तमिलनाडु में हिंदी विरोध की वो आग, जिसने लील ली थीं 70 जिंदगियां

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार पर कड़ा हमला किया है. उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इस प्रक्रिया से तमिलनाडु या दक्षिणी राज्यों के हितों को नुकसान पहुंचता है तो राज्य में व्यापक आंदोलन होगा.

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तमिलनाडु में 1960 के दशक में हिंदी विरोध को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुआ था तमिलनाडु में 1960 के दशक में हिंदी विरोध को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुआ था

टीआर जवाहर

  • नई दिल्ली,
  • 16 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 7:21 AM IST

तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन (M. K. Stalin) ने प्रस्तावित परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला है. उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि 'अगर इस प्रक्रिया से तमिलनाडु या दक्षिणी राज्यों के हितों को नुकसान पहुंचा तो राज्य में बड़े पैमाने पर आंदोलन होगा और पूरा प्रदेश ठप हो सकता है.' उन्होंने यह बातें बीती 14 अप्रैल को वीडियो जारी कर कही हैं.

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संसद सत्र में होनी है परिसीमन और महिला आरक्षण पर चर्चा

उन्होंने कहा कि संसद का विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू होने वाला है. संसद सत्र में हमारे सांसद भाग लेंगे. अगर ऐसा कुछ भी किया जाता है जो तमिलनाडु को नुकसान पहुंचाने वाला हो या उत्तरी राज्यों की राजनीतिक शक्ति को असमान रूप से बढ़ाता है तो हम तमिलनाडु में चुप नहीं रहेंगे.' यहां ये बताना जरूरी है कि संसद के विशेष सत्र में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े अहम संशोधनों पर चर्चा प्रस्तावित है.

जब हिंदी विरोध ने ले ली थी 70 जानें

ऐसे समय में स्टालिन का ये कहना है कि 'हमारा एक-एक परिवार सड़क पर उतरेगा और हम 1960 के दशक की याद दिला देंगे' एक बार फिर 50-55 साल पुराने इतिहास की ओर ले जाता है, जब हिंदी विरोधी आंदोलन ने देश को न सिर्फ भाषाई तौर पर अलग-अलग बांट दिया बल्कि इस हिंसक आंदोलन ने 70 लोगों की जान भी ले ली थी.

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सीएम स्टालिन के बयान से वो दौर एक बार फिर सुर्खियों में है और इसी के साथ चर्चा में है एक नाम... सीएम सीएन अन्नादुराई. वो अन्ना जिन्हें तमिलनाडु की राजनीति में बदलाव की बयार को आंधी बनाने के लिए जाना जाता है.

कौन थे सीएन. अन्नादुरई?

आज हम जिसे तमिलनाडु राज्य के नाम से जानते हैं, वह किसी जमाने में मद्रास प्रेसीडेंसी था. इसके लिए 1950 और 60 का दशक सिर्फ बदलाव का दौर नहीं था. यह आंदोलनों के विस्फोट का दौर भी था. इसी दौर में पेरियार के शिष्य कहलाने वाले और तमिल अस्मिता के झंडाबरदार बनकर साउथ की राजनीति में उभरे सीएन अनादुराई. जिन्हें राजनीति में अन्ना नाम से ही पुकारा गया.

सीएम सी.एन. अन्नादुरई, जिन्होंने हिंदी विरोध के आंदोलन को हवा दी

उन्होंने 50 के दशक में रॉबिन्सन पार्क की भीगी जमीन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और फिर दक्षिण भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी. 1950 का दशक भाषा की राजनीति का विस्फोटक दौर बन गया. 1965 तक आते-आते राज्य में हिंदी थोपने के खिलाफ आंदोलन चरम पर पहुंचा गया.

