भारत में अब कई लोग पालतू जानवरों को महज घर की रखवाली करने वाले जानवर के रूप में नहीं देखते बल्कि उनको परिवार के सदस्य की तरह देखा जाने लगा है. खासकर संपन्न, शहरी वर्ग और अकेलेपन से जूझने वाले लोग कुत्तों और बिल्लियों को अपने बच्चों की तरह पाल रहे हैं जिसकी वजह से 'फर बेबीज' (फर वाले बच्चे) जैसा शब्द भी पॉपुलर हो गया है. यह बदलाव केवल भावनात्मक नहीं है बल्कि इसने भारत में पेट केयर इंडस्ट्री में निवेश और खर्च के नए रास्ते खोल दिए हैं और एक विशाल पेट केयर इकोनॉमी को जन्म दिया है.
बाजार में पेट केयर इंडस्ट्री में बूम
अब लोग जानवरों को घर का बचा-खुचा खाना देने के बजाय उनके लिए ऑर्गेनिक और कस्टमाइज्ड डाइट प्लान खरीद रहे हैं. फर बेबीज के लिए डिजाइनर कपड़े, कस्टमाइज्ड एसेसरीज और लग्जरी बिस्तरों की मांग बढ़ रही है.
शादियों और त्योहारों के सीजन में पालतू जानवरों के लिए खास एथनिक वियर की मांग भी देखी जा रही है. इतना ही नहीं पेट्स के लिए स्पेशलाइज्ड हेयर कट, थेरेपी, मसाज और मैनीक्योर-पेडीक्योर जैसे ट्रीटमेंट सेंटर्स भी खुल रहे हैं.
35 साल की देहरादून की रिचा कहती हैं कि बिल्ली मोमो में अब उनकी जान बसती है और बाकी पेरेंट्स जिस तरह से एक बच्चे की देखभाल करते हैं, वह मोमो की उतनी ही केयर करती हैं. उनको कहीं भी जाना होता है तो पहले वह सोचती हैं कि वह अपनी मोमो को किसके पास छोड़कर जाएंगी.
वह अब अपने ट्रैवल प्लान भी अपनी बिल्ली मोमो को ध्यान में रखकर करती हैं. जैसे-होटल पेट फ्रेंडली है या नहीं, वह उसके खाने से लेकर रहने तक सबका खास ख्याल रखती हैं.
जब भी वो अपने माता-पिता से मिलने इलाहाबाद ट्रेन से जाती हैं तो फर्स्ट-क्लास टिकट खरीदती हैं जो जनरल टिकट की कीमत से दोगुने से भी ज्यादा होती है क्योंकि भारत में कुत्तों और बिल्लियों को सिर्फ फर्स्ट क्लास कोच में ही जाने की इजाजत है.
अपने पालतू जानवर को लाड़-प्यार करना पहले सिर्फ बहुत अमीर लोगों के लिए एक लग्जरी थी. लेकिन अब रिचा जैसे अमीर और मिडिल क्लास शहरी भारतीय अपने फर बेबीज पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं जिससे भारत की पेट केयर इंडस्ट्री में तेजी आई है जिसकी वैल्यू हाल के सालों में लगभग दोगुनी हो गई है.
कोरोना के दौरान पेट की डिमांड बढ़ी
कोविड महामारी ने इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. कोविड ने लोगों के घर पर रहने के दौरान किसी के साथ की जरूरत पैदा की. युवा माएं, अपनी पहली नौकरी करने वाले लोग और जिन्होंने अपनी मर्जी से बच्चे न करने का फैसला किया. इन सभी लोगों ने पालतू जानवर पालना शुरू कर दिया.
कंसल्टिंग फर्म रेडसीर की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय घरों में पालतू जानवरों की संख्या 2019 में 2.6 करोड़ से बढ़कर 2024 में 3.2 करोड़ हो गई है और जैसे-जैसे शादी में देरी, छोटे परिवार और बदलते सामाजिक नियम शहरी इलाकों में पारिवारिक संरचनाओं को नया आकार दे रहे हैं. इन पालतू जानवरों को जगह वहां तेजी से डिमांड बढ़ रही है और उन्हें वही देखभाल और ध्यान मिल रहा है जो आमतौर पर बच्चों को दिया जाता है.
Pets ने ली बच्चों की जगह
राजधानी दिल्ली में रहने वाले सुधांशु कहते हैं कि अपने पालतू जानवरों को पालने से उन्हें माता-पिता होने का अनुभव मिलता है. इस कपल के कोई बायोलॉजिकल बच्चे नहीं हैं और वह अपने पेट के साथ रहते हैं.
सुधांशु कहते हैं, जब हमारी चार साल पहले शादी हुई थी तो हम बच्चे पैदा करने के लिए तैयार नहीं थे. लेकिन पालतू जानवरों को लाने के हमारे घर में जो एक खालीपन था, वो भर गया है. अब हम भी पेरेंटिंग का प्यारा एक्सपीरियंस ले पा रहे हैं और वो भी बिना किसी बड़ी कमिटमेंट के.
5 सालों में 23 प्रतिशत ग्रोथ
रेडसीर की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारतीयों ने अपने पालतू जानवरों के लिए प्रोडक्ट्स और सर्विसेज पर 3.6 अरब डॉलर खर्च किए जो 2019 के 1.6 अरब डॉलर से काफी ज्यादा हैं.
यह तेजी से बढ़ोतरी पेट बोर्डिंग, इंश्योरेंस और स्पेशलाइज्ड वेटनरी केयर जैसे नए ट्रेंड्स की वजह से हुई है.
20 साल पहले पेट केयर सिर्फ वैक्सिनेशन और वेटनरी केयर जैसी बेसिक सर्विसेज तक ही सीमित था.अब लोग अपने पालतू जानवरों के लिए बेस्ट चाहते हैं. चाहें व कपड़े हों, एक्सेसरीज हों या यहां तक कि स्पेशलाइज्ड सर्विसेज हों. कई कपल तो अपनी इनकम का 10 प्रतिशत तक अपने पालतू जानवरों पर खर्च कर रहे हैं. चाहें उन्हें स्पेशल पार्टियों में ले जाना हो या रेगुलर चेकअप करवाना हो.
पालतू जानवरों पर हजारों खर्च कर रहे लोग
उदाहरण के लिए रिचा एक महीने में मोमो पर अपनी इनकम का बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं. ज्यादातर उसके ट्रैवल और स्पेशल डाइट पर.वो हर कुछ हफ्तों में अपने कुत्ते को ट्रिप पर ले जाती हैं.चाहें वो पास के फार्महाउस में एक दिन का आउटिंग हो या किसी रिजॉर्ट में लंबा स्टे.
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