युमनाम खेमचंद कैसे बना पाएंगे कुकी और मैतेई में बैलेंस? मणिपुर सीएम की कुर्सी मिलने के पीछे ये 5 फैक्टर

मणिपुर में एक साल तक राष्ट्रपति शासन रहने के बाद अब फिर से नई सरकार के गठन की तैयारी शुरू हो गई है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता युमनाम खेमचंद सिंह को बीजेपी विधायक दल का नेता चुन लिया है, लेकिन क्या कुकी और मैतेई समुदाय के बीच सियासी बैलेंस बना पाएंगे?

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मणिपुर में बीजेपी के नए सीएम होंगे युमनाम खेमचंद सिंह (Photo-X) मणिपुर में बीजेपी के नए सीएम होंगे युमनाम खेमचंद सिंह (Photo-X)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 04 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:55 AM IST

मणिपुर में करीब एक साल तक राष्ट्रपति शासन लागू रहने के बाद अब फिर से नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया है. बीजेपी ने युमनाम खेमचंद सिंह को राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया. बीजेपी विधायक दल की बैठक में खेमचंद सिंह को नेता चुना गया है और अब जल्द ही वो मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. खेमचंद के पक्ष में कौन से फैक्टर काम किए हैं.

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मई 2023 से मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदाय के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई थी, जो करीब डेढ़ साल तक चलती रही. तत्कालीन सीएम बीरेन सिंह पर कुकी समुदाय ने पक्षपात का आरोप लगाया था, जिसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था. इसके बाद मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था.

बीजेपी ने अब बीरेन सिंह की जगह पर यमुनात खेमचंद सिंह को मणिपुर सरकार की कमान सौंपने का फैसला किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि मैतेई समुदाय से आने वाले युमनाम खेमचंद सिंह कुकी-मेतेई के बीच कैसे बैलेंस बनाएंगे? 

पहले समझें कैसे खेमचंद को मिली सीएम की कुर्सी
मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदाय की जातीय हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों बेघर हुए. कुकी समुदाय शुरू से ही बीरेन सिंह पर पक्षपात का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग कर रहा था. बीजेपी में भी धीरे-धीरे बीरेन सिंह को लेकर असंतोष बढ़ता गया. बीजेपी के कई विधायक बीरेन सिंह को राजनीतिक बोझ बता रहे थे. 

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बीजेपी के डेढ़ दर्जन विधायकों ने अक्टूबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग की. नवंबर 2024 में खेमचंद सिंह ने खुद बीरेन सिंह से इस्तीफा देने को कहा था. ऐसे में बीरेन सिंह को 9 फरवरी 2025 को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था. 

13 फरवरी 2025 को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. संविधान के अनुसार, एक साल से ज्यादा राष्ट्रपति शासन नहीं चल सकता. ऐसे में बीजेपी के लिए नई सरकार बनाना जरूरी हो गया था. ऐसे में मंगलवार को बीजेपी विधायक दल की बैठक में खेमचंद सिंह को नेता चुना गया. वो मणिपुर सीएम के रूप में शपथ लेंगे. खेमचंद सिंह के पक्ष में कौन-कौन से फैक्टर काम किए हैं. 

सियासी अनुभव का मिला लाभ
बीजेपी विधायक दल के नेता चुने गए युमनाम खेमचंद सिंह को सियासी अनुभव का राजनीतिक लाभ मिला है, क्योंकि पार्टी को बीरेन सिंह जैसे नेता के विकल्प की तलाश थी. वो दो बार के विधायक हैं.  2017 और 2022 में सिंगजामेई सीट से चुनाव जीते हैं. 2017 में वे मणिपुर विधानसभा के स्पीकर बने और पूरे 5 साल पद पर रहे. इसके बाद 2022 चुनाव के बाद बीरेन सिंह सरकार में मंत्री बने. ग्रामीण विकास, पंचायती राज, नगर प्रशासन, आवास विकास और शिक्षा जैसे अहम मंत्रालय का जिम्मा संभाला. 