 

यह आग पेरियार के शुरुआती विरोध से ही निकली थी, लेकिन अन्ना ने इसे जनआंदोलन में बदल दिया. उनका एक तर्क बड़ा मशहूर हुआ कि अगर बहुमत के आधार पर हिंदी को राष्ट्रभाषा माना जाए, तो कौआ राष्ट्रीय पक्षी होना चाहिए, क्योंकि वह मोर से ज्यादा संख्या में है.  26 जनवरी 1965, जिस दिन हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की बात थी, अन्ना ने इसे शोक दिवस घोषित किया. इस दिन सड़कों पर उग्र प्रदर्शन हुए और 70 से अधिक लोगों की मौत हुई. इस आंदोलन में राजेंद्रन जैसे छात्र शहीद कहलाए और आत्मदाह जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया.

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1957 से 1962 तक राज्यसभा सांसद के रूप में अन्ना ने दिल्ली में दक्षिण भारत की आवाज को नई धार दी. उन्होंने 'मैं द्रविड़ नस्ल से हूं' जैसे ऐतिहासिक वाक्य के जरिए अपनी पहचान को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया.  उन्होंने 'मद्रास' का नाम बदलकर 'तमिलनाडु' करने की मांग संसद में उठाई. बाद में उनकी इस मांग पर अमल भी हुआ.

 

अन्ना ने जल्दी समझ लिया कि सिनेमा सबसे प्रभावी जरिया है. उन्होंने फिल्मों और नाटकों के जरिए जाति, अंधविश्वास और सामाजिक असमानता पर चोट की. उनके साथ एम. करुणानिधि जैसे युवा लेखक जुड़े, जिन्होंने इस सांस्कृतिक आंदोलन को और ताकत दी. उनकी स्क्रिप्ट और संवाद केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि सामाजिक बदलाव का औजार थे. सिनेमा हॉल एक तरह से राजनीतिक मंच बन गया, जिसने डीएमके को जनता के दिलों तक पहुंचाया.

 

1960 के दशक के बीच में अन्ना ने एम. भक्तवत्सलम सरकार और के. कामराज की नीतियों पर करारे हमले किए.  खाद्यान्न संकट और महंगाई को लेकर उनके नारे जनता के दिल पर नहीं बल्कि पेट से जुड़ते थे. महिलाएं भी इन नारों से सीधे रिलेट कर पाती थीं.  उनका एक सवाल बहुत मशहूर हुआ, जिसमें वो कहते थे 'कामराज अन्नाची, दाल के दाम क्या हैं? भक्तवत्सलम अन्नाची, चावल का दाम क्या हैं?'  इन सवालों ने जनता की आम समस्याओं को राजनीतिक मुद्दा बना दिया.

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1967 में अन्ना ने एक बड़ा दांव खेला. उन्होंने अपने पुराने विरोधी सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) से हाथ मिला लिया और यह गठबंधन वैचारिक विरोधाभासों के बावजूद कांग्रेस को हराने की रणनीति बन गया. यह गठबंधन डीएमके की जीत का आधार बना और दिखाया कि सत्ता पाने के लिए व्यावहारिक राजनीति कितनी जरूरी होती है.

 

अन्ना सिर्फ नेता नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक थे. उन्होंने एमजी रामचंद्रन, करुणानिधि और अन्य नेताओं को तैयार किया. जेल में रहते हुए भी उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को पत्र लिखकर आंदोलन और अनुशासन का पाठ पढ़ाया. 1967 के चुनावों में डीएमके ने ऐतिहासिक जीत हासिल की. कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और अन्ना मुख्यमंत्री बने. साधारण धोती में शपथ लेने वाले अन्ना ने 'दो रुपये चावल योजना' जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की.

 

यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव का प्रतीक था. रॉबिन्सन पार्क से शुरू हुई यात्रा अब सत्ता के शिखर तक पहुंच चुकी थी. अन्ना अब सिर्फ पेरियार के शिष्य नहीं थे बल्कि बड़े बदलाव की पहचान बन चुके थे. ऐसी पहचान जिसमें भाषा और जनशक्ति ने मिलकर दक्षिण भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया.

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