जब तिब्बत में भड़क उठा विद्रोह, चीन रच रहा था दलाई लामा के किडनैपिंग की साजिश

आज के दिन ही तिब्बत में चीन के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए थे और विद्रोह शुरू हो गया था. तिब्बत पर चीन का कब्ज़ा लगभग एक दशक पहले, अक्टूबर 1950 में शुरू हुआ, जब उसकी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की सेना ने देश पर आक्रमण किया.

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जब चीन के खिलाफ तिब्बत के लोगों ने विद्रोह कर दिया (Photo - Getty) जब चीन के खिलाफ तिब्बत के लोगों ने विद्रोह कर दिया (Photo - Getty)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 10 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:33 AM IST

10 मार्च 1959 को तिब्बत के लोगों ने चीन कब्जे के खिलाफ विद्रोह शुरू कर दिया था. चीन दलाई लामा का अपहरण करना चाहता था, क्योंकि तिब्बत पर नियंत्रण की शक्ति उनके पास ही थी. कहीं चीन दलाई लामा को किडनैप न कर ले, इस डर से 
उनके महल को घेरकर लोग चीन की सेना का विरोध शुरू कर दिया. 

कम्युनिस्टों ने मुख्य भूमि चीन पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने के बमुश्किल एक वर्ष बाद ही तिब्बत पर हमला कर दिया था. तिब्बती सरकार ने अगले वर्ष चीनी दबाव के आगे झुकते हुए एक संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसने तिब्बत के घरेलू मामलों पर देश के आध्यात्मिक नेता,  दलाई लामा की शक्ति सुनिश्चित की.

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जब तिब्बत पर चीन ने बमबारी की धमकी दी
चीनी कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध अगले कई वर्षों तक लगातार बढ़ता रहा, जिसमें 1956 में पूर्वी तिब्बत के कई क्षेत्रों में विद्रोह भी शामिल था. दिसंबर 1958 तक, राजधानी ल्हासा में विद्रोह सुलग रहा था और पीएलए कमान ने धमकी दी थी कि यदि व्यवस्था कायम नहीं रखी गई तो शहर पर बमबारी की जाएगी.

दलाई लामा के महल के बाहर एकजुट होकर चीनी सेना का तिब्बत के लोगों ने किया था विरोध.                             (Photo - Getty)

मार्च 1959 में ल्हासा में हुए विद्रोह की शुरुआत दलाई लामा के अपहरण और उन्हें बीजिंग ले जाने की साजिश के डर से हुई थी. जब चीनी सैन्य अधिकारियों ने दलाई लामा को पीएलए मुख्यालय में एक नाट्य प्रदर्शन और आधिकारिक चाय के लिए आमंत्रित किया, तो उन्हें बताया गया कि उन्हें अकेले आना होगा और किसी भी तिब्बती सैन्य अंगरक्षक या कर्मी को सैन्य शिविर की सीमा से आगे जाने की अनुमति नहीं होगी.

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दलाई लामा चले गए भारत
10 मार्च को, 300,000 वफादार तिब्बतियों ने नोरबुलिंका महल को घेर लिया और दलाई लामा को पीएलए का निमंत्रण स्वीकार करने से रोक दिया. 17 मार्च तक, चीनी तोपखाने महल की ओर लक्षित थे और दलाई लामा को भारत ले जाया गया. दो दिन बाद ल्हासा में लड़ाई छिड़ गई, जिसमें तिब्बती विद्रोही संख्या और हथियारों के मामले में बुरी तरह से कमजोर पड़ गए थे. 21 मार्च की सुबह, चीन ने नोरबुलिंका पर गोलाबारी शुरू कर दी, जिसमें बाहर डेरा डाले हुए हजारों पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का नरसंहार हुआ.

यह भी पढ़ें: जब चीन ने वियतनाम के खिलाफ छेड़ी जंग, उल्टे पांव भागना पड़ा था

इसके बाद, पीएलए ने तिब्बती प्रतिरोध को कुचलते हुए दलाई लामा के अंगरक्षकों को मार डाला और ल्हासा के प्रमुख मठों को उनके हजारों निवासियों के साथ नष्ट कर दिया. तिब्बत पर चीन की पकड़ और अलगाववादी गतिविधियों का क्रूर दमन असफल विद्रोह के बाद के दशकों में भी जारी रहा है. हजारों तिब्बती अपने नेता के साथ भारत चले गए, जहां दलाई लामा लंबे समय से हिमालय की तलहटी में निर्वासित सरकार चला रहे हैं.

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