सुप्रीम कोर्ट के एक सवाल से 'दलित संकट' में फंसी सियासत, अब SC-ST क्रीमी लेयर पर क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के संवैधानिक फैसले पर केंद्र सरकार से जवाब मांग लिया है. सवाल है कि एससी-एसटी आरक्षण में 'कोटा के भीतर कोटा' और क्रीमीलेयर लागू करने को लेकर अब सरकार क्या कदम उठाएगी? अदालत के एक सवाल ने दलित सियासत को फिर से गरमा दिया है और मोदी सरकार के सामने सियासी संतुलन की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.

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यूजीसी नियमों के विवाद से घिरी केंद्र सरकार के सामने अब एक और संवेदनशील मुद्दा खड़ा हो गया. (File Photo- PTI) यूजीसी नियमों के विवाद से घिरी केंद्र सरकार के सामने अब एक और संवेदनशील मुद्दा खड़ा हो गया. (File Photo- PTI)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 11 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:59 PM IST

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन यानी यूजीसी के नए नियमों के विवाद से मोदी सरकार अभी निकल भी नहीं पाई थी कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के मुद्दे पर रिपोर्ट मांग ली है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि संवैधानिक पीठ के 2024 में दिए गए फैसले के बाद क्या कार्रवाई की गई है, जिसमें एससी और एसटी के आरक्षण का वर्गीकरण और क्रीमी लेयर को लागू करने की बात कही गई थी.

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सुप्रीम कोर्ट ने एक अगस्त 2024 को एससी और एसटी के लोगों के बीच समान प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारों को एससी-एसटी के आरक्षण को कोटा के भीतर कोटा बनाने की मंजूरी दी थी. साथ ही ओबीसी की तरह एससी-एसटी आरक्षण में भी क्रीमी लेयर व्यवस्था को लागू करने की बात कही थी.

सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले को लागू कराने की मांग को लेकर ओपी शुक्ला और समता आंदोलन समिति ने सर्वोच्च अदालत में एक याचिका दायर की थी. इस माले पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने सुनवाई करते हुए मंगलवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि संवैधानिक पीठ के फैसले पर क्या कार्यवाई की गई है? ऐसे में एक बार फिर से एससी-एसटी आरक्षण के मुद्दे पर सियासत गर्मा सकती है?

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्या करेगी केंद्र सरकार

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण को सब-कैटेगरी बनाने का अधिकार राज्यों को देने और क्रीमीलेयर की व्यवस्था को लागू करने का फैसला देने के साथ ही 2024 में सियासत गर्मा गई थी. विपक्षी दल कांग्रेस से लेकर बीजेपी के कई सहयोगी दलों ने इस फैसले के खिलाफ खड़े नजर आ रहे थे. सर्वोच्च अदालत के फैसले को लेकर बसपा प्रमुख मायावती खुलकर विरोध में उतर गई थी. दलित समुदाय के लोग भी सड़क पर उतरकर विरोध शुरू कर दिए थे.

एससी और एसटी समुदाय के करीब 100 एनडीए सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को किसी भी सूरत में लागू नहीं किया जाना चाहिए. इसके बाद केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा था कि एनडीए सरकार बीआर अंबेडकर के बनाए गए संविधान से बंधी है. इस संविधान में एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर का कोई प्रावधान नहीं. सरकार के इस आश्वासन के बाद एससी-एसटी समाज ने अपना विरोध बंद किया था.

SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करना आसान नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार से 2024 में संवैधानिक पीठ के द्वारा दिए गए फैसले पर क्या कदम उठाए गए हैं, उसके जवाब मांगे हैं. डेढ़ साल पहले एससी-एसटी समुदाय के विरोध को देखते हुए ठंडे बस्ते में डाल दिया था, लेकिन अब उसे कोर्ट को बताना होगा कि संवैधानिक पीठ के फैसले पर क्या कदम उठाए हैं. ऐसे में सरकार के लिए एससी-एसटी आरक्षण पर हाथ डालना किसी जोखिम भरा कदम साबित हो सकता है, क्योंकि एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाईं है.

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एससी-एसटी आरक्षण में कोटा के भीतर कोटा बनाने का भले ही विरोध न हुआ हो, लेकिन अगर क्रीमी लेयर की व्यवस्था की जाती है तो फिर से दलित समुदाय सड़क पर उतर सकते हैं. इसके अलावा दलित सियासी आधार वाली बसपा, आजाद समाज पार्टी और चिराग पासवान की एलजेपी भी विरोध के लिए उतर सकती है. इसके अलावा बदले हुए सियासी माहौल में कांग्रेस भी विरोध कर सकती है.

अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के चेयरमैन अशोक भारती कहते हैं कि भारत के संविधान के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण मिला है. अनुसूचित जाति और जनजाति के कुछ-कुछ चेहरे और आवाजें जो आपको सुनाई दे रही हैं वो आरक्षण की वजह से हैं. एससी-एसटी समुदाय को 22.5 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा है, आरक्षण गरीबी उन्मूलन प्रोग्राम नहीं है, बल्कि प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है.

अशोक भारती ने कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने दलित और आदिवासी के आरक्षण में क्रीमी लेयर को थोपने की जमीन तैयार कर रही है. अनुसूचित जाति और जनजाति को सरकार ने अबतक दूध दिया नहीं और क्रीम निकालने की बात शुरू हो गई है. सुप्रीम कोर्ट की मंशा एससी/एसटी कैटेगरी को क्रीमी लेयर में लागू करने की कोशिश के तहत है और आरक्षण को खत्म करने की साजिश के तहत है.

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एससी-एसटी आरक्षण पर गर्माएगी सियासत

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोदी सरकार को अपना जवाब एससी-एसटी आरक्षण के वर्गीकरण और क्रीमी लेयर की व्यवस्था करने पर अपनी रिपोर्ट देनी होगी. ऐसे में अब सभी की निगाहें इस बात पर लगी है कि केंद्र सरकार क्या फैसला लेगी, क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अनुसार अपना स्टैंड रखेगी या फिर क्रीमी लेयर की व्यवस्था से लागू करने से अपने कदम पीछे खींचेगी.

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सियासत ताकत को देखते हुए बीजेपी ही नहीं बल्कि कोई भी राजनीतिक दल उसमें हाथ डालन से बचता रहा है. 2024 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था तो दलित आधार वाले राजनीतिक दलों ने दलित समाज को होने वाले सियासी नुकसान को बताने से ज्यादा आरक्षण खत्म किए जाने की साजिश करार देने में जुट गए थे.

बसपा का कोर वोटबैंक जाटव समुदाय है, जिससे मायावती खुद आता हैं. यूपी में दलित समुदाय में सबसे बड़ी आबादी जाटव की है, जो एसी आरक्षण के वर्गीकरण के खिलाफ है और क्रीमी लेयर को लेकर किसी भी सूरत में समझौता नहीं करना चाहता है. ऐसे ही बिहार में दलित समुदाय के बीच दुसाध समुदाय सबसे बड़ी आबादी है, जो चिराग पासवान की पार्टी का कोर वोटबैंक माना जाता है. चिराग पासवान खुद भी दुसाध जाति से आते हैं. बिहार में एससी आरक्षण का ज्यादातर लाभ दुसाधों को मिला है.

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महाराष्ट्र में महार जाति एसी आरक्षण के वर्गीकरण से लेकर क्रीमी लेयर तक के खिलाफ है. मोदी सरकार में मंत्री रामदास अठावले महार जाति से आते हैं और उनका सियासी आधार भी इसी जाति के बीच है. यही वजह है कि अठावले भी इसे लेकर विरोध करते रहे हैं. राजस्थान में आदिवासी समाज में आने वाले मीणा समुदाय राजनीतिक रूप से एक बड़ी ताकत हैं और एसटी आरक्षण का ज्यादातर लाभ उन्हें मिला है, जो न एसी आरक्षण के वर्गीकरण के पक्ष में है और न ही क्रीमी लेयर की व्यवस्था चाहते हैं.

एससी और एसटी में आरक्षण का लाभ देने वाली जातियां आबादी में दूसरी एससी-एसटी जातियों से कहीं ज्यादा है. ऐसे में राजनीतिक दल सियासी नफा और नुकसान के चलते ही न आरक्षण के वर्गीकरण की दिशा में कदम उठाते हैं और न ही एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर को लागू करने के पक्ष में खड़े दिखते हैं. यही वजह है कि मोदी सरकार ने 2024 में सुप्रीम कोर्ट के फैसला आने के बाद भी क्रीमी लेयर को एससी-एसटी में लागू करने से अपने कदम पीछे खींच लिए थे.

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