क्या सच में 'लंगड़ा' है लंगड़ा आम? नाम के पीछे की चौंकाने वाली सच्चाई!

लंगड़ा आम भारत के सबसे लोकप्रिय आम की किस्मों में से एक है, जिसका स्वाद जितना खास है, उसकी कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है. वाराणसी के एक लंगड़े किसान के नाम पर इस आम का नाम पड़ा, जिसने अपनी मेहनत से इस खास किस्म को पहचान दिलाई. 

Advertisement
यह आम बनारस से निकलकर पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध हो गया. ( Photo: ITGT) यह आम बनारस से निकलकर पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध हो गया. ( Photo: ITGT)

राधा तिवारी

  • नई दिल्ली,
  • 27 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:23 PM IST

गर्मी का मौसम आते ही बाजारों में तरह-तरह के आमों की खुशबू फैल जाती है. भारत में आम को फलों का राजा कहा जाता है, और इसकी कई किस्में लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं. इन्हीं में से एक खास किस्म है लंगड़ा आम, जिसका नाम सुनते ही लोगों के मन में एक अलग ही स्वाद का अहसास होता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस आम का नाम 'लंगड़ा' क्यों पड़ा? इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और इमोशनल कहानी जुड़ी हुई है. एक साधारण इंसान की मेहनत, पहचान और सम्मान की ये कहानी इस आम को और भी खास बना देती है. तो चलिए, जानते हैं लंगड़ा आम के नाम के पीछे की पूरी कहानी, जो आपको जरूर हैरान कर देगी.

Advertisement

लंगड़ा आम के नाम की कहानी
लंगड़ा आम उत्तर भारत की सबसे लोकप्रिय और पसंद की जाने वाली आम की किस्मों में गिना जाता है. इसका नाम सुनते ही लोगों दिमाग में एक ही बात आती है कि आखिर किसी आम का नाम लंगड़ा कैसे रखा जा सकता है. दरअसल, इसके पीछे एक पुरानी और रोचक कहानी जुड़ी हुई है, जो इसे और भी खास बनाती है. माना जाता है कि इस आम की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के वाराणसी, जिसे बनारस भी कहा जाता है, में हुई थी. कई वर्षों पहले वहां एक साधु या फकीर रहते थे, जो चलने में असमर्थ थे और लंगड़ाकर चलते थे.

उस फकीर के आंगन में एक छोटा सा बाग था, जो सामान्य पेड़ों से अलग और बेहद खास था. जिसकी वह बहुत लगन और मेहनत से देखभाल करते थे, अपनी कमजोरी के बावजूद उन्होंने कभी अपने काम में कमी नहीं आने दी. वह हर पेड़ को बड़े प्यार और ध्यान से देखभाल करते था. एक दिन जब वह अपने बाग का निरीक्षण कर रहा था, तो उनकी नजर एक खास आम के पेड़ पर पड़ी. वह पेड़ बाकी पेड़ों से ज्यादा हरा-भरा और स्वस्थ दिख रहा था. उसकी टहनियों पर लगे आम भी कुछ अलग ही नजर आ रहे थे.

Advertisement

जब उन आमों को पकने के बाद चखा गया, तो उनका स्वाद सभी को चौंका देने वाला था. उन्होंने पड़ोसियों और गांव के लोगों को भी ये आम चखने के लिए दिए. धीरे-धीरे इन आमों की चर्चा पूरे गांव में फैल गई. लोगों ने उस आम को चखा, तो उनके स्वाद, मिठास और खुशबू ने सबका दिल जीत लिया. धीरे-धीरे इस आम की चर्चा पूरे इलाके में फैलने लगी और लोग उस आम के टेस्ट को काफी ज्यादा पसंद करने लगे और काफी दूर-दूर तक इस आम की चर्चा होने लगी.

जैसा कि उन फकीर बाबा को लोग 'लंगड़ा बाबा' कहते थे, इसलिए उस पहचान के आधार पर इस खास किस्म के आम को 'लंगड़ा आम' कहा जाने लगा. समय के साथ यह नाम इतना प्रसिद्ध हो गया कि आज यह आम पूरे देश में इसी नाम से जाना जाता है. धीरे-धीरे यह आम बनारस से निकलकर पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध हो गया. फिर इसकी खेती भारत के कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में होने लगी. इसके अलावा बांग्लादेश और अन्य पड़ोसी देशों में भी इसकी पहचान बन गई.

लंगड़ा आम की खास पहचान
लंगड़ा आम अपनी खास बनावट और रंग के कारण आसानी से पहचाना जा सकता है. लंगड़ा आम की पहचान भी काफी खास होती है. इसका आकार अंडाकार होता है और नीचे की ओर हल्का नुकीलापन होता है. सबसे खास बात यह है कि यह आम पूरी तरह पकने के बाद भी हरे रंग का ही रहता है. इसका छिलका पतला होता है और इसके पल्प काफी मुलायम, रसदार और बिना रेशे वाला होते हैं. स्वाद के मामले में भी लंगड़ा आम सबसे अलग माना जाता है. इसमें मिठास और हल्की खटास का बेहतरीन संतुलन होता है, जो इसे खास बनाता है. इसकी खुशबू इतनी आकर्षक होती है कि यह दूर से ही लोगों को अपनी ओर खींच लेती है. इसे ठंडा करके खाने का मजा और भी बढ़ जाता है, और कई लोग इसका इस्तेमाल शेक, जूस और मिठाइयों में भी करते हैं.

