यूजीसी विवाद पर विपक्ष की चुप्पी, रणनीति ही नहीं बल्कि सियासी मजबूरी भी है?

देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म कर समानता लाने के लिए यूजीसी ने नए नियम लागू किए हैं, लेकिन इसे लेकर अब अगड़ी जाति के लोग विरोध में उतर गए हैं. बीजेपी के नेता बेचैन हैं तो विपक्षी दल पूरी तरह से खामोश हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि विपक्ष की चुप्पी मजबूरी है या फिर रणनीति?

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यूजीसी विवाद पर विपक्ष के चुप्पी के मायने क्या हैं? (Photo-PTI) यूजीसी विवाद पर विपक्ष के चुप्पी के मायने क्या हैं? (Photo-PTI)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:05 PM IST

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षण संस्थानों में सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए नए नियम लागू किए हैं. इस नियम को यूनिवर्सिटी कैंपस और कॉलेज में समानता लाने के लिए अहम माना जा रहा है, लेकिन अगड़ी जाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ और वैश्य) के लोग इसके खिलाफ हैं. 

यूजीसी के नए नियम खिलाफ अगड़ी जाति के लोग सड़क पर उतर गए हैं. ऐसे में सड़क से सोशल मीडिया तक विरोध हो रहा है. बीजेपी नेताओं के सामने एक बड़ा धर्म संकट खड़ा हो गया है. बीजेपी के नेताओं की सियासी बेचैनी बढ़ती जा रही है तो विपक्ष के सामने भी धर्म संकट गहरा गया है. 

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यूजीसी के नए नियम को लेकर विपक्ष ने पूरी तरह से चुप्पी अख्तियार कर रखी है. विपक्ष को ना विरोध करते बन रहा है और ना ही खुलकर समर्थन में खड़ा नजर आना चाहता है. ऐसे में सवाल उठता है कि यूजीसी के नए विवाद पर विपक्षी की चुप्पी रणनीति है या सियासी मजबूरी? 

यूजीसी के नए नियम पर सियासी संग्राम
यूजीसी के नए नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को परिभाषित किया गया है और इसे खत्म करने के लिए इक्विटी कमेटियां गठित करने का प्रावधान रखा गया.  इन कमेटियों में केवल आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) के प्रतिनिधित्व की बात कही गई है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों-कर्मचारियों के लिए कोई पर्याप्त सुरक्षा या संतुलन का इंतजाम नहीं है. इसके चलते ही यूजीसी रेगुलेशंस 2026 को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है.

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देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता लाने के लिए लागू किए नए नियम को लेकर अगड़ी जाति के तहत आने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ के लोग सख्त खिलाफ हैं. उनका मानना है कि यह नियम शिक्षण संस्थानों में भेदभाव पैदा करेगा. सवर्ण जाति के लोग अलग-अलग जगह पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और अपनी नाराजगी को जाहिर कर रहे हैं. 

सवर्ण जातियों के विरोध और नाराजगी को देखते हुए बीजेपी नेता भी बेचैन हैं. यूपी में सवर्ण जाति के तमाम पार्टी विधायक और नेताओं ने अपनी नाराजगी भी जाहिर कर रहे हैं. बीजेपी के नेता डैमेज कन्ट्रोल भी करने की कवायद में है, लेकिन विपक्ष पूरी तरह से खामोशी अख्तियार किए हुए है. 

यूजीसी विवाद पर विपक्ष की चुप्पी
यूजीसी विवाद पर विपक्षी दल चुप्प हैं. नए नियम का ना ही खुलकर समर्थन कर रहे हैं और ना ही विरोध करते नजर आ रहे हैं. देश में लंबे समय तक सवर्णों वोटों के सहारे राज करने वाली कांग्रेस भी चुप है तो मंडल पॉलिटिक्स से निकली सपा और आरजेडी भी चुप्पी अख्तियार किए हुए हैं. अन्ना आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी खामोश है तो बहुजन से सर्वजन की राजनीति करने वाली बसपा भी चुप है. 

विपक्षी दल की तरफ से यूजीसी विवाद पर कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है. शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी जरूर सवाल खड़े किए हैं और नए नियम को वापस लेने की गुहार लगाई है. लेकिन, प्रियंका चतुर्वेदी के सिवा किसी भी विपक्षी नेता का कोई भी टिप्पणी सामने नहीं आई है. सत्तापक्ष की खामोशी को समझा जा सकता है, लेकिन विपक्ष की चुप्पी किसी रणनीति का हिस्सा है या फिर सियासी मजबूरी? 

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कांग्रेस की चुप्पी रणनीति या मजबूरी?
मोदी सरकार के हर फैसले पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस खामोश है. कांग्रेस की तरफ से पूर्व सांसद और पार्टी महासचिव जितेंद्र सिंह अलवर ने कहा कि यूजीसी के द्वारा लागू किए गए नियम छात्रों को आपस में बांटने, एक-दूसरे का विरोधी बनाने प्रयास नजर आता है. उन्होंने कहा कि धर्म, जाति, जेंडर और बैकग्राउंड के आधार पर होने वाला भेदभाव किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है. 

जितेंद्र सिंह के सिवा कांग्रेस के किसी बड़े नेता का कोई बयान नहीं दिखा. ना ही राहुल गांधी और ना ही पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कोई बयान दिया है. इस पर यूपी से जुड़े एक कांग्रेस नेता से बातचीत किया तो उन्होंने नाम ना छापने की शर्त पर कहा कि कांग्रेस की पूरे मामले में खामोशी के पीछे एक सोची-समझा प्लान है. राहुल गांधी का पूरा फोकस दलित और ओबीसी वोटों पर है, नए नियम उनके हित में है. कांग्रेस के चुप रहने की एक वजह यह है और दूसरा कारण यह है कि मोदी सरकार यह नियम लाई है तो वही हल करे, उसमें कांग्रेस क्यों बिना वजह समर्थन या विरोध में उतरकर खुद को क्यों सियासी पचड़े में अपने आपको डाले? 

यूजीसी पर सपा का साइलेंट मोड 
यूजीसी विवाद पर सपा का राजनीतिक स्टैंड साफ नहीं है. अखिलेश यादव की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है. सपा ने अपने प्रवक्ताओं को साफ तौर पर निर्देश दिया है कि यूजीसी नियम पर कोई भी राय ना दें, ना ही समर्थन में और ना ही विरोध में. इसके लिए पार्टी की तरफ से मंगलवार को सुबह सभी प्रवक्ताओं को यह संदेश दे दिया है. अखिलेश यादव के बयान आने के बाद ही पार्टी की दशा और दिशा तय होगी.

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सपा के प्रवक्ता ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि यूजीसी के नए नियम का विरोध कर पार्टी अपने पीडीए समीकरण को नाराज नहीं करना चाहती है, क्योंकि यूजीसी का फैसला सामाजिक न्याय के हित में है, लेकिन सवर्ण जातियां जिस तरह से विरोध कर रही है, उसे देखते हुए पार्टी ने चुप रहना ही बेहतर समझा है. सपा का प्लान है कि बीजेपी नियम लाई है तो खुद निपटे, उसमें पड़ने की जरूरत नहीं है. सपा को लगता है कि समर्थन करके सवर्ण जातियों की नाराजगी को मोल नहीं लेना है. 

सियासी समीकरण बिगड़ने का खतरा
यूजीसी के नए नियमों को लेकर गहराया विवाद में विपक्षी की चुप्पी उनकी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है. सपा से लेकर बसपा, आरजेडी ही नहीं बल्कि कांग्रेस भी चुप है. बीजेपी नेताओं की सियासी बेचैनी के बीच विपक्ष का साइलेंट मोड में रहना कहीं ना कहीं उनकी राजनीति की सोची-समझी स्टैटेजी का हिस्सा है.सपा से लेकर आरजेडी तक इसीलिए चुप है कि दलित और ओबीसी के खिलाफ विश्वविद्यालय में होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिसकी मांग वो करते रहे हैं. अब यूजीसी ने नए नियम लागू कर दिए हैं, तो विपक्ष उसमें पड़ना नहीं चाहती है. 

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वहीं, दूसरी वजह यह है कि मौजूदा समय में अखिलेश यादव से लेकर राहुल गांधी और विपक्ष के नेताओं की पूरी राजनीति दलित औऱ ओबीसी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. यूजीसी के नए नियम को दलित और ओबीसी सामाजिक न्याय की दिशा में लागू होना कदम बता रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विरोध करने वाले ज्यादातर लोग अगड़ी जाति के हैं, जो मौजूदा समय में बीजेपी का कोर वोटबैंक बना हुआ है,ऐसे में विरोध कर अपने अपने वोटबैंक को नाराज नहीं करना चाहते हैं. इसीलिए चाहकर भी विरोध नहीं कर पा रहे हैं. इससे सपा से लेकर आरजेडी तक के अपने मूल दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक समीकरण के बिगड़ने का खतरा है. ऐसे में चुप रहकर गेम खेल रही है. 

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