100 साल में पहली बार बंद रही टुंडे कबाब की दुकान, गुरुवार को खुली तो चिकन-मटन के साथ

'टुंडे कबाबी' के करीब 100 साल के इतिहास में बुधवार को ये पहला मौका था कि ये दुकान गोश्त की सप्लाई ना होने की वजह से बंद रही. 'आज तक' गुरुवार को अकबरी गेट वाली पुरानी दुकान पर पहुंचा तो दुकान तो खुली थी लेकिन वहां चिकन और मटन के ही कबाब मिल रहे थे.

चिकन और मटन के ही कबाब मिले
मौसमी सिंह/खुशदीप सहगल
  • लखनऊ,
  • 23 मार्च 2017,
  • अपडेटेड 8:40 AM IST

देश में नॉन वेजिटेरियन खाने का शायद ही ऐसा कोई शौकीन हो जिसने लखनऊ के टुंडे कबाब का नाम ना सुना हो. किसी नॉन वेजेटेरियन का दूसरे शहर से लखनऊ जाना हो तो उसकी ख्वाहिश टुंडे कबाबी की दुकान पर जाकर वहां परोसे जाने वाले पराठा-कबाब का जायका लेने की होती है. टुंडे कबाबी की लखनऊ में दो दुकानें हैं- एक अमीनाबाद में और दूसरी चौक के अकबरी गेट इलाके में.

'टुंडे कबाबी' के करीब 100 साल के इतिहास में बुधवार को ये पहला मौका था कि ये दुकान गोश्त की सप्लाई ना होने की वजह से बंद रही. 'आज तक' गुरुवार को अकबरी गेट वाली पुरानी दुकान पर पहुंचा तो दुकान तो खुली थी लेकिन वहां चिकन और मटन के ही कबाब मिल रहे थे.

दुकान के मालिक रईस अहमद जिन्हें सब हाजी साहब के नाम से बुलाते हैं, उनसे बात की गई तो उन्होंने बताया कि शादी-मौत या त्योहारों को छोड़ दें तो बुधवार को ऐसा पहली बार हुआ कि दुकान बंद रही. उन्होंने बताया कि बूचड़खानें बंद रहने की वजह से बड़े (भैंस) के गोश्त की सप्लाई नहीं हो सकी. गुरुवार को दुकान खुली तो पराठों के साथ सिर्फ चिकन और मटन के ही कबाब बिकते दिखे. मटन के चार कबाब और दो पराठें 70 रुपये में बिके. वहीं चिकन के चार कबाब और दो पराठें 50 रुपये में.

रईस अहमद ने बताया कि पराठें पहले की तरह आज भी 5 रुपये में ही बेचे जा रहे हैं. लेकिन बड़े का कबाब 2 रुपये में बेचा जाता था तो अब चिकन-मटन के कबाब की कीमत चार से पांच गुना बैठ रही है. रईस अहमद के मुताबिक कबाब का साइज भी पहले से बड़ा करना पड़ा है. दुकान में मौजूद रईस अहमद के भांजे ने बताया कि आम दिनों की तुलना में बिक्री 10 फीसदी ही रह गई है. वो मुख्यमंत्री से अपील करना चाहते हैं कि अवध का जायका माने जाने वाले इस मुगलई डिश की परंपरा को बचाने के लिए कोई रास्ता निकालें.

जहां तक टुंडे कबाब के इतिहास की बात है तो इसकी शुरुआत 115 साल पहले मुराद अली ने शुरू की थी. पीढ़ी दर पीढ़ी ये परंपरा लोगों को टुंडे कबाब का जायका देती आ रही है. रईस अहमद बताते हैं कि टुंडे कबाब के खास जायके के पीछे मसालों का सीक्रेट है. कितनी मात्रा में कौन सा मसाला मिलाना है, यही टुंडे कबाब को खास बनाता है.

'आज तक' ने चौक इलाके में ही हलीम खिचड़े का स्टॉल लगाने वाले शम्सुद्दीन से भी बात की. उन्होंने अब अपने स्टाल पर हलीम खिचड़ा के नीचे चिकन बिरयानी का बोर्ड लगा लिया है. शम्सुद्दीन का कहना है कि जब से हलीम खिचड़ा बंद कर चिकन बिरयानी बेचना शुरू किया है, उनका धंधा बिल्कुल मंदा पड़ गया है. उन्होंने बताया कि दिन में अभी तक एक ही ग्राहक उनकी दुकान पर आया है.

 

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