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मणिपुर की सियासत में दो दशक से भी ज्यादा समय से सक्रिय हैं. 2013 में राजनीति में कदम रखा था और उसके बाद से लगातार विधायक बनते आ रहे हैं. मंत्री पद से लेकर विधानसभा के स्पीकर तक की कुर्सी संभाली.  मणिपुर की राजनीति में एक अनुभवी नेता के रूप में पहचाना जाता है. इसी अनुभव के चलते बीजेपी ने उन्हें मणिपुर के सीएम की कुर्सी सौंपने का फैसला किया. 

आरएसएस से जुड़ाव अहम फैक्टर बना
बीरेन सिंह की जगह पर युमनाम खेमचंद सिंह को सत्ता की कमान सौंपने के पीछे बीजेपी के वफादार नेता और संघ के नजदीकी होना भी एक अहम फैक्टर रहा. मणिपुर में बीरेन सिंह के साथ युमनाम खेमचंद सिंह ने अपनी राजनीतिक पारी शुरू की, लेकिन बीजेपी और संघ के साथ अपने रिश्ते को मजबूत किया दाता है. यही वजह है कि खेमचंद को एक भरोसेमंद संघ का व्यक्ति माना जाता है. पूर्वोत्तर में मणिपुर बीजेपी और संघ दोनों के लिए राजनीति से ज्यादा वैचारिक रूप से अहम माना जाता है. 

लिबरल मैतेई नेता माने जाते खेमचंद
युमनां खेमचंद सिंह मैतेई समुदाय से आते हैं, लेकिन उन्हें लिबरन मैतेई नेता माना जाता है. मैतेई समुदाय में उनकी पकड़ अच्छी खासी है, लेकिन साथ ही  कुकी और नागा लोगों के बीच भी उनकी स्वीकार्यता है. कुकी समुदाय के राहत शिविर का दौरा करने वाले एकमात्र मैतेई नेता खेमचंद सिंह थे. दिसंबर 2025 में नागा बहुसंख्यक उखरुल जिले के एक कुकी गांव में एक राहत शिविर का दौरा कर संघर्ष से विस्थापित लोगों के साथ बातचीत कर सुर्खियों में आए थे, 

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खेमचंद कार्यालय ने राहत शिविर के कैदियों के साथ उनकी तस्वीरें साझा कीं, जिनमें से एक में वे एक छोटी बच्ची को गोद में ले रखा था. इसे मणिपुर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उनकी तैयारी के रूप में देखा गया, खासकर उस गहरे विभाजन के बीच जो संघर्ष की शुरुआत से ही राज्य में कायम है. खेमचंद ने राज्य के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में उथल-पुथल के दौरान सार्वजनिक बयान देने से दूर रहकर अपेक्षाकृत कम प्रोफ़ाइल बनाए रखी थी. इतना ही नहीं बीरेन सिंह से इस्तीफा की मांग करने वाले नेता में प्रमुख रूप से खेमचंद का नाम आता है. माना जाता है कि यही वजह से बीजेपी ने उन्हें सीएम बनाने का फैसला किया.

खेमचंद स्वच्छ छवि के नेता माने जाते हैं
युमनाम खेमचंद सिंह मणिपुर में साफ छवि वाले नेता माने जाते हैं, वह भले ही मैतेई समुदाय से आते हैं, लेकिन कुकी लोगों को उनमें भरोसा है. खेमचंद विधानसभा स्पीकर और मणिपुर सरकार में कई अहम विभागों के मंत्री रहे हैं, लेकिन उन पर किसी तरह का कोई दाग नहीं लगा. इतना ही काफी सरल स्वभाव के माने जाते है. हिंसा के दौरान उन्होंने खुले तौर पर राज्य में शांति बहाली की अपील की थी. दुनिया भर में अलग-अलग देशों के बीच, अलग-अलग समुदायों के बीच झगड़े होते हैं. बीजेपी विधायक दल के नेता चुने जाने के पीछे अहम फैक्टर साबित हुआ. 

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बीरेन सिंह के साथ खेमचंद के रिश्ते
मणिपुर के पूर्व सीएम बीरेन सिंह के साथ युमनाम खेमचंद के काफी गहरे और पुराने रिश्ते हैं. खेमचंद ने बीरेन सिंह की पार्टी से साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था. 2002 में बीरेन सिंह के साथ डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपल्स पार्टी से जुड़े और नागा समूह के खिलाफ आंदोलन किया. बीरेन सिंह सीएम बन गए, लेकिन खेमचंद ने अपना राजनीतिक सफर बीजेपी से शुरू किया. 

ताइक्वांडो खिलाड़ी और शिक्षक खेमचंद सिंह 2013 में बीजेपी का दामन थामा और फिर 2017 में सिंगजामेई सीट से जीते.   विधानसभ स्पीकर बने और फिर 2022 में मंत्री के रूप में शपथ ली. अब बीरेन सिंह की जगह पर मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं तो उनके सामने सियासी चुनौतियां भी कम नहीं है. 

मणिपुर विधानसभा का नंबर गेम क्या है
मणिपुर विधानसभा में कुल 60 सीटें हैं. बीजेपी के पास अभी फिलहाल 37 विधायक हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 32 सीटें मिली थीं, लेकिन बाद में जेडीयू के 5 विधायक शामिल हो गए थे. एक सीट विधायक की मौत से खाली है. इस तरह बीजेपी के पास पूरा बहुमत है. इसके बाद भी बीजेपी को एनपीएफ के 5, जेडीयू के एक और तीन निर्दलीय विधायकों का समर्थन है. इस तरह से एनडीए के पास फिलहाल 46 विधायक का समर्थन है. वहीं, विपक्ष के पास 14 विधायक है. एनपीपी के 7 विधायक हैं तो कांग्रेस के पास विधायक हैं. इसके अलावा केपीए के 2 विधायक हैं. 
 

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मैतेई और कुकी में कैसे बनाएंगे बैलेंस
खेमचंद के नेतृत्व में बनने जा रही हैनई सरकार को बहुत बड़ी चुनौतियां मिलेंगी. राज्य में अभी भी सामाजिक विभाजन है विस्थापित लोग राहत शिविरों में हैं. पहाड़ी और घाटी इलाकों में आवाजाही सीमित है. हथियार जमा नहीं हुए हैं. ऐसे में समुदायों के बीच अविश्वास है. ऐसे में खेमचंद जैसे लिबरल  मैतेई समुदाय के नेता को बीजेपी मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है तो साथ ही एक कूकी और एक नागा समुदाय से डिप्टीसीएम बनाया जा सकता है. इस फॉर्मूले के जरिए बीजेपी मणिपुर में सियासी बैलेंस बनाने का प्लान है. 

मैतेई-कुकी के संघर्ष से झुलसे मणिपुर में बीजेपी ने फिर से सरकार गठन का रास्ता साफ कर लिया है. जैसा ही पहले ही कहा कि खेमचंद के रिश्ते कुकी और नागा समुदाय के बीच भी अच्छे हैं. हिंसा के बीच खेमचंद समाजिक सदभावना बनाने के लिए जोर दे रहे थे और बार-बार कह रहे थे कि एक-दूसरे के गांवों में जाने में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए. हमें इस झगड़े को अपने बच्चों के भविष्य पर असर नहीं डालने देना चाहिए. 

मिशन 2027 को फतह करने का लक्ष्य
विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं, नई सरकार को लोगों का भरोसा जीतना होगा. मणिपुर में फिर पुनर्वास, रास्ते खोलना, संवाद और सुरक्षा में पारदर्शिता जरूरी है.  राष्ट्रपति शासन से राज्य में कुछ हद तक शांति लौट आई है. ऐसे में उसे कायम रखने की चुनौती है. इतना ही नहीं मणिपुर के बिगड़े सियासी समीकरण को दुरुस्त करने के साथ-साथ 2027 में सत्ता की हैट्रिक लगाने की बीजेपी के सामने चुनौती है. अब देखना है कि खेमचंद कैसे इसे पूरा करते हैं?

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