5 स्टार होटल हो या फिर कोई शाही डिश, पनीर हर व्यंजन की शान होता है. आज के समय में शादी-ब्याह की दावत हो या घर पर कोई खास मेहमान आने वाला हो, पनीर के बिना मेन्यू अधूरा ही लगता है. लेकिन क्या आप जानते हैं पनीर कोई सोच समझकर नहीं बनाया गया था बल्कि इसे एक मजबूरी वाला खाना माना जाता है क्योंकि इसका अविष्कार मजबूरी में हुआ था. रिपोर्ट दावा करती है कि पनीर का जन्म किसी रॉयल किचन में नहीं, बल्कि लंबी यात्रा पर जा रहे एक इंसान की जरूरत से हुआ था. फिर समय के साथ उसका रूप बदला और आज वही पनीर हर शाही डिश की पहचान है. तो आइए जानते हैं विदेशी प्रभाव, मुगल दरबार और देसी जुगाड़ से शुरू होकर हर किचन तक कैसे पहुंचा.
नेशनल हिस्टोरिक चीजमेकिंग सेंटर म्यूजियम (NHCC) की ऑफिशिअल वेबसाइट के मुताबिक, पनीर और इसे बनाने की शुरुआत कब और कहां हुई, यह सटीक रूप से किसी को नहीं पता है लेकिन पनीर का इतिहास करीब 8,000 से 10,000 साल पुराना है. प्राचीन यूनानी स्टोरी में भी पनीर बनाने की स्किल का जिक्र मिलता है, जबकि मिस्र के 4,000 साल पुराने मकबरों की दीवारों पर भी इसके प्रमाण पाए गए हैं.
माना जाता है कि हजारों साल पहले मिडिल ईस्ट या मिडिल एशिया का एक चरवाहा सफर के दौरान जानवरों के पेट की खाल से बनी थैली में दूध लेकर जा रहा था. लेकिन रास्ते में गर्मी और मशक (थैली) में मौजूद प्राकृतिक एंजाइम (रेनिन) ने दूध को फाड़ दिया और उसमें मोटे-मोटे थक्के बना दिया और पानी को अलग कर दिया. अब ऐसे में उसे भूख लगी लेकिन दूध फट चुका था. भूख और प्यास की मजबूरी में उस यात्री ने उस जमे हुए हिस्से को खाया और पाया कि वो खाने में भी काफी अच्छा था. बस इसे ही पनीर का प्रारंभिक जन्म माना जाता है.
पनीर के जन्म के पीछे एक थ्योरी यह भी है कि दूध को खराब होने से बचाने के लिए उसमें नमक मिलाया गया होगा जिससे वह जम गया. इसके अलावा दूध में फलों का रस मिलाने से उसमें मौजूद एसिड की वजह से भी पनीर बनने की शुरुआत हुई होगी.
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की एक रिपोर्ट भी इस दावे को सही मानती है कि प्राचीन काल में मध्य पूर्व (Middle East) के खानाबदोश लोग यात्रा के दौरान दूध को स्टोर करने के लिए जानवरों के पेट से बनी खाल के थैलों का इस्तेमाल करते थे और उसी समय पनीर बना था.
2013 से भेड़ का दूध बेचने वाले सीक्रेट लैंड्स फार्म की ऑफिशिअल वेबसाइट के मुताबिक, इंसान ने ईसा पूर्व 8000 के आसपास जानवरों को पालना शुरू किया था. सबसे पहले भेड़ और बकरियों का दूध निकाला गया इसलिए दूध को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उसे 'फड़ा' या प्रिजर्व किया जाता था. धीरे-धीरे लोगों ने इस तकनीक में सुधार किया और दूध को जमाकर उसे अलग-अलग रूप देना शुरू किया. यहीं से चीज (Cheese) और पनीर (Paneer) की अलग-अलग किस्में विकसित हुईं.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुकाबिक, भारत में दूध को फाड़ना हमेशा से शुभ नहीं माना जाता था और हमेशा से ही दूध के फटने को अपशकुन समझा जाता था. वहीं भारत में आधुनिक पनीर का श्रेय पुर्तगालियों को दिया जाता है. 17वीं शताब्दी के आसपास बंगाल में बसे पुर्तगालियों ने भारतीयों को दूध फाड़ने की तकनीक सिखाई थी.
उन्होंने सिखाया कि सिट्रिक एसिड या नींबू के रस की मदद से दूध को फाड़कर उसे छैना या पनीर में बदला जा सकता है. इससे पहले भारत में दही या खोया का चलन तो था लेकिन 'छैना' बनाने का तरीका नया था. इस तकनीक ने आगे चलकर रसगुल्ला, संदेश और पनीर की ढेरों वैराइटीज को जन्म दिया.
होमग्राउन के अनुसार, 'पनीर' फारसी शब्द 'पेयनिर' (Peynir) से बना है. फारस और मध्य एशिया में भी पनीर बनाने की अपनी परंपराएं थीं. जब मुगल भारत आए थे तो वो अपने साथ खान-पान की रेसिपी भी साथ लेकर आए थे. उन्होंने पनीर को भारतीय मसालों के साथ मिलाकर उसे एक 'रॉयल' डिश में तब्दील कर दिया. यही कारण है कि आज हम 'शाही पनीर' जैसे नाम सुनते हैं, जो इसकी नवाबी विरासत को दर्शाता है.
आज भारत दुनिया के सबसे बड़े पनीर उपभोक्ताओं में से एक है. यह न केवल स्वाद में लाजवाब है, बल्कि पोषण के लिहाज से भी बेहतरीन माना जाता है. शुरुआत में जो पनीर सिर्फ दूध को बचाने का एक तरीका था, वह आज एक मल्टी-बिलियन डॉलर इंडस्ट्री बन चुका है. चाहे घर की साधारण सब्जी हो या फाइव स्टार होटल का खाना, पनीर हर जगह एक रॉयल स्थान रखता है.
मृदुल राजपूत