EVM, पोस्टल बैलेट, स्ट्रॉन्ग रूम... वोटिंग से काउंटिंग तक क्या है प्रोटोकॉल, बंगाल में क्यों हुआ बवाल?

पश्चिम बंगाल में वोटिंग के बाद बैलेट पेपर और ईवीएम की सिक्योरिटी को लेकर बवाल हो रहा है. ऐसे में जानते हैं कि आखिर बैलेट पेपर की सिक्योरिटी को लेकर क्या नियम है?

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ईवीएम को कड़ी निगरानी में स्ट्रॉन्ग रूम में रखा जाता है. (Photo: PTI) ईवीएम को कड़ी निगरानी में स्ट्रॉन्ग रूम में रखा जाता है. (Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:48 PM IST

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की वोटिंग हो चुकी है और अब नतीजे आना बाकी है. लेकिन, वोटिंग होने के बाद भी बंगाल में राजनीतिक ड्रामा खत्म नहीं हो रहा है. अब बवाल ईवीएम, बैलेट पेपर और स्ट्रॉन्ग रूम की सिक्योरिटी को लेकर हो रहा है. गुरुवार रात को भी कोलकाता में काफी बवाल हुआ और फिर चुनाव आयोग को बताना पड़ा कि व्यवस्थित ढंग से नियमों के अनुसार प्रक्रिया पूरी की जा रही है. ऐसे में जानते हैं कि आखिर ईवीएम, पोस्टल बैलेट आदि को लेकर प्रोटोकॉल क्या है और किस तरह वोटिंग से काउंटिंग तक ईवीएम को रखा जाता है....

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कोलकाता में किस बात को लेकर हुआ बवाल

ईवीएम के प्रोटोकॉल के बारे में बात करने से पहले आपको बताते हैं कि आखिर टीएमसी किस बात को लेकर बवाल कर रही है. दरअसल, टीएमसी का आरोप है कि पुलिस-प्रशासन स्ट्रॉन्ग रूम में धांधली कर रहा है. टीएमसी ने आरोप लगाया कि अंदर कुछ लोग पोस्टल बैलट और पिंक पेपर संभाल रहे हैं. उन्होंने कहा कि वहां टीएमसी के लोगों की अनुपस्थिति में ये हो रहा था. 

साथ ही आरोप लगाया कि बीजेपी और चुनाव आयोग के अधिकारी, संबंधित पार्टियों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बिना बक्सों को खोलने की कोशिश कर रहे हैं. इसके बाद टीएमसी नेता धरने पर बैठ गए. यहां तक कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कोलकाता की भवानीपुर सीट पर स्ट्रॉन्ग रूम तक पहुंच गईं. हालांकि, बाद में चुनाव आयोग ने बताया कि किस तरह नियम के अनुसार ही कंट्रोल रूम खोले गए थे. बता दें कि ये बवाल बैलेट पेपर को लेकर हुआ था.

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बैलेट पेपर को लेकर क्या नियम हैं?

दरअसल, बैलेट पेपर की सिक्योरिटी और ईवीएम को लेकर अलग-अलग नियम है. कोलकाता में बवाल बैलेट पेपर की सिक्योरिटी को लेकर हुआ था. जब ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम में रखे जाते हैं तो उन्हें काउंटिंग के वक्त ही निकाला जाता है. ईवीएम की तरह बैलेट पेपर को भी जगह जगह से इकट्ठा करने के बाद बक्सों में जमा किया जाता है. कितने बैलेट पेपर आए, किस विधानसभा के आए... ये सभी जानकारी रिटर्निंग ऑफिसर के पास होती है. 

