भर देने के लिए जाने जाते हैं. आलू, प्याज, गोभी से लेकर मूली और पनीर तक के भरवां पराठों के ऊपर से डाला जाने वाला सफेद मक्खन इनके स्वाद को दोगुना कर देता है.

पराठों के साथ सिर्फ मक्खन ही नहीं बल्कि अचार, प्याज और ठंडी छाछ या लस्सी भी परोसी जाती है, जो पूरे सादे से खाने को भी जायकेदार बना देते हैं. पराठों के साथ ही मुरथल के ढाबों पर दाल मखनी, सरसों का साग, पनीर की सब्जी, छोले-भटूरे और सॉफ्ट-सॉफ्ट रोटियां भी मिलती है. ये खाना जितना स्वादिष्ट है उतना ही सस्ता और ताजा भी होता है. जब ये स्वादिष्ट खाना लोगों को दिल खोलकर और बहुत ही प्यार से परोसा जाता है तो सबका पेट तो भरता है, लेकिन मन नहीं भरता. ये जायकेदार खाना खाने और शाही मेहमानवाजी का मजा लेने फिर लोगों का दिल मुरथल जाने के लिए मचल ही जाता है.

नॉनवेज क्यों नहीं बनता?  
अब सवाल ये है कि आखिर इतने प्यार से लोगों को खाना खिलाने वाले मुरथल के ढाबों पर आखिर नॉनवेज क्यों नहीं परोसा जाता. क्या इसके पीछे कोई कानून है या फिर माजरा कुछ और है? बता दें, मुरथल के ढाबों में नॉनवेज न मिलने के पीछे कोई कानून नहीं, बल्कि एक पुरानी मान्यता है. स्थानीय लोगों की मानें तो यहां बाबा काली नाथ नाम के एक संत थे, जिन्होंने इस इलाके को शुद्ध शाकाहारी रखने की बात कही थी. उनका मानना था कि शाकाहारी खाना ही सबसे बढ़िया खाना होता है.

बाबा काली नाथ की चेतावनी
कहा जाता है कि बाबा काली नाथ ने मुरथल के लोगों को ये चेतावनी भी दी थी कि अगर यहां कोई नॉनवेज बनाएगा या बेचेगा, तो उसका ढाबा नहीं चलेगा. उनकी दी इस चेतावनी पर लोगों को इस कदर विश्वास रहा है कि इसके चलते आज भी यहां के ज्यादातर ढाबे इस परंपरा का पालन करते हैं. हालांकि, इसका कोई पक्का सबूत नहीं था, लेकिन लोगों की आस्था और वर्षों से चली आ रही परंपरा इसे आज भी कायम रखे हुए है.

मुरथल क्यों बन गया हर किसी का फेवरेट स्पॉट?
अब सवाल ये भी उठता है कि आखिर पराठे तो बहुत सी जगहों पर मिलते हैं, लेकिन लोगों की पहली पसंद मुरथल ही क्यों बन गया? दरअसल, यहां की खासियत सिर्फ खाना नहीं, बल्कि यहां का माहौल भी है. खुली हवा, हाईवे का व्यू, देर रात तक खुली दुकानें, ये सब मिलकर इस जगह को और भी ज्यादा खास बना देता है. ऐसे में लोग यहां अपने परिवार और दोस्तों के साथ बिताया समय भूल नहीं पाते हैं.

अगर आप भी मुरथल जाने का प्लान बना रहे हैं, तो ये याद रखें कि यहां का खाना पूरी तरह शाकाहारी है. भीड़ खासकर वीकेंड और रात के समय ज्यादा होती है, इसलिए थोड़ा इंतजार भी करना पड़ सकता है. लेकिन जब खाना सामने आता है, तो हर इंतजार वसूल हो जाता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement