सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सबरीमाला विवाद को लेकर सुनवाई शुरू हुई है. इस मामले को नौ जजों की एक बड़ी बेंच सुन रही है, जिसकी अध्यक्षता CJI जस्टिस सूर्यकांत खुद कर रहे हैं. लेकिन इस मामले को सिर्फ सबरीमाला विवाद से जोड़कर नहीं बल्कि बड़े कैनवस पर देखने की जरूरत है. असल में ये मामला 'आस्था बनाम महिलाओं के अधिकारों की जंग' बन चुका है.
CJI सूर्यकांत ने महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और आस्था के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने के लिए 9 जजों की बेंच गठित करने का ऐतिहासिक कदम उठाया है. यह बेंच देश के इस सबसे संवेदनशील सामाजिक-धार्मिक विवादों पर फैसला करेगी.
खास बात यह है कि इस पीठ में अलग-अलग धर्मों के न्यायाधीशों के साथ एक महिला जज को भी शामिल किया गया है, ताकि फैसले की निष्पक्षता और व्यापकता पर कोई सवाल न उठे.9 जजों की इस बेंच के सामने सुनवाई के लिए सिर्फ सबरीमाला केस नहीं है, बल्कि इसी तरह के मुद्दों से जुड़े पांच अलग-अलग मुद्दे हैं.
सबरीमाला केस में 2018 में आया था फैसला
साल 2018 में सबरीमाला विवाद पर फैसला आया था. इससे पहले सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार इस मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी. यह परंपरा भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ मानने की आस्था से जुड़ी हुई थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी थी.
आस्था बनाम महिला अधिकार की जंग
यहीं से शुरू हुई आस्था बनाम महिला अधिकार की जंग की बहस जो बड़ा मुद्दा बनकर अब सुप्रीम कोर्ट पहुंची है. इस फैसले के बाद देशभर में बहस छिड़ गई और कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं. इसके साथ ही अन्य धार्मिक प्रथाओं को भी चुनौती मिलने लगी. इनमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘खतना’ (महिला जननांग विकृति) की प्रथा को खत्म करने और पारसी महिलाओं को अगियारी (फायर टेंपल) में प्रवेश देने जैसे मुद्दे शामिल हैं. केंद्र सरकार ने भी सबरीमाला फैसले की समीक्षा की मांग का समर्थन किया था.
पहला मामलाः सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश- साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिया था. अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं. इस फैसले के खिलाफ मंदिर के पुजारी और कुछ संस्थाओं ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं.
दूसरा मामलाः दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना होता है. इस मुद्दे पर 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. कोर्ट यह तय करेगा कि यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है या नहीं.
तीसरा मामलाः मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश का मुद्दा भी साल 2016 का चर्चित मुद्दा है. यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है, कोर्ट इस सवाल का जवाब तय करेगा.
चौथा मामलाः पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश का मामला साल 2012 में सामने आया था. पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है.
पांचवां मामलाः मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव को लेकर भी कोर्ट सुनवाई कर रही है. सवाल है कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है.
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