तलाक के मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी- 'समझौते के बाद पीछे नहीं हट सकते'

सुप्रीम कोर्ट ने आपसी तलाक़ के समझौतों पर एक सख़्त लक्ष्मण रेखा खींच दी है. अदालत ने आख़िरी वक्त पर समझौते से पीछे हटने के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया और क़ानूनी उपायों के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई.

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तलाक से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी (File photo: ITG) तलाक से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी (File photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:14 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि कोई भी पति या पत्नी, विवादों के पूरी तरह और अंतिम समाधान के तौर पर शादी को खत्म करने पर राज़ी होने के बाद, आपसी तलाक़ के समझौते से पीछे नहीं हट सकता. जस्टिस राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा कि क़ानून तलाक़ का आदेश जारी होने से पहले सहमति वापस लेने की इजाज़त देता है, लेकिन इसका इस्तेमाल समझौते में तय की गई ज़िम्मेदारियों से बचने के लिए नहीं किया जा सकता.

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बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा, “यह एक स्थापित क़ानून है कि एक बार जब दोनों पक्ष किसी समझौते पर राज़ी हो जाते हैं और मध्यस्थ उसे विधिवत प्रमाणित कर देता है, तो अगर कोई पक्ष उन शर्तों से पीछे हटता है, तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए.”

बेंच ने आगे कहा कि मध्यस्थता से हुए समझौतों से किसी भी तरह का विचलन सख्ती से निपटा जाना चाहिए, क्योंकि यह मध्यस्थता प्रक्रिया की नींव पर ही चोट करता है.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि सेटलमेंट से पीछे हटने की इजाज़त सिर्फ़ कुछ खास हालात में ही दी जा सकती है, जैसे धोखाधड़ी, ज़बरदस्ती, गलत असर, या दूसरी पार्टी का तय शर्तों को न मानना. इन छूटों के अलावा, पार्टियों से उम्मीद की जाती है कि वे मीडिएशन के दौरान किए गए वादों को पूरा करेंगे.

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क्या है पूरा मामला? 

कोर्ट का यह फैसला एक वैवाहिक विवाद के मामले में आया, जिसमें पत्नी ने मध्यस्थता समझौते पर सहमति देने और उस पर आंशिक रूप से अमल करने के बाद, आपसी सहमति से तलाक के लिए दी गई अपनी सहमति वापस ले ली. इस दंपति की शादी साल 2000 में हुई थी और अभी उनके दो बच्चे हैं. आपसी मतभेदों के चलते वे साल 2022-23 के आसपास अलग रहने लगे.

बाद में, पति ने क्रूरता और व्यभिचार के आधार पर तलाक की मांग करते हुए पारिवारिक न्यायालय का रुख किया. इस मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा गया, जहां दोनों पक्षों ने अपने सभी विवादों को सुलझाने और आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई.

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समझौते की शर्तों का पालन किए जाने के बाद, अगस्त 2024 में तलाक के लिए 'प्रथम प्रस्ताव' की प्रक्रिया पूरी कर ली गई. हालांकि, 'द्वितीय प्रस्ताव' से ठीक पहले, पत्नी ने अपनी सहमति वापस ले ली.

पति ने शुरू में समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए अवमानना ​​याचिका दायर की थी, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया और दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया. अक्टूबर 2025 में, पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू की. पति ने केस को रद्द करने की मांग की. तर्क दिया कि यह कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है. हाई कोर्ट ने कुछ शर्तों के अधीन कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी.

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