ईरान और इजरायल के बीच जारी जंग अब ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिख रही है, जहां दोनों देश एक-दूसरे के संवेदनशील ठिकानों को भी निशाना बना रहे हैं. ताजा घटनाक्रम में ईरान ने इजरायल के दक्षिणी शहरों डिमोना और अराद पर मिसाइल हमले किए हैं. इन हमलों में रिहायशी इलाकों को नुकसान पहुंचा है और कई लोग घायल हुए हैं.
इजरायल सरकार ने आरोप लगाया है कि ईरान जानबूझकर नागरिक इलाकों को निशाना बना रहा है. वहीं ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई उसके नतांज परमाणु ठिकाने पर हुए हमले के जवाब में की गई है. इस तरह दोनों देशों के बीच टकराव और गहराता दिख रहा है.
डिमोना क्यों है इजरायल की कमजोर नस
डिमोना, जो नेगेव रेगिस्तान में स्थित एक छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद अहम शहर है, इस हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ गया है. इस शहर के पास इजरायल की एक महत्वपूर्ण परमाणु सुविधा स्थित है, जिसे लंबे समय से सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माना जाता रहा है. इजरायली सेना के अनुसार, हमले के दौरान एक इमारत पर सीधा मिसाइल गिरा, जिससे आसपास के इलाकों में नुकसान हुआ.
विश्लेषकों का मानना है कि यह इलाका इजरायल की 'कमजोर नस' की तरह देखा जाता है, जहां हमला कर ईरान ने एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की है. कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, मिसाइल सीधे परमाणु साइट पर नहीं गिरी, बल्कि उसके आसपास के क्षेत्र को निशाना बनाया गया. इसके बावजूद इस हमले को एक रणनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि इजरायल के संवेदनशील ठिकाने भी ईरान की मिसाइलों की जद में हैं, जो किसी बड़े नुकसान की आशंका को और बढ़ा सकते हैं.
क्या कहलाता है 'मिनी इंडिया'
डिमोना को लेकर चर्चा सिर्फ परमाणु ठिकाने तक सीमित नहीं है. इस शहर की एक और पहचान भी है, जो इसे अलग बनाती है. डिमोना को 'मिनी इंडिया' कहा जाता है. इसकी वजह यहां रहने वाला भारतीय मूल का यहूदी समुदाय है.
1950 और 1960 के दशक में भारत के महाराष्ट्र, केरल और गुजरात से यहूदी समुदाय के लोग इजरायल आए और डिमोना सहित कई इलाकों में बस गए. इनमें बेने-इज़राइल, कोचीन और बगदादी यहूदी समुदाय प्रमुख हैं. समय के साथ यहां भारतीय मूल के लोगों की एक बड़ी आबादी बस गई, जो आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए हुए है.
1955 में जब इस शहर की बसावट शुरू हुई, तब उत्तरी अफ्रीका के साथ-साथ भारत से भी लोग यहां आए थे. आज डिमोना में हजारों की संख्या में भारतीय मूल के यहूदी रहते हैं. यही वजह है कि यहां भारतीय संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है.
स्थानीय स्तर पर भारतीय खान-पान, मसाले, संगीत और परंपराएं आज भी जीवित हैं. कई घरों में मराठी बोली जाती है और भारतीय त्योहार भी मनाए जाते हैं. इस सांस्कृतिक प्रभाव के कारण ही डिमोना को 'लिटिल इंडिया' कहा जाता है.
क्या है इनकी कहानी
कहानी उस वक्त की है, जब भारत के महाराष्ट्र, केरल और गुजरात से निकले बेने-इजरायल यहूदी एक नई उम्मीद लेकर इजरायल पहुंचे थे. साल 1948 से 1960 के बीच जब ये लोग बड़ी संख्या में वहां पहुंचे, तो उन्हें लगा था कि अपने 'धार्मिक घर' में उन्हें अपनापन मिलेगा. लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली.
कई रिपोर्ट के मुताबिक,नए देश में कदम रखते ही उन्हें एक अलग तरह की लड़ाई का सामना करना पड़ा. रंग, भाषा और संस्कृति के कारण उन्हें मुख्यधारा से अलग देखा गया. कई जगह उन्हें 'एशियाई' या 'पिछड़ा' कहकर नीचा दिखाया गया. समाज में दूरी थी, और यह दूरी सिर्फ सोच तक सीमित नहीं थी.यह उनके रोजमर्रा के जीवन में भी साफ नजर आती थी.
उन्हें बड़े शहरों के बजाय डिमोना और बियर शेवा जैसे दूर-दराज के इलाकों में बसाया गया. यहां नौकरी के मौके सीमित थे और ज्यादातर काम अकुशल मजदूरी से जुड़े थे. घर, इलाज और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं में भी भेदभाव की शिकायतें सामने आईं. बच्चों के लिए स्कूल तक ढूंढना मुश्किल हो जाता था.
लेकिन सबसे बड़ा झटका उन्हें धार्मिक पहचान को लेकर लगा. कुछ धार्मिक संस्थानों ने उनकी 'यहूदी पहचान' पर ही सवाल खड़े कर दिए. शादी जैसे निजी फैसलों में भी उनसे जांच या शर्तें पूरी करने को कहा गया. यह उनके लिए सिर्फ नियम नहीं, बल्कि सम्मान पर चोट जैसा था.
खुद की पहचान के लिए किया संघर्ष
यहीं से शुरू हुआ उनका संघर्ष. 1950 के दशक की शुरुआत में बेने-इज़राइल समुदाय ने शांतिपूर्ण विरोध का रास्ता चुना. भूख हड़ताल, धरना और गांधीवादी तरीके से आंदोलन किए गए. कुछ लोगों ने तो भारत लौटने तक का फैसला कर लिया. यह मुद्दा भारत की संसद तक पहुंचा, जहां उनके साथ हो रहे व्यवहार पर चिंता जताई गई.
धीरे-धीरे उनकी आवाज सुनी जाने लगी. साल 1964 में इजरायल की संसद ने एक अहम फैसला लिया.बेने-इजरायल को हर मामले में अन्य यहूदियों के बराबर माना जाएगा. यह सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि उनके संघर्ष की जीत थी.
समय बदला, हालात बदले और पहचान भी. आज वही समुदाय इजरायल के समाज का एक मजबूत और सम्मानित हिस्सा है. डिमोना जैसे शहर, जिन्हें 'मिनी इंडिया' कहा जाता है, उनकी जीवंत संस्कृति की मिसाल हैं. यहां मराठी बोली जाती है, भारतीय खाने की खुशबू मिलती है, और त्योहारों में भारत की झलक साफ दिखाई देती है.
आज बेने-इज़राइल लोग डायमंड ट्रेड, आईटी, केयरगिविंग जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुके हैं. नई पीढ़ी पूरी तरह इजरायली समाज में घुल-मिल चुकी है, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ाव अब भी कायम है.
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