दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट में सोमवार को कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के नाम को लेकर दाखिल रिवीजन पिटीशन पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से कई अहम सवाल किए गए. ये मामला में आरोप लगाया गया है कि बिना भारत की नागरिकता हासिल किए सोनिया गांधी का नाम वोटर लिस्ट में शामिल कराया गया था.
इस मामले में याचिकाकर्ता ने अदालत से FIR दर्ज कर जांच कराने की मांग की है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि वह इतने पुराने मामले में केस दर्ज करने की मांग क्यों कर रहे हैं. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला लगभग आधी सदी पुराना है, ऐसे में जांच किसकी और किस आधार पर की जाएगी.
कोर्ट ने यह भी कहा कि मौजूदा समय में जो जानकारी दी जा रही है, वो सिर्फ नाम जोड़ने और हटाने की परिस्थितियों तक सीमित है. इस मामले का दायरा बढ़ाने की कोशिश हो रही है. याचिकाकर्ता के वकील विकास त्रिपाठी की दलीलें पूरी कर ली गई हैं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि ये एक विदेशी नागरिक के गलत घोषणा का मामला है.
वकील ने कहा कि इस तरह का काम केवल जाली दस्तावेजों या धोखाधड़ी के जरिए ही संभव हो सकता है. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि मतदाता सूची की सत्यापित प्रतियां प्राप्त की गई हैं. प्रथम दृष्टया गलत घोषणा का मामला बनता है. याचिकाकर्ता की ओर से अदालत से जाली दस्तावेजों और जालसाजी की जांच कराने की मांग की गई है.
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी की ओर से दलीलें अभी पूरी नहीं हो सकी हैं. इससे पहले दाखिल जवाब में याचिका को तथ्यहीन, राजनीति से प्रेरित और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया गया था. कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 18 अप्रैल की तारीख तय की है. इसी मामले में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सितंबर 2025 में याचिका को खारिज कर दिया था.
इसके बाद इस फैसले को चुनौती देते हुए रिवीजन पिटीशन दाखिल की गई है. याचिका में दावा किया गया है कि सोनिया गांधी ने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता हासिल की थी. जबकि उनका नाम 1980 की नई दिल्ली की वोटर लिस्ट में शामिल बताया गया है. यह भी कहा गया है कि साल 1982 में उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था.
ऐसे में सवाल उठाया गया है कि आखिर साल 1980 में उनका नाम किस आधार पर जोड़ा गया और फिर साल 1982 में हटाया क्यों गया. यह भी कहा गया कि साल 1983 में नागरिकता हासिल करने से पहले किन दस्तावेजों के आधार पर वोटर लिस्ट में नाम शामिल किया गया. यह आशंका जताई गई है कि क्या उस समय फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया था.
संजय शर्मा