कायर निकला सोशल मीडिया पर शेखी बघारने वाला आतंकी सबजार, एनकाउंटर में नहीं चला पाया एक भी गोली

सेना सूत्रों ने जो खुलासा किया है उससे पता चलता है कि सबजार हथियार के तौर पर कलाश्निकोव राइफल के बजाए सिर्फ सोशल मीडिया का ही इस्तेमाल जानता था.

आतंकी सबजार के आखिरी पलों की हकीकत
संदीप कुमार सिंह
  • नई दिल्ली,
  • 30 मई 2017,
  • अपडेटेड 10:52 AM IST

वो कश्मीर के भोले-भाले नौजवानों को बरगलाकर मौत के रास्ते पर ले जाता था, कमांडो सरीखी वर्दी में फोटो खिंचवाना उसका शौक था. लेकिन दहशत के खेल में बुरहान वानी का वारिस सबजार अहमद जंग-ए-मैदान में भीगी बिल्ली था. दक्षिणी कश्मीर के त्राल में सबजार के एनकाउंटर के गवाह रहे सेना सूत्रों ने जो खुलासा किया है उससे पता चलता है कि सबजार हथियार के तौर पर कलाश्निकोव राइफल के बजाए सिर्फ सोशल मीडिया का ही इस्तेमाल जानता था.

एक भी गोली नहीं चला पाया था सबजार सबजार के आखिरी लम्हों के गवाह रहे सेना के सूत्रों की मानें तो शनिवार को हुई मुठभेड़ के दौरान सबजार पूरे 10 घंटे खामोश छुपा बैठा रहा. इस दौरान वो एक भी गोली नहीं दाग पाया. अलबत्ता उसने बचकर भागने की हर मुमकिन कोशिश की. इसके लिए सबजार ने अपने मोबाइल फोन से कई संदेश भेजे ताकि पत्थरबाजों को उस जगह बुलाया जा सके और वो अपने अंजाम को टाल सके.

ऐसे हुआ सबजार के ठिकाने का खुलासा त्राल के जंगलों में किसी को भी खोज पाना आसान काम नहीं है. सुरक्षा बलों को सबजार के ठिकाने की टोह जम्मू-कश्मीर पुलिस की टेक्निकल इंटेलिजेंस यूनिट से मिली. ऐसी यूनिट्स हालिया सालों में कई आतंकियों की पनाहगाहों का पता लगा चुकी हैं. सेना के एक सूत्र ने 'मेल टुडे' को बताया, 'पुलिस से मिली खुफिया जानकारी से इस बात की पुष्टि हुई कि सबजार और उसका साथी फैजान साइमोह गांव के घरों में छिपे हैं. इसके बाद शुक्रवार की शाम इन घरों की घेराबंदी की गई.' इस ऑपरेशन में सेना के अलावा स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप और राज्य पुलिस के जवान शामिल थे.

दिया गया था सरेंडर का मौका सबजार और फैजान को घेरने के बाद सुरक्षाबलों ने उससे संपर्क साधने की कोशिश की. लेकिन ना तो कोई जुबानी जवाब मिला और ना ही गोलियों से. सबजार और फैजान शायद अपनी लोकेशन छिपाना चाहते थे. हैरानी की बात ये है कि सबजार और फैजान के पास एके-47 और इंसास राइफल्स समेत बड़ी तादाद में हथियार और रसद मौजूद थे. लेकिन वो इनका इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं जुटा सके. जब दोनों आतंकियों से संपर्क नहीं हो सका तो सुरक्षाबलों ने मौके पर दमकल की गाड़ियां मंगवाई. इनमें पानी की जगह पेट्रोल भरा हुआ था.

नहीं मिली पत्थरबाजों से मदद इस दौरान सबजार और फैजान लगातार फोन पर पत्थरबाजों को बुलाने की कोशिश करते रहे. लेकिन देर रात का वक्त होने के चलते कोई मदद को नहीं आया. सूत्रों ने बताया कि उनके संदेशों में मौत का खौफ साफ झलक रहा था. एक सूत्र ने बताया, 'दमकल गाड़ियों से पहले घर में पेट्रोल छिड़ककर आग लगाई गई. लेकिन दोनों आतंकियों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. दूसरे घर को आग के हवाले करने के बाद भी नतीजा यही रहा. लेकिन शनिवार सुबह करीब सवा आठ बजे जब तीसरे घर को फूंका गया तो सबजार और फैजान घर से बाहर भागे. उनकी कोशिश सुरक्षाबलों की घेराबंदी तोड़ने की थी.' इससे पहले कि दोनों में से कोई भी गोली चला पाता सुरक्षाबलों ने उन्हें निशाना बना दिया.

ऐसे ही खोजा गया था बुरहान सेना के सूत्रों की मानें तो सातवीं के बाद पढ़ाई छोड़ने वाला सबजार लड़कियों का खासा शौकीन था. वो 2 साल पहले आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन में शामिल हुआ था. पिछले साल बुरहान वानी की मौत के बाद सबजार ने दक्षिणी कश्मीर में हिज्बुल मुजाहिदीन की कमान संभाली थी. बुरहान वानी को भी सबजार की ही तरह टेक्निकल इंटेलिजेंस की मदद से ठिकाने लगाया गया था. हालांकि बुरहान के मामले में सुरक्षाबल सरताज नाम के आतंकी की तलाश में थे. लेकिन इस बार उन्हें पुख्ता जानकारी थी कि वो किसे पकड़ने जा रहे हैं.

उल्टी पड़ रही आतंकियों की रणनीति कश्मीर में हालिया दौर में उभर रहे आतंकी सोशल मीडिया को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. इसका मकसद ना सिर्फ नौजवानों को आतंक की आग में झोंकना है बल्कि खुद को बतौर हीरो भी पेश करना है. लेकिन यही शौक सुरक्षाबलों को उनके ठिकाने खोजने में भी मदद दे रहा है.

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