UP के इस गांव में बसे हैं 40 से ज्यादा दामाद, बेहद दिलचस्प है यहां की कहानी

उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा गांव है जहां 40 से ज्यादा घर दामादों के हैं. जिस वजह से उस गांव का नाम भी दामादों के नाम पर ही दमादनपुरवा रख दिया गया है. इस गांव में 500 के करीब आबादी है. आखिर यह गांव कब और कैसे बसा और इसका नाम दमादनपुरवा कैसे और क्यों पड़ा इसके लिए पढ़ें पूरी खबर...

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अकबरपुर तहसील क्षेत्र में बसा दमादनपुरवा गांव. अकबरपुर तहसील क्षेत्र में बसा दमादनपुरवा गांव.

सूरज सिंह

  • कानपुर देहात,
  • 20 अगस्त 2022,
  • अपडेटेड 1:22 PM IST

उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा गांव है जिसकी पहचान दामादों की वजह से है. इसी कारण उसका नाम भी दमादनपुरवा पड़ गया है. दरअसल, कानपुर देहात जिले के अकबरपुर तहसील क्षेत्र में बसा यह दमादनपुरवा गांव मुख्यालय से 10 किलोमीटर की दूरी पर बसा है. गांव वालों के मुताबिक,  इस गांव में सबसे ज्यादा घर दामादों के हैं. इस गांव में करीब 70 घर हैं, जिनमें 40 से ज्यादा घर ऐसे हैं जो कि दामादों के हैं.

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एक-एक कर यहां दामादों ने घर बनाए तो आसपास के गांवों के लोगों ने इस आबादी का नाम ही दमादनपुरवा रख दिया. अंतत: सरकारी दस्तावेज ने भी यह नाम स्वीकार कर इसे सरियापुर गांव का मजरा मान लिया है.

बुजुर्ग बताते हैं कि साल 1970 में सरियापुर गांव की राजरानी का ब्याह जगम्मनपुर गांव के सांवरे कठेरिया से हुआ. सांवरे ससुराल में रहने लगे. जगह कम पड़ी तो गांव के पास ऊसर में उन्हें जमीन दे दी गई. वह अब दुनिया में नहीं हैं, पर उनके द्वारा शुरू किया गया सिलसिला जारी है.

उनके बाद जुरैया घाटमपुर के विश्वनाथ, झबैया अकबरपुर के भरोसे, अंडवा बरौर के रामप्रसाद जैसे लोगों ने सरियापुर की बेटियों से शादी की और इसी ऊसर में घर बना कर रहने लगे. 2005 आते-आते यहां 40 दामादों के घर बन चुके थे. लोग इसे दमादनपुरवा कहने लगे, लेकिन सरकारी दस्तावेजों में इसे नाम नहीं मिला. दो साल बाद गांव में स्कूल बना और उस पर दमादनपुरवा दर्ज हुआ. उधर, परंपरा बढ़ती रही. दामाद बसते रहे. यह मजरा दमादनपुरवा नाम से दर्ज हुआ.

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गांव में सबसे बुजुर्ग दामाद रामप्रसाद.

तीसरी पीढ़ी में भी दामादों ने बसना किया शुरू
गांव के सबसे बुजुर्ग दामाद रामप्रसाद की उम्र करीब 78 साल है. वह 45 साल पहले ससुराल आकर बसे थे. वहीं, सबसे नए दामादों में अवधेश अपनी पत्नी शशि के साथ यहां बसे हैं. अब तीसरी पीढ़ी में भी दामादों ने यहां बसना शुरू कर दिया है. जसवापुर गजनेर से ससुराल में बसे अंगनू अब जीवित नहीं हैं. वह यहां के दामाद थे. अंगनू के बेटे रामदास का दामाद अवधेश तीन साल पहले यहां बस गया. दमादनपुरवा गांव की आबादी करीब 500 के करीब है और 270 वोटर हैं. लोग दमादनपुरवा के बोर्ड पढ़ते हैं तो मुस्कुराते हैं. अब तो पोस्टल एड्रेस में भी यही नाम दर्ज है.

 

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