Advertisement

आम खाने के फायदे
आम सिर्फ स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है. इसमें विटामिन C, विटामिन A, विटामिन K, पोटैशियम और फोलेट जैसे कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. आम खाने ले शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ती है, जो हमें बीमारियों से बचाती है. इसके अलावा इसमें मौजूद फाइबर डायजेशन को  बेहतर बनाता है. आम में मौजूद विटामिन A और बीटा-कैरोटीन आंखों की रोशनी को बेहतर बनाए रखते हैं, जबकि विटामिन C और A त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाने में मदद करते हैं.

चलिए जानते हैं चौसा, दशहरी का क्या है इतिहास

चौसा आम की क्या है कहानी
सबसे पहले बात करते हैं चौसा आम की. चौसा आम का इतिहास भारत के प्रसिद्ध शासक शेरशाह सूरी से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि साल 1539 में बिहार के चौसा नाम के स्थान पर शेरशाह सूरी और मुगल बादशाह हुमायूं के बीच एक बड़ा युद्ध हुआ था, जिसे चौसा का युद्ध कहा जाता है. इस युद्ध में शेरशाह सूरी की जीत हुई. जीत के बाद जब जश्न मनाया जा रहा था, तब उन्हें वहां के आम बहुत पसंद आए. उन आमों का स्वाद इतना मीठा और रसीला था कि उन्होंने खुश होकर उनका नाम उसी जगह के नाम पर चौसा आम रख दिया, ताकि यह जीत हमेशा याद रहे.

Advertisement

दशहरी आम का इतिहास
अब बात करते हैं दशहरी आम की. इस आम का नाम उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास स्थित दशहरी गांव से पड़ा है. कहा जाता है कि इस गांव में एक खास आम का पेड़ था, जिसके फल बहुत ही मीठे और खुशबूदार थे. धीरे-धीरे इसकी चर्चा फैलने लगी और लोग इसे दशहरी आम कहने लगे. उस समय अवध के नवाब को यह आम बहुत पसंद था, इसलिए इसे राजसी आम भी कहा जाने लगा. आज यह आम भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी काफी मशहूर है.

आमों की रानी की कहानी
अब जानते हैं केसर आम के बारे में. केसर आम की शुरुआत गुजरात के जूनागढ़ और गिरनार पहाड़ियों के आसपास के इलाके से जुड़ा माना जाता है. कहा जाता है कि साल 1931 में जूनागढ़ के नवाब ने जब इस आम को पहली बार खाया, तो उसके रंग और खुशबू से बहुत प्रभावित हुए. इस आम के पल्प हल्के पीले-नारंगी होते हैं, जो बिल्कुल केसर जैसे दिखते हैं. इसी वजह से इसका नाम केसर आम रखा गया. स्वाद में भी यह बेहद मीठा और शाही होता है, इसलिए इसे आमों की रानी भी कहा जाता है.


 

मालदा आम का किस्सा
अब बात करते हैं मालदा आम की. इसका नाम पश्चिम बंगाल के मालदा जिला से जुड़ा है, जिसे आम की नगरी भी कहा जाता है. यहां सदियों से आम की खेती होती आ रही है. कहा जाता है कि मुगल काल और अंग्रेजों के समय में यहां के आम शाही दरबारों में भेजे जाते थे. खास बात यह है कि मालदा आम किसी एक किस्म का नाम नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र में उगने वाली कई बेहतरीन किस्मों को मिलाकर यह नाम इस्तेमाल किया जाता है.

Advertisement

अल्फांसो की कहानी
अब जानते हैं अल्फांसो आम के बारे में, जिसे हापुस आम भी कहा जाता है. यह आम मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक में उगाया जाता है. इसका इतिहास पुर्तगालियों से जुड़ा है. 16वीं सदी में जब अल्फांसो डी अल्बुकर्क भारत आए, तो उनके नाम पर इस आम का नाम अल्फांसो रखा गया. पुर्तगालियों ने आम की खेती में नई तकनीक कलम विधि का इस्तेमाल किया, जिससे यह खास किस्म तैयार हुई. यह आम अपने गाढ़े स्वाद, खुशबू और कम रेशों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है.

क्यों नाम पड़ा सिंदूरी आम
अब बात करते हैं सिंदूरी आम की. यह आम अपने रंग के कारण जाना जाता है. जब यह पकता है, तो इसका रंग हल्का लाल और नारंगी हो जाता है, जो बिल्कुल सिंदूर जैसा दिखता है. इसी वजह से इसका नाम सिंदूरी आम रखा गया. इसकी खेती उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में होती है इसका स्वाद भी काफी अच्छा और मीठा होता है, जिससे यह लोगों के बीच लोकप्रिय है.

आंध्र प्रदेश के सफेदा आम का इतिहास
अंत में बात करते हैं बैगनपल्ली आम की, जिसे बंगनपल्ली या सफेदा आम भी कहा जाता है. इसका नाम आंध्र प्रदेश के बैगनपल्ली कस्बे पर रखा गया है. कहा जाता है कि इस इलाके में सबसे पहले इस आम की खेती बड़े स्तर पर शुरू हुई थी. यहां के राजाओं और नवाबों ने इसे उगाना शुरू किया, और धीरे-धीरे यह आम पूरे दक्षिण भारत में प्रसिद्ध हो गया. यह आम आकार में बड़ा, हल्के पीले रंग का और स्वाद में मीठा होता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement