आज के दिन यानी 5 फरवरी को इतिहास में एक ऐसी घटना हुई, जिसने दूसरे विश्वयुद्ध का रुख बदल दिया. लीबिया पर इटली का कब्जा था. जब वहां ब्रिटिश सेना पहुंची और बढ़त बनाने लगी तो इटली के सैनिक लीबिया के मोर्चे से पीछे हटने लगे. 1941 की शुरुआत में लीबिया इटली के हाथ से निकलने लगा था. तब 5 फरवरी 1941 को एडॉल्फ हिटलर ने अपने सहयोगी बेनिटो मुसोलिनी को फटकार लगाते हुए कहा था कि ड्यूस अपनी सेना को ब्रिटिश सेना से डटकर लड़ने को कहो.
उस वक्त ब्रिटेन ने इटली को लीबिया से पूरी तरह खदेड़ने की धमकी दी थी. तब हालात ऐसे बन गए थे कि लीबिया पर इटली की पकड़ कमजोर होने लगी थी. ब्रिटेन ने ट्यूनीशिया तक पहुंचने की धमकी भी दी थी. तब मुसोलिनी को हिटलर से मदद मांगनी पड़ी थी.
पूर्वी अफ्रीका और मिस्र के कुछ हिस्सों में विस्तार के बावजूद, मुसोलिनी की सेनाएं अंततः अंग्रेजों का मुकाबला नहीं कर पाईं. ब्रिटिश सैनिकों ने इटालियंस को पश्चिम की ओर धकेल दिया और बेदा फोम पर हमले में एक्सिस सेनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया. जब ब्रिटेन ने इटालियंस को लीबिया से पूरी तरह खदेड़ने और ट्यूनीशिया तक पहुंचने की धमकी दी, तो मुसोलिनी ने अपना अहंकार त्यागकर हिटलर से सहायता मांगी.
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हिटलर अनिच्छा से मदद को सहमत हो गए. इसका मतलब था भूमध्य सागर में पहली बार जर्मनी और ब्रिटेन के बीच सीधा टकराव. हिटलर मदद के लिए केवल इस शर्त पर तैयार हुआ था कि मुसोलिनी इटालियंस की वापसी को रोके और अंग्रेजों को लीबिया की राजधानी त्रिपोली से दूर रखे. इसलिए वह मुसोलिनी पर पहली बार गुस्सा भी हुआ था.
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इटालियंस लगातार हारते रहे. तीन महीनों में 20,000 सैनिक घायल या मारे गए और 130,000 को बंदी बना लिया गया. जर्मन जनरल इरविन रोमेल के आगमन के बाद ही इतालवी प्रतिरोध को ब्रिटिश आक्रमणों के विरुद्ध मजबूती मिली. जर्मनी की मदद के बावजूद भी, इटली केवल 1943 की शुरुआत तक ही अपने उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र की रक्षा कर सका.
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