खामेनेई की मौत के बाद क्या हिलेगा ईरान का इस्लामिक ढांचा? जवाब पेचीदा है

खामेनेई वह शख्स थे जो अमेरिका और इजरायल के लिए लंबे समय से सिरदर्द बने हुए थे. अब सवाल यह है कि क्या ईरान का इस्लामिक रेजीम खत्म होगा. इसका जवाब इतना आसान नहीं है, क्योंकि खामेनेई अपने पीछे एक ऐसा सत्ता ढांचा छोड़ गए हैं, जो काफी पेचीदा है. आइए इसे समझते हैं.

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खामेनेई का वह सत्ता ढांचा जिसकी जड़ें बेहद गहरी थीं (Photo:Reuter) खामेनेई का वह सत्ता ढांचा जिसकी जड़ें बेहद गहरी थीं (Photo:Reuter)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:56 AM IST

ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई का निधन हो गया है. ईरानी मीडिया ने उनकी मौत की पुष्टि की है. लंबे समय से खामेनेई वह शख्स थे जिन पर इजरायल और अमेरिका खुलकर निशाना साधते रहे. उनकी नीतियां, इस्लामिक शासन का कड़ा ढांचा और अमेरिका–इजरायल विरोधी रुख अंतरराष्ट्रीय राजनीति में लगातार विवाद का केंद्र रहे.

अब सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या खामेनेई की मौत के बाद ईरान और इजरायल के बीच शुरू हुआ युद्ध थमेगा. कई सालों से अमेरिका और इजरायल ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिशें करते आए हैं, लेकिन खामेनेई का सत्ता तंत्र इतना मजबूत था कि उसे तोड़ना लगभग असंभव माना जाता था. उनकी मौत के साथ यह ढांचा कैसे प्रभावित होगा, यही सबसे बड़ी चर्चा का विषय है.

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अमेरिका–इजरायल के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्यों थे खामेनेई

अमेरिका में दशकों से यह मांग उठती रही है कि ईरान में शासन बदला जाना चाहिए. 1953 में अमेरिका ने सत्ता परिवर्तन करवाया भी था, लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति ने पूरी तस्वीर बदल दी.आज, चार दशक बाद भी ईरान की मौजूदा राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था अमेरिका और इजरायल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है. इसकी वजह थी-खामेनेई का वह सत्ता ढांचा जिसकी जड़ें बेहद गहरी थीं और जिसका असर आज भी कायम है.

खामेनेई की कुर्सी इतनी मजबूत कैसे बनी

इस सवाल का जवाब छिपा है ईरान के उस पॉलिटिकल स्ट्रक्चर में, जिसकी नींव 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद रखी गई. उसी समय एक अनोखा और बेहद शक्तिशाली पद बना-रहबर-ए-आला, यानी सुप्रीम लीडर. यह पद सिर्फ राजनीतिक प्रमुख का नहीं था, बल्कि देश के धार्मिक मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाता था. इसी वजह से सुप्रीम लीडर राष्ट्रपति से कई गुना अधिक शक्तिशाली हो गया. सेना, विदेश नीति, खुफिया एजेंसियां, न्यायपालिका, मीडिया इन सभी पर अंतिम फैसला सुप्रीम लीडर का होता था.

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मजलिस-ए-खुबरेगान: संरचना की पहली दीवार

यहां आता है पहला बड़ा संस्थान मजलिस-ए-खुबरेगान. यह 88 धर्मगुरुओं की परिषद है, जिसका चुनाव जनता करती है. इनका काम है सुप्रीम लीडर की निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर नया सुप्रीम लीडर चुनना.लेकिन यह सुनने में जितना लोकतांत्रिक लगता है, असलियत इससे कहीं जटिल है.

शूरा-ए-निगेहबान: चुनाव का असली गेटकीपर

मजलिस-ए-खुबरेगान की सदस्यता पाने के लिए पहले मंजूरी लेनी पड़ती है शूरा-ए-निगेहबान से. यही संस्था तय करती है कि कौन चुनाव लड़ सकता है, कौन अयोग्य होगा, और संसद के कानून इस्लामी मूल्यों के अनुरूप हैं या नहीं.

सबसे अहम बात-इस काउंसिल के अधिकतर सदस्य सीधे या परोक्ष रूप से सुप्रीम लीडर द्वारा नियुक्त होते हैं. यानी जो संस्था सुप्रीम लीडर को चुनने वालों को मंजूरी देती है, वह खुद उसी के प्रभाव में काम करती है.

क्या है ‘बुन्याद’-ईरान की समानांतर अर्थव्यवस्था

ईरान की शक्ति सिर्फ राजनीति से नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था से भी आती है. यहां बुन्याद नाम की विशाल संस्थाएं हैं, जिनके पास अरबों डॉलर की संपत्तियां, फैक्ट्रियां, कंपनियां और रियल एस्टेट हैं.ये चैरिटी जैसी दिखती हैं, लेकिन इन पर सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं होता और ये सामान्य टैक्स संरचना से बाहर रहती हैं. इनकी जवाबदेही सिर्फ सुप्रीम लीडर को होती है. इसलिए इन्हें ईरान की पैरेलल इकॉनमी कहा जाता है.

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खामेनेई की थी हर संस्था पर पकड़

पिछले तीन दशकों में खामेनेई ने धीरे-धीरे हर महत्वपूर्ण संस्था पर अपने भरोसेमंद लोगों को नियुक्त किया. शूरा-ए-निगेहबान, मजलिस-ए-खुबरेगान, न्यायपालिका, और बुन्याद—हर जगह शक्ति का संतुलन उनके पक्ष में गया.इसी दौरान रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (पासदारान-ए-इंकलाब) राजनीति और अर्थव्यवस्था में बेहद ताकतवर बने. खामेनेई का रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के साथ गठजोड़ ही ईरान की मौजूदा व्यवस्था की सबसे मजबूत ढाल बन गया.

अब आगे क्या

ईरान का सत्ता ढांचा किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस पूरी प्रणाली पर टिका है जिसे खामेनेई ने दशकों में मजबूत किया. यही कारण है कि उनकी मौत के बावजूद यह कुर्सी और व्यवस्था तुरंत कमजोर नहीं होती दिख रही.

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