इसके बाद इन्हें काउंटिंग के लिए रख दिया जाता है, लेकिन कुछ शुरुआती प्रिपरेटरी स्टेप्स चुनाव आयोग के अधिकारी काउंटिंग से पहले करते हैं. बैलेट पेपर की स्थिति में चुनाव आयोग के अधिकारी काउंटिंग से पहले कुछ तैयारी करते हैं, जिसमें वो कंट्रोल रूम में जा सकते हैं. इसमें कवर खोलना, छंटाई करना आदि काम किया जाता है, लेकिन किसी भी पेपर के लिफाफे को खोला नहीं जा सकता है. जिस छेड़छाड़ का आरोप टीएमसी की ओर से लगाया गया, वो हकीकत में प्रिपरेटरी स्टेप्स का हिस्सा था. लेकिन, इस स्थिति में चुनाव आयोग को ये काम करने से पहले राजनीतिक पार्टियों को बताना होता है. ऐसे में पार्टी के प्रतिनिधि भी ये हिस्सा देख सकते हैं. 

कोलकाता वाली स्थिति में चुनाव आयोग ने बताया कि इसके लिए पार्टियों को पहले सूचित कर दिया था और इसके बाद ये कार्य किया जा रहा था. उन्हें चार बजे के बाद आना चाहिए था. तीन उम्मीदवार आए और उन्होंने देखा कि स्ट्रॉन्ग रूम सील थे जबकि पोस्टल बैलट का स्ट्रॉन्ग रूम खुला था. इसके बाद तीनों चले गए. वैसे स्ट्रॉन्ग रूम 24 घंटे सीसीटीवी की निगरानी में रहता है, जिसे पार्टी के प्रतिनिधि देख सकते हैं. 

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ईवीएम की कैसे रहती है सिक्योरिटी?

जब ईवीएम से वोटिंग होती है तो सबसे पहले दोनों मशीन को पोलिंग बूथ पर चेक किया जाता है. इस दौरान पार्टियों के प्रतिनिधियों के सामने इसे चेक किया जाता है और मॉक पोल के जरिए दिखाया जाता है कि वोटिंग सही से हो रही है. इसके बाद वोटिंग शुरू होती है और वोटिंग पूरी होने के बाद फिर से मशीन को चेक  किया जाता है और कुल वोटर्स की संख्या को गिना जाता है. डेटा को प्रतिनिधियों के डेटा से मिलाया जाता है. इसके बाद सभी के साइन होने के बाद मशीन को सील कर दिया जाता है और ये सील फिर काउंटिंग डे के दिन काउंटिंग वाले स्थान पर ही खोली जाती है. 

इसके बाद इसे स्ट्रॉन्ग रूम तक ले जाया जाता है और उन गाड़ियों को पार्टी के प्रतिनिधि फॉलो कर सकते हैं. इसके बाद 24 घंटे की सिक्योरिटी में रखा जाता है. स्ट्रॉन्ग रूम को सील करते समय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि मौजूद रह सकते हैं और वे ताले पर अपनी सील भी लगा सकते हैं. इसके लिए मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को पहले से लिखित सूचना दी जानी चाहिए. 

स्ट्रॉन्ग रूम में केवल एक ही एंट्री गेट होता है और और उसमें डबल लॉक सिस्टम होता है. एक चाबी रिटर्निंग ऑफिसर के पास और दूसरी संबंधित विधानसभा क्षेत्र के असिस्टेंट रिटर्निंग ऑफिसर के पास रखी रहती है. स्ट्रॉन्ग रूम के अन्य सभी प्रवेश बिंदुओं (जैसे खिड़कियां आदि) को इस तरह सील किया जाता है, ताकि कोई अंदर ना आ सके.

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खास सिक्योरिटी होती है और स्ट्रॉन्ग रूम के पास जाने वाले हर व्यक्ति की जानकारी लिखी जाती है. स्ट्रॉन्ग रूम की निगरानी ऑब्जर्वर, जिला निर्वाचन अधिकारी, पुलिस अधीक्षक, राजनीतिक दल/उम्मीदवार या उनके एजेंट कर सकते हैं. इसके बाद स्ट्रॉन्ग रुम के पास ही काउटिंग सेंटर होता है, जहां वोटों की गिनती है और वो भी सभी के सामने की जाती है. यहां भी पार्टियों के उम्मीदवार या प्रतिनिधि रहते हैं. 

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