बॉम्बे का नाम 20 साल पहले मुंबई हो गया था, मद्रास का चेन्नई, इलाहाबाद का प्रयागराज लेकिन उनके हाईकोर्ट्स का नाम आज भी बॉम्बे हाईकोर्ट, मद्रास हाईकोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट है. इधर उत्तराखंड में हाई कोर्ट ही नैनीताल से शिफ्ट किया जा रहा है. उत्तराखंड सरकार की कैबिनेट में प्रस्ताव पास होने के बाद इसके पक्ष और विपक्ष में लामबंदी तेज हो गई है. कोर्ट की शिफ्टिंग का समर्थन और विरोध करने वाले पक्षों के अपने तर्क हैं.
शिफ्टिंग के विरोधी कह रहे हैं कि 73 हजार करोड़ के कर्ज में डूबे उत्तराखंड के लिए ये हर दृष्टिकोण से गैर जरूरी है. राज्य में बुनियादी सुविधाओं, सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा की बजट के अभाव में बुरी स्थिति है. बीजेपी हर चुनाव में पर्वतीय राज्य की स्थापना का श्रेय लेकर पहाड़ की हितैषी होने का दावा कर वोट मांगती है लेकिन इतनी महत्वपूर्ण संस्था को पहाड़ से नीचे उतार रही है, वह भी तब जब न ही इसे लेकर कोई जन आंदोलन हुआ है, न ही इसकी कोई मांग ही थी.
पक्ष में क्या दलील, विरोध का क्या कारण?
शिफ्टिंग के समर्थकों का तर्क है कि हाईकोर्ट की वजह से भारी तादाद में फरियादी नैनीताल आते हैं, इससे नगर में भीड़ बढ़ने से जाम लगता है. लेकिन विरोधियों का कहना है कि हाईकोर्ट में प्रतिदिन औसतन केवल 150 नये मामले दर्ज होते हैं. ये फरियादी नैनीताल आते हैं जबकि पुराने मामलों में फरियादी, गवाह या अन्य को हाईकोर्ट नहीं आना होता है. इसलिए इसका जाम लगने से कोई संबंध नहीं है.
शिफ्टिंग समर्थकों का तर्क है कि वादकारियों को नगर में महंगे होटलों में रहना, खाना पड़ता है. उन्हें ज्यादा खर्च करना पड़ता है, जबकि विरोधियों का कहना है कि नैनीताल में छोटे बड़े हर स्तर व बजट के होटल हैं, धर्मशाला, मुसाफिरखाना, गुरुद्वारा आदि भी आवास की सुविधा देते हैं. साधारण पर्यटक भी यहां भारी तादाद में आते व अपने बजट के अनुरूप रहते हैं. सबसे अच्छा व सस्ता खाना जहां मिलता है उनमें हाईकोर्ट की कैंटीन और इसके आस पास के रेस्टोरेंट शामिल हैं. साथ ही फरियादियों के लिए रात में यहां रहना जरूरी भी नहीं होता है. क्या जरूरी है कि वे महंगे होटलों में ही रहें?
समर्थक ये भी तर्क दे रहे हैं नगर में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है जिसके कारण न्यायाधीशों व अन्य के लिए परेशानी हो सकती है लेकिन विरोधी इसे खारिज करते हुए कहते हैं कि नगर में जीबी पंत (रैमजे) अस्पताल का 18 एकड़ में फैला बहुत बड़ा परिसर व अस्पताल है जिसमें चिकित्सकों व कर्मचारियों के आवास, नर्सेज हॉस्टल, लौंड्री, किचन, फार्मेसी सहित मरीजों के प्राइवेट और जनरल वार्ड, ऑपरेशन थिएटर सब कुछ है लेकिन यहां चिकित्सक न होने से सुविधाओं का अभाव है. ब्रिटिश काल में यह उत्तर प्रदेश के प्रमुख अस्पतालों में शामिल था. यहां बहुत ही कम खर्च में आधुनिक सुविधा विकसित हो सकती हैं जो सभी के काम आएंगी. इसके अलावा मात्र 8 किमी दूर स्थित भवाली सेनेटोरियम में भी सैकड़ों एकड़ भूमि व भवन उपलब्ध हैं. उसकी भी ऐसी ही दुर्गति है.
शिफ्टिंग के समर्थन में एक तर्क ये भी दिया जाता है कि हाईकोर्ट में बीस हजार अधिवक्ता पंजीकृत हैं, इस वजह से भी नगर में भीड़ और बोझ बढ़ गया है. कोर्ट जाने से बोझ कम होगा लेकिन विरोधी ये कहकर इसे खारिज कर देते हैं कि हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में मात्र 3500 अधिवक्ता पंजीकृत हैं. पंजीकरण के बगैर हाईकोर्ट में प्रैक्टिस नहीं की जा सकती. इन 3500 में बहुत बड़ी संख्या उनकी भी है जो अन्यत्र रहते हैं कभी कभार ही कोर्ट आते हैं.
इसके अलावा जहां तक जाम लगने का सवाल है तो नैनीताल में सबसे ज्यादा जाम गर्मियों में, वीकेंड पर और नये साल के दौरान लगता है. इन सभी अवसरों पर अधिकांश में हाईकोर्ट में अवकाश रहता है. जाम मसूरी सहित हर छोटे बड़े हिल स्टेशन सहित हल्द्वानी में भी बहुत लगता है. जाम का कोर्ट से कोई संबंध नहीं है. शिफ्टिंग से नगर में बोझ कम होने का तर्क भी बेमानी है क्योंकि यदि कोर्ट अन्यत्र चला भी गया तो उसके भवन यहीं रहेंगे और उनमें कोई न कोई कार्य तो किया ही जायगा तो बोझ कम कैसे होगा.
हाईकोर्ट के नैनीताल में होने से यहां जाम ज्यादा नहीं बल्कि कम लगता है क्योंकि कई बार कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर यातायात रेगुलेट करने के निर्देश दिये. हाईकोर्ट के निर्देश के बाद ही अब ज्यादा भीड़ वाले दिनों में बगैर बुकिंग या बगैर पार्किंग सुविधा की पूर्व व्यवस्था के वाहनों को नगर में प्रवेश नहीं दिया जाता जिससे यहां की यातायात व्यवस्था अब प्रदेश में अन्य शहरों के मुकाबले सबसे बेहतर है. इन कारणों से ही बीते दिनों यहां विभिन्न राजनैतिक दलों के लोगों, व्यापारियों, नगर पालिका अध्यक्ष व सदस्यों, जिला बार एसोसिएशन, पूर्व सांसद व बार हाईकोर्ट अध्यक्ष आदि ने हाईकोर्ट की शिफ्टिंग के विरोध में जुलूस निकाला था.
ये तथ्य भी बहुत महत्वपूर्ण हैं:
1. कई राज्यों में कोई उच्च न्यायालय नहीं है.
2. तेलंगाना ने अपने लिए उच्च न्यायालय की मांग की थी जिस पर केंद्र ने भारी खर्च के आधार पर इनकार कर दिया.
3. यूपी के अधिवक्ताओं ने मेरठ में एक बेंच की मांग को लेकर दशकों तक हर शनिवार को एक साथ हड़ताल की, जो नहीं मांगी गई. हालांकि भी मांग राज्य के आकार और दूरियों को ध्यान में रखते हुए उचित भी कही जा सकती थी.
4. शिमला में भी नैनीताल जैसे ही हालात हैं. नैनीताल की तुलना में शिमला में पर्यटकों की संख्या अधिक होती है. यह हिमाचल प्रदेश में एक कोने पर स्थित है.इसे शिफ्ट करने की ऐसी कोई मांग नहीं है.
5. शिफ्टिंग का समर्थन करने वाले लोगों का तर्क है कि नैनीताल की यात्रा करना मुश्किल है. वही लोग पहले इलाहाबाद जाते थे उन मुकदमों के लिए जो दो दिन का सफर एक तरफ कर लेते थे.
हाईकोर्ट शिफ्टिंग के पक्षधर अधिवक्ताओं ने प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश, मुख्य न्यायाधीश उत्तराखंड हाईकोर्ट समेत प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर हाईकोर्ट को गौलापार हल्द्वानी शिफ्ट करने की मांग की है. साथ ही इस प्रपत्र में हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं के हस्ताक्षर भी कराए गए हैं. उधर, हाईकोर्ट शिफ्ट करने का विरोध कर रहे अधिवक्ताओं ने कहा कि यूपी सरकार ने वर्ष 1998 में उत्तराखंड के अलग राज्य बनने पर हाईकोर्ट के इलाहाबाद में ही रहने का प्रस्ताव पारित किया जिसका राज्य आंदोलनकारियों ने विरोध किया था.
मामले के जानकार क्या सोचते हैं?
उत्तराखंड हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद वशिष्ठ कहते हैं कि नैनीताल में इंफ्रास्ट्रक्चर डिफिकल्टीज अपनी है. नैनीताल एक पर्यटन नगर है यहां पर एकोमोडेशन महंगे हैं. जब नए एडवोकेट आते हैं या वादी आते हैं तो उनके रहने के लिए होटेल्स की अकोमोडेशन की परेशानियां होती है. इन सबको देखते हुए और फिर हाईकोर्ट टाउनशिप की तरह होता है तो एक ऐसा डेवलपमेंट जहां हाईकोर्ट हो उसके पास ऐसे कार्यालय हों जिनकी जरूरत हो, हाईकोर्ट के ऑफिस, वकीलों के ऑफिस ऐसी जगह की बहुत आवश्यकता है. जिस वक्त प्रदेश बना था उसमें एक अलग आउटलुक था अब आपको अगले सौ साल डेढ़ सौ साल के लिए प्लानिंग करनी है. तो मेरी अभी राय तो यह है कि अगर हाईकोर्ट शिफ्ट होती है तो यह बिल्कुल सही समय है और हाई कोर्ट को शिफ्ट किया जाए एक इंस्टीट्यूशन की तरह एस्टेबलिस किया जाए जिससे वादी को जिसके लिए यह पूरा इंस्टीट्यूशन काम करता है उसको एडवांटेज मिल सके.
वहीं राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष रमन शाह कहते हैं कि ना तो इस वक्त हाई कोर्ट को शिफ्ट करने का कोई सेंट्रल नोटिफिकेशन आया है ना स्टेट से कोई नोटिफिकेशन आया है. नैनीताल के भारतीय जनता युवा मोर्चा के पूर्व जिलाध्यक्ष नितिन कार्की कहते हैं कि हाईकोर्ट नैनीताल में बन चुका है, 20 वर्ष भी हो चुके हैं. करोड़ों रुपया इसमें खर्च हो चुका है और अब इसको तराई में ले जाना या कहीं और ले जाना मुझे लगता है पैसों की बर्बादी और पलायन को बढ़ावा देना है. इससे बढ़िया होगा कि हम इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम करें, हम नैनीताल के आसपास सड़कों पर काम करें, हम पार्किंग पर काम करें लेकिन हाई कोर्ट को अंयत्र शिफ्ट करना पैसों की बर्बादी और पलायन को बढ़ावा देना है.
होटल इंडस्ट्री सरकार के साथ या नहीं?
वहीं नॉर्थ इंडिया होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के डायरेक्टर प्रवीण शर्मा कहते हैं कि हाई कोर्ट जब यहां पर आया हम लोग तब भी इसका विरोध कर रहे थे क्योंकि पर्यटन की दृष्टि से हमको नेगेटिविटी मिली. जब भी सीजन का समय आता है तो सारा प्रशासन शासन पर्यटकों को ही प्रताड़ित करता है हाई कोर्ट से कोई ऑब्जेक्शन आ जाए उसी डर से शासन डरा रहता है और हमेशा पर्यटकों को प्रताड़ित करता है और उसे हमारा पर्यटन व्यवसाय बहुत प्रभावित हुआ है. इसलिए हम चाहते हैं कि हाई कोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट किया जाए जल्दी से जल्दी.
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सैयद नदीम मून कहते हैं कि हाईकोर्ट के निर्माण में अब तक हजारों करोड़ रुपए खर्च हो गए. अगर सरकार किसी दूसरे स्थान पर हाईकोर्ट बनाएगी उसमें फिर से करोड़ों रुपए खर्च होंगे जिससे जनता के पैसों का दुरुपयोग होगा. राज्य में स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग लगातार बदहाल स्थिति में है. सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए ना कि हाईकोर्ट समेत अन्य संस्थानों को मैदानी क्षेत्रों की तरफ स्थापित करना चाहिए. सरकार को ऐम्स, उच्च शिक्षण संस्थान, समेत कई उद्योगों को पहाड़ी जिलों में बनाना चाहिए जिससे पहाड़ी क्षेत्रों का विकास होगा.
हाईकोर्ट को नैनीताल से विस्थापित करने के मामले पर व्यापार मंडल में भी रोष दिखने लगा है. व्यापार मंडल अध्यक्ष मारुती शाह का कहना है कि हाईकोर्ट नैनीताल की शान से जुड़ा है. हाई कोर्ट सम्मानित संस्थान है. हाईकोर्ट नैनीताल में होने से सभी किस्म के अवैध निर्माण कार्य, पर्यावरण संबंधी कार्य, साफ-सफाई, ट्रैफिक व अन्य कार्य बेहतर ढंग से होते हैं. हाईकोर्ट होने से साल भर नैनीताल में लाखों की संख्या में लोग आते हैं. उत्तराखंड की संस्कृति, खाद्य सामग्री समेत यहां के उत्पादों को देश-विदेश तक ले जाते हैं. हाईकोर्ट के नैनीताल में होने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला है. साथ ही स्थानीय युवाओं को काम सीखने का मौका मिला है. लिहाजा हाईकोर्ट नैनीताल से विस्थापित नहीं होना चाहिए.
लीला सिंह बिष्ट