सुप्रीम कोर्ट ने देश की आपराधिक न्याय प्रणाली को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि अब से कोई भी अदालत किसी भी आपराधिक मामले में शिकायत पर संज्ञान लेने या आरोपी को समन जारी करने से पहले उसका पक्ष जरूर सुनेगी.
कोर्ट में कहा कि अगर अदालत आरोपी का पक्ष सुने बिना ही सीधे समन जारी कर देती है, तो वो समन और पूरी प्रक्रिया कानूनी रूप से मान्य नहीं होगी. जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की दो सदस्यीय पीठ ने ये फैसला सुनाया है.
बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि आरोपी का पक्ष सुने बिना ही अदालत के संज्ञान लेने की प्रक्रिया शुरू से ही अमान्य और शून्य (Void Ab Initio) मानी जाएगी.
अदालत ने नए कानून का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223(1) में ये साफ प्रावधान दिया गया है. इस प्रावधान के तहत किसी भी मजिस्ट्रेट के लिए समन जारी करने से पहले आरोपी को अपनी बात और अपना पक्ष रखने का मौका देना पूरी तरह जरूरी है.
ये निष्पक्ष सुनवाई का मूल अधिकार है- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, ये नियम कोई साधारण या मामूली नियम नहीं है. अदालत ने कहा कि ये भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के हर नागरिक को मिले निष्पक्ष सुनवाई के मूल अधिकार से जुड़ा हुआ मामला है. अगर कोई भी निचली अदालत बिना आरोपी की दलील सुने उसके खिलाफ सीधे समन जारी करने का आदेश देती है, तो वो पूरा का पूरा आदेश कानूनी तौर पर पूरी तरह अमान्य मान लिया जाएगा.
उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर आया निर्णय
जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने ये ऐतिहासिक फैसला मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में सुनाया है. दरअसल, एक आरोपी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की इस अपील को मंजूर करते हुए ये फैसला दिया.
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बेंच ने अपने फैसले में साफ लिखा, 'BNSS की धारा 223(1) का पहला प्रावधान किसी भी शिकायत मामले में संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का मौका देना अनिवार्य बनाता है. ये संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से मिला एक ठोस सुरक्षा उपाय है. अगर अदालत इसका पालन नहीं करती है, तो संज्ञान लेने का वो आदेश शुरू से ही अमान्य और रद्द माना जाएगा.'
संजय शर्मा