कौन हैं ईरान के सपोर्ट में उतरे हूती? जिसके एक कदम से बदल सकती है युद्ध की सूरत

ईरान की ओर से अब हूती भी मिडिल ईस्ट की जंग में आ गए हैं. अगर हूती इजरायल के बाद अब रेड सी के जहाजों को निशाना बनाते हैं तो युद्ध की सूरत बदल सकती है.

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हूती ग्रुप ने अब ईरान की जंग में एंट्री ले ली  है. (Photo: AP) हूती ग्रुप ने अब ईरान की जंग में एंट्री ले ली है. (Photo: AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:36 PM IST

मिडिल ईस्ट की जंग में अब यमन के हूती की भी एंट्री हो गई है. हूती ईरान के सपोर्ट में युद्ध के मैदान में उतरे हैं और उन्होंने इजरायल पर मिसाइलों से अटैक भी किया है. शनिवार को दक्षिणी इजराइल पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार करके हूतियों ने ईरान युद्ध में अपने प्रवेश की घोषणा कर दी है, जिससे संघर्ष में एक नया मोर्चा खुल गया है. हूतियों की युद्ध में एंट्री को गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि अगर हूती 2023-25 की तरह युद्ध करते हैं तो इसका असर कई देशों पर देखने को मिलेगा. ऐसे में जानते हैं कि आखिर ये हैं कौन और इस युद्ध में उनकी क्या भूमिका हो सकती है... 

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हूती हैं कौन?

हूती यमन का एक राजनीतिक और सैन्य समूह है, जो 2000 के दशक में उभरा और अब उत्तरी यमन के अधिकांश हिस्से पर नियंत्रण रखता है. इस समूह का नाम इसके संस्थापक हुसैन अल-हूती के नाम पर रखा गया है. हूती को ईरान से समर्थन हासिल है और अब वो उनके सहयोगी हैं, लेकिन वे सीधे तौर पर ईरान के प्रतिनिधि नहीं है. वे अक्सर अपने देश यमन के अंदरूनी हितों को ज्यादा महत्व देते हैं. ईरान ने उन्हें आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक जरूर दी है, लेकिन अब यह समूह खुद भी यमन के अंदर हथियार बनाने और उन्हें असेंबल करने की क्षमता विकसित कर चुका है. 

यह समूह 2014 में उस समय चर्चा में आया, जब उसने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के खिलाफ एक भयानक गृहयुद्ध शुरू हो गया. इस युद्ध में सऊदी अरब के नेतृत्व में हवाई हमले किए गए, जिन्हें अमेरिका का भी समर्थन मिला. इन हमलों में करीब 9,000 आम नागरिकों की मौत हुई. इस समूह को बाद में अमेरिका की लगातार दो सरकारों की तरफ से बमबारी का सामना करना पड़ा. 

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एक बार तो जनवरी 2024 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन ने यमन में हवाई हमले करवाए थे. यह हमले रेड सी में इंटरनेशनल जहाजों पर हूती हमलों के जवाब में किए गए थे. लेकिन इन हमलों से हूती समूह को रोका नहीं जा सका. ये हमले तब जाकर रुके, जब जनवरी 2025 में इजरायल और हमास के बीच सीजफायर नहीं हुआ. मार्च 2025 में जब इजरायल ने गाजा में खाने और मदद की सप्लाई पर रोक लगा दी, तो हूती समूह ने फिर से हमले शुरू कर दिए. 

इसके बाद 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रैल 2025 में एक और बमबारी अभियान शुरू किया, ताकि इन हमलों को रोका जा सके. मई 2025 में ट्रंप प्रशासन और हूती समूह के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें तय हुआ कि अगर हूती जहाजों पर हमले बंद कर देंगे, तो अमेरिका भी हवाई हमले रोक देगा. हालांकि इस समझौते में इजरायल पर हमले रोकने की बात शामिल नहीं थी, इसलिए गाजा में युद्धविराम होने तक ये हमले जारी रहे. 

इस युद्ध में क्यों है अहम?

टाइम मैगजीन की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ वक्त पहले हूतियों ने रेड सी में ग्लोबल शिपिंग को बाधित किया था. हूतियों ने नवंबर 2023 और जनवरी 2025 के बीच ग्लोबल शिपिंग को प्रभावित करने के लिए एक बड़ा अटैक किया था. उस वक्त हूतियों ने गाजा युद्ध के दौरान फिलिस्तीनियों के साथ एकजुटता के अभियान में रेड सी में 100 से अधिक व्यापारिक जहाजों पर हमला किया था. 

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टाइम की रिपोर्ट में ओटावा विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स के प्रोफेसर फेलो थॉमस जुनेउ ने बताया कि अगर हूती हमले इजरायल पर सीधे हमलों तक सीमित रहते हैं तो इसका युद्ध पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा. दरअसल, इजरायल उसके मिसाइलों को रोकने में सक्षम है. इजरायल का एंटी मिसाइल सिस्टम हूती की मिसाइल और ड्रोन को रोकने में सक्षम है. 

लेकिन, अगर हूती रेड सी में जहाजों पर फिर से हमला करने का फैसला करता है, तो स्थिति बदल जाएगी. अगर हूती लाल सागर में समुद्री जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दें और बाब अल-मंडाब स्ट्रेट को बंद करने की कोशिश करें तो युद्ध पर इसका काफी असर पड़ेगा और युद्ध एक दूसरे मोड़ की ओर जा सकता है. इससे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों और ग्लोबल इकोनॉमी पर युद्ध का पहले से ही मजबूत प्रभाव और भी बढ़ जाएगा. 

बता दें कि रेड सी और बाब अल-मंडाब स्ट्रेट पर हमले से स्वेज नहर के माध्यम से यातायात बाधित होने की संभावना है, जिसके माध्यम से ग्लोबल समुद्री व्यापार का करीब 15 फीसदी, जिसमें कंटेनर जहाज यातायात का 30 फीसदी शामिल है. बता दें कि यूरोप–एशिया के बीच लगभग 12–15 फीसदी वैश्विक व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है. अगर हमले बढ़ते हैं, तो जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से घूमकर जाना पड़ेगा. इससे तेल और गैस की कीमतों पर असर देखने को मिल सकता है. 

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