16 मार्च 1935 को हिटलर ने जर्मन आर्मी को बढ़ाने की घोषणा की. इसके साथ ही सेना में भर्ती शुरू हो गई. ऐसा करके हिटलर ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद किए गए वर्साय की संधि की शर्तों को तोड़ दिया था. वर्साय की संधि को तोड़ने का साफ मतलब था कि जर्मनी एक बार फिर मित्र राष्ट्रों के खिलाफ उठ खड़ा होने के लिए तैयार है.
जर्मनी में हिटलर के प्रभाव में आते ही, उसने सबसे पहले एक-एक कर वर्साय की संधि की शर्तों को तोड़ना शुरू किया. इस संधि के तहत जर्मनी को 1920 से वायु सेना रखने से प्रतिबंधित कर दिया गया था, और उसे केवल 100,000 सैनिकों की सीमित सेना रखने की अनुमति थी.
वर्साय की संधि तोड़ दी थी और फिर से जर्मनी की सेना में भर्ती शुरू कर दी थी. वह जर्मन आर्मी की संख्या बढ़ाकर 5 लाख करना चाहता था. जबकि, प्रथम विश्वयुद्ध के बाद युद्ध अपराधी बताकर जर्मनी को वर्साय की संधि के शर्तों के तहत एक लाख से ज्यादा सैनिक रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.
हिटलर ने सबसे पहले लूफ्टवाफे की स्थापना, जो जर्मन वायुसेना थी. 16 मार्च 1935 को जर्मन सेना के आकार में वृद्धि की घोषणाएं सार्वजनिक रूप से की. यह घोषणा दर्शाती थीं कि जर्मनी अंतरराष्ट्रीय कानून और वर्साय की संधि की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है. हिटलर ने भर्ती शुरू कर जर्मन सेना का आकार बढ़ाकर 500,000 सैनिक कर दिया. 1939 तक, जर्मन सेना में लगभग दस लाख सैनिक थे और लूफ़्टवाफ़े के पास 8000 विमान थे.
आर्मी को बढ़ाने की घोषणा के महज तीन महीने बाद जून 1935 को, नाजियों ने ब्रिटेन के साथ एंग्लो-जर्मन नौसैनिक समझौता किया. इस समझौते के तहत, जर्मनी अपनी नौसेना का आकार ब्रिटिश नौसेना के 35% तक बढ़ा सकता था. ब्रिटेन ने जर्मनी के खिलाफ एक बड़ी नौसैनिक हथियारों की होड़ से बचने के लिए यह समझौता किया था.
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इस समझौते ने एक बार फिर वर्साय की संधि में निर्धारित शस्त्रों पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन किया. ब्रिटेन ने फ्रांस या इटली जैसे अन्य यूरोपीय देशों से परामर्श किए बिना ही समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए.
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एक साल बाद 1936 में जर्मनी ने राइनलैंड पर कब्जा कर लिया और उस पर अपनी सेना की तैनाती शुरू कर दी. राइनलैंड जर्मनी का वह इलाका था जो फ्रांस की सीमा से लगता था और जिस पर प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद वर्साय की संधि के तहत राइनलैंड का डिमिलिट्राइजेशन कर दिया गया था.
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