ईरान-अमेरिका तनाव के बीच कंडोम की बढ़ी चर्चा, जानिए इसकी वजह

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे आम लोगों की जिंदगी पर दिख रहा है. कंडोम की कीमतें बढ़ने और सप्लाई घटने की खबर ने सबको चौंका दिया है. आखिर जंग और कंडोम के बीच क्या कनेक्शन है.यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है.

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 कंडोम सिलिकॉन ऑयल, पीवीसी और पैकेजिंग मटेरियल पेट्रोकेमिकल से बनते हैं (Photo:ITG) कंडोम सिलिकॉन ऑयल, पीवीसी और पैकेजिंग मटेरियल पेट्रोकेमिकल से बनते हैं (Photo:ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:56 PM IST

आपको बटरफ्लाई इफेक्ट के बारे में पता है? यह एक ऐसी थ्योरी है, जो बताती है कि दुनिया की हर छोटी-बड़ी घटना आपस में जुड़ी होती है और उसका असर दूर तक पड़ता है. आसान भाषा में समझें तो-कहीं एक तितली के पंख फड़फड़ाने से भी दूर कहीं तूफान खड़ा हो सकता है.

आज दुनिया में ऐसा ही एक बड़ा 'बटरफ्लाई इफेक्ट' देखने को मिल रहा है.लेकिन ये तितली के पंख फरफराने जितनी सामान्य घटना नहीं है, बल्कि एक वॉर है. मिडिल ईस्ट में जारी जंग सिर्फ एक इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. तेल की कीमतों से लेकर एलपीजी सिलेंडर और शेयर बाजार तक.हर चीज इस हलचल से प्रभावित हो रही है.

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अब सवाल यह है कि क्या इसका असर उन चीजों पर भी पड़ सकता है, जिनके बारे में हम सोचते भी नहीं-जैसे कंडोम की कीमतें? यही कनेक्शन इस पूरी कहानी को और दिलचस्प बनाता है. आइये समझते हैं.

रिपोर्ट कहती है कि  मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब सीधे भारत के कंडोम बाजार पर दिखने लगा है. करीब 8,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की इंडस्ट्री इस समय बड़े संकट से गुजर रही है. सप्लाई चेन में आई रुकावट के कारण कंडोम की कमी और कीमतों में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है.

दिलचस्प बात ये है कि यह संकट मांग बढ़ने की वजह से नहीं, बल्कि कच्चे माल और ट्रांसपोर्ट में आई दिक्कतों के कारण पैदा हुआ है. समुद्री रास्तों में रुकावट और पेट्रोकेमिकल सप्लाई प्रभावित होने से उत्पादन पर असर पड़ा है.

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आइये समझते हैं ऐसा क्यों हो रहा है

भारत हर साल 400 करोड़ से ज्यादा कंडोम बनाता है. इस सेक्टर में एचएलएल लाइफकेयर, मैनकाइंड फार्मा और क्यूपिड जैसी कंपनियां शामिल हैं. कंडोम बनाने के लिए सिलिकॉन ऑयल और अमोनिया बेहद जरूरी होते हैं. फिलहाल सिलिकॉन ऑयल की कमी हो गई है, जिससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है. वहीं अमोनिया की कीमतों में 40-50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की संभावना है. इसके अलावा पैकेजिंग मटेरियल जैसे पीवीसी और एल्युमिनियम फॉइल की कीमतें भी बढ़ रही हैं, जिससे लागत और बढ़ गई है.

 


दरअसल, सिलिकॉन ऑयल, पीवीसी और पैकेजिंग मटेरियल पेट्रोकेमिकल से बनते हैं, जिनकी सप्लाई तेल और रिफाइनरी पर निर्भर होती है. जंग के कारण तेल की उपलब्धता और उत्पादन पर दबाव बढ़ा है, वहीं समुद्री रास्तों में रुकावट से जहाजों की आवाजाही धीमी हो गई है, जिससे सामान समय पर फैक्ट्रियों तक नहीं पहुंच पा रहा. इसके साथ ही अमोनिया, जिसे बनाने में गैस की जरूरत होती है, उसकी कीमतें भी ऊर्जा महंगी होने से बढ़ रही हैं. नतीजतन, कच्चा माल महंगा और कम उपलब्ध हो गया है, जिससे उत्पादन लागत तेजी से बढ़ रही है.

कंडोम के कीमतें बढ़ने की आशंका 

कीमतें बढ़ने की बात इसलिए कही जा रही है. आइये इसको समझते हैं. भारत का कंडोम बाजार इस तरह काम करता है कि ज्यादा मात्रा में सस्ते दाम पर उत्पाद बेचे जाएं, ताकि आम लोगों के लिए यह आसानी से उपलब्ध रहे. लेकिन अब यही मॉडल दबाव में आ गया है, क्योंकि उत्पादन लागत लगातार बदल रही है और कंपनियों के लिए कीमत तय करना मुश्किल हो गया है.

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सरकार की एक मीटिंग में यह भी सामने आया कि देश की पेट्रोकेमिकल यूनिट्स को ईंधन और ऊर्जा की जरूरतों को प्राथमिकता देने के कारण करीब 35% तक कम संसाधन मिल सकते हैं, जिससे कंडोम बनाने वाले उद्योगों को कच्चा माल और कम मिलेगा.

क्या है खतरा!

एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह सिर्फ कारोबार की समस्या नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है. कंडोम परिवार नियोजन और यौन रोगों से बचाव के लिए बेहद जरूरी हैं. अगर महंगाई या कमी की वजह से लोग इसका कम इस्तेमाल करने लगें, तो इसके लंबे समय में गंभीर सामाजिक असर हो सकते हैं.

 

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