संघ के 100 साल: विभाजन से 1984 दंगों तक संघ का जोर सिखों से मजबूत रिश्तों पर रहा

देश के विभाजन के पूर्व अमृतसर में हिंसा हो रही थी. दंगाई सिखों को निशाना बना रहे थे. ऐसे नाजुक मौके पर स्वयंसेवकों ने पंजाब में गुरुद्वारों और सिखों की रक्षा की. इसके लिए दंगाइयों से कई जगहों पर उनका टकराव हुआ. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.

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संघ ने विभाजन के दौरान हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में सिखों की रक्षा की.  (Photo: AI generated) संघ ने विभाजन के दौरान हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में सिखों की रक्षा की. (Photo: AI generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:45 PM IST

बात 1947 की है, आजादी की खुशी विभाजन के दर्द के चलते ज्यादा देर नहीं टिक पाई थी. देश के दो टुकड़े हो चुके थे और दोनों ही जल रहे थे. सबसे ज्यादा मुश्किल पंजाब में थी, हिंदू और सिख महिलाओं का अपहरण हो रहा था. तब तत्कालीन रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह ने तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को एक पत्र लिखा था. पत्र के मुताबिक जिस समय ये मुद्दा उठाया गया था उस समय तक पश्चिम पंजाब से 20 हजार महिलाओं और लड़कियों का अपहरण हो चुका था, जिनमें सिख और हिंदू दोनों समुदायों की महिलाएं शामिल थीं. उस वक्त संघ बड़े पैमाने पर राहत कार्य चला रहा था, शऱणार्थियों के लिए सैकड़ों शिविर बनाए गए थे, वहीं दंगाइयों व मुस्लिम लीग के गुंडों से भी लोहा ले रहा था. इस पत्र की एक प्रति  श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी भेजी गई थी. इसमें लिखा था कि संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर से सहायता लेकर संघ के स्वयंसेवकों को इस अभियान से जोड़ना चाहिए, ताकि वो सभी महिलाएं सुरक्षित घर लौट सकें.
 
कांग्रेस नेता की चार बेटियां स्वयंसेवकों ने बचाईं थीं

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ऐसा नहीं था कि ये सब आजादी के बाद शुरू हुआ था, बल्कि जब नेहरू अंतरिम सरकार के मुखिया थे, तब भी ये सब हो रहा था. कई संभ्रांत घरों की महिलाओं को उठा लिया गया था. माणिक चंद्र बाजपेयी और श्रीधर पराडकर द्वारा लिखित ‘ज्योति जला निज प्राण की’ (सुरुचि प्रकाशन) में विभाजन के पहले और बाद की तमाम घटनाओं को संदर्भ सहित संकलित किया है. एक कहानी एक कांग्रेस नेता की भी है. अमृतसर के एक कांग्रेसी नेता थे राधाकृष्ण सेठ. उनकी चार किशोर-युवा पुत्रियां थीं. वहां दंगा भड़का तो राधाकृष्ण सेठ की कोठी को लीग के गुडों ने घेर लिया. पूरे शहर में आग लगी थी. घर के बाकी सदस्य या तो घर पर नहीं थे, या बचकर भाग गए थे. घर में केवल चारों बेटियां थीं, RSS के स्वयंसेवकों को पता चला तो वहां पहुंच गए, उन्हें आता देख दंगाई भाग गए और जलती कोठी में से स्वयंसेवकों ने उनकी बेटियों को निकालकर बचा लिया.

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इधर पंडित नेहरू ने भी अमृतसर का दौरा किया तो कई संगठनों के लोगों ने उनसे शिकायत की, तब इन सेठ ने भी भावविभोर होकर अपनी बेटियों की कहानी सुनाईं और पंडित नेहरू के सामने ही कहा कि, “संघ आवारा युवकों की जमात नहीं बल्कि देशभक्त और राष्ट्ररक्षा के लिए समर्पित युवकों का एक मजबूत संगठन है”. नेहरू ने तब लोगों से कहा था कि प्रशासन अपनी पूरी ताकत लगा रहा है, लेकिन जनता को खुद भी अपनी सुरक्षा करनी होगी. तब हिंदू-सिख संगठनों ने मांग की कि आप हमें हथियार दीजिए, हम अपनी सुरक्षा खुद कर लेंगे, नेहरूजी इस मांग से परेशान हो गए थे, बोले कि हिंदू-सिखों को हथियार देंगे तो फिर मुसलमानों को भी देने पड़ेंगे. वो भी मांगेंगे. निराश होकर कुछ लोगों ने तो ये तक कह दिया था कि फिर हमें जहर दे जाइए, तब नेहरूजी ने कहा था कि हम सोच रहे हैं कि कुछ प्रांत लीग को ही दे दें, तब तक विभाजन को मंजूरी नहीं थी, सो इस बात पर लोग आक्रोशित हो गए थे.
 
नेहरूजी ने कहा- ‘मैं आपको दिल्ली के 700 मील दायरे में नहीं आने दूंगा’

14 अगस्त 1947 की शाम नेहरूजी के पास लाहौर से एक फोन आया, कि हिंदुओं-सिखों की बस्तियों का पानी काट दिया गया है, बाहर निकलने वालों को मारा जा रहा है, ऐसे हालात में नेहरूजी ने ऐतिहासिक ‘ट्रिस्ट ऑफ डेस्टिनी’ स्पीच दी. 1947 में दिल्ली की जनसंख्या करीब 9.50 लाख थी, जिसमें से 3.3 लाख मुस्लिम पाकिस्तान चले गए और करीब 5 लाख हिंदू-सिख दिल्ली आ गए. शरणार्थियों की संख्या 1951 तक तो दोगुनी हो गई, यानी 17.44 लाख. बहुतों ने पाक जाने वालों के घर ले लिए, फिर भी लाखों लोग थे, जो अभी भी कैम्पों में रुके थे. ऐसे में वॉल सिटी दिल्ली के बाहर भी नुजूल के गांवों में सरकार ने राष्ट्रीय नेताओं के नाम पर ‘नगर’ बसाए, करीब 46 कॉलोनियां. लाजपत नगर, मालवीय नगर, तिलक नगर, सुभाष नगर, कमला नगर, पटेल नगर, जवाहर नगर, राजेन्द्र नगर आदि. पाकिस्तान में अपने अपने इलाकों के नाम पर आए लोगों ने अपनी कॉलोनियों के नाम अपने मूल शहरों के नाम पर रखे जैसे न्यू मुल्तान नगर, डेरा इस्माइल खान आदि.

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तब सरकार ने पुर्नवास मंत्रालय बनाकर उसे 2000 एकड़ जमीन दे दी, मंत्रालय की कमान पहले मोहन लाल सक्सेना फिर नई दिल्ली सांसद मेहर चंद खन्ना को सौंप दी. ‘सेलीब्रेटिंग दिल्ली’ में नारायणी गुप्ता लिखती हैं, ‘1948 में ही इस मंत्रालय ने 42 लाख 62 हजार की रकम कर्ज पर मकानों और दुकानों के लिए कर्ज पर दी थी. 1961 तक कुल 37 करोड़ रुपए दिए गए थे, जबकि 1949 में दिल्ली में 3 रुपए गज जमीन की दरें थीं’. शरणार्थियों के लिए केवल कॉलोनियां ही नहीं दुकानें भी बनने लगीं, खान मार्केट और सरोजिनी नगर जैसे बाजार बने और दुकानें शरणार्थियों को मिली. 10 साल के अंदर मुगल सिटी जो ब्रिटिश सिटी बना था, पंजाबी सिटी के तौर पर उभर चुका था. मुस्लिम जनसंख्या 33 फीसदी से घटकर 6 फीसदी के अंदर आ गई थी.

पंजाब रिकंस्ट्रक्शन कमेटी के चेयरमेन लाहौर हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बख्सी टेकचंद और पंजाब नेशनल बैंक के चेयरमेन योधराज आदि ने नेहरूजी से मुलाकात करके पंजाबियों के लिए मुख्य दिल्ली से 7 मील दूर एक जगह मांगी, ‘इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू’ में दुर्गादास के मुताबिक, ‘गुस्से में नेहरूजी बोले- मैं आपको दिल्ली के 700 मील दायरे में नहीं आने दूंगा’. नेहरू का मानना था कि दिल्ली में आजादी के बाद जो अव्यवस्था हुई है, उसकी वजह पंजाबी हैं.  नेहरूजी ने साफ किया कि पंजाब की राजधानी दिल्ली के आसपास नहीं होगी, चंडीगढ़ बसाने का आइडिया यहीं से जन्मा था. बाद में पंजाबियों ने कई कॉलोनियां यहां बसाईं. प्लानिंग कमीशन की पहल पर इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनोमिक ग्रोथ के दिल्ली सर्वे के मुताबिक 1956-57 में दिल्ली में सबसे ज्यादा 40.5 फीसदी शरणार्थियों के घर थे, जबकि 35.2 फीसदी पुराने निवासियों के थे, बाकी प्रवासी थे.
 
ऑपरेशन ब्लू स्टार की दुखद कहानी

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सिख पहले से ही कांगेस से नाराज थे, सरदार बलदेