रात डेढ़ बजे कैंप से निकली और 'हवा' हो गई बबीता? 200 मीटर दूर तक मोबाइल चला रही थी ट्रैकर

उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रेक से लापता हुई रामनगर की एमबीए छात्रा बबीता पांडे की तलाश 12वें दिन भी जारी है. पुलिस, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी और अन्य एजेंसियों की संयुक्त टीमें लगातार सर्च ऑपरेशन चला रही हैं. मोबाइल की अंतिम लोकेशन मिलने के बावजूद अब तक कोई ठोस सुराग नहीं मिला है, जिससे रहस्य और गहराता जा रहा है.

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आधी रात कैंप से निकली और 'हवा' हो गई बबीता? (Photo: itg) आधी रात कैंप से निकली और 'हवा' हो गई बबीता? (Photo: itg)

ओंकार बहुगुणा

  • उत्तरकाशी,
  • 10 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:27 PM IST

उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रेक से रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हुई रामनगर की एमबीए छात्रा बबीता पांडे की तलाश अब उत्तराखंड के हालिया सबसे जटिल सर्च ऑपरेशनों में बदलती दिखाई दे रही है. 11 दिन बीत चुके हैं, सैकड़ों किलोमीटर क्षेत्र में तलाशी ली जा चुकी है, लेकिन सवाल अभी भी वहीं खड़ा है- आखिर बबीता गई तो गई कहां?

पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बबीता के मोबाइल की अंतिम सक्रिय लोकेशन दयारा ट्रेक के पड़ाव गोई क्षेत्र से लगभग 200 मीटर नीचे की ओर बताई जा रही है. बताया जा रहा है कि यह लोकेशन मोबाइल एप के रात करीब डेढ़ बजे तक सक्रिय रहने के आधार पर ट्रेस की गई यानी तब तक वह अपना मोबाइल चला रही थी. तकनीकी टीमों ने कथित रूप से एल्फा, बीटा और गामा जैसी तकनीकों के आधार पर अंतिम डिजिटल संकेतों का अध्ययन किया है. हालांकि, अधिकारियों की ओर से इस तकनीकी विश्लेषण का विस्तृत आधिकारिक विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है.

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रात डेढ़ बजे कैंप से निकल गई बबीता

सूत्रों के मुताबिक 29 तारीख की रात बबीता अपने साथियों के साथ गोई बेस कैंप में रुकी थी. बताया जा रहा है कि कैंप में उस रात 15 से 16 टेंट और करीब 60-70 लोग मौजूद थे. चर्चा यह भी है कि किसी बात को लेकर वह साथियों से अलग होकर कुछ दूरी पर चली गई थी. हालांकि इस घटनाक्रम की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है.

इधर, मंगलवार को 11वें दिन भी खोज अभियान युद्धस्तर पर जारी रहा. सीओ उत्तरकाशी जनक सिंह पंवार और बड़कोट पुलिस के नेतृत्व में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी, वन विभाग, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान, आपदा प्रबंधन क्यूआरटी, डॉग स्क्वाइड, स्थानीय लोगों और गाइडों की संयुक्त टीमों ने मोर्चा संभाला. तीन अलग-अलग टीमों ने तीन अलग-अलग मार्गों से सर्च ऑपरेशन चलाया, जबकि तीन ड्रोन टीमें ऊपर से लगातार निगरानी करती रहीं.

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जंगलों, खाई और झाड़ियां खंगाल रही सर्च टीम

करीब 120 से अधिक सदस्य ट्रेक मार्गों, जंगलों, गहरी खाइयों, गदेरों और झाड़ियों में घंटों तक कॉम्बिंग करते रहे. इससे पहले हेली सर्च तक किया जा चुका है, लेकिन अभी तक कोई ऐसा सुराग नहीं मिला जो जांच को निर्णायक दिशा दे सके.

'बबीता को हर ले गईं परियां?'

इस बीच सोशल मीडिया पर प्रसारित 'परियों द्वारा हरण' जैसी बातों को पूर्व ब्लॉक प्रमुख विनीता रावत ने सिरे से खारिज करते हुए इसे अफवाह और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला बताया है. उन्होंने प्रशासन से वैज्ञानिक और तथ्य आधारित खोज अभियान को और तेज करने की मांग की है.

सबसे भावुक तस्वीर रैथल से सामने आई- जहां कई दिनों तक उम्मीद लगाए बैठे परिजन अब भारी मन से लौट चुके हैं. लेकिन सवाल अब भी पहाड़ की चुप्पी में गूंज रहा है. अगर मोबाइल की आखिरी लोकेशन मिल चुकी है. इतने बड़े स्तर पर सर्च हो चुका है तो फिर बबीता अब तक कहां है? फिलहाल इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है और खोज अभियान जारी है.

क्यों प्रसिद्ध है दयारा?

समुद्रतल से 11 हजार फीट की उंचाई पर 28 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले दयारा बुग्याल में रैथल के ग्रामीणों द्वारा सदियों से भाद्रप्रद महीने की संक्रांति को दूध, मक्खन, मट्ठा की होली का आयोजन करते हैं. प्रकृति का आभार जताने के लिए आयोजित किए जाने वाले इस दुनिया के अनोखे उत्सव को रैथल गांव की दयारा पर्यटन उत्सव समिति व ग्राम पंचायत बीते कई वर्षों से बड़े पैमाने पर दयारा बुग्याल में आयोजित करती रही है, जिससे देश विदेश के पर्यटक इस अनूठे उत्सव का हिस्सा बन सके.

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रैथल के ग्रामीण गर्मियों की दस्तक के साथ ही अपने मवेशियों के साथ दयारा बुग्याल समेत गोई चिलापड़ा में बनी अपनी छानियों में ग्रीष्मकालीन प्रवास के लिए पहुंच जाते हैं. उंचे बुग्यालों में उगने वाली औषधीय गुणों से भरपूर घास व अनुकूल वातावरण का असर दुधारू पशुओं के दुग्ध उत्पादन पर भी पढ़ता है. ऐसे में उंचाई वाले इलाकों में सितंबर महीने से होने वाली सर्दियों की दस्तक से पहले ही ग्रामीण वापिस लौटने से पहले अपनी व अपने मवेशियों की रक्षा के लिए प्रकृति का आभार जताने के लिए इस अनूठे पर्व का आयोजन करते हैं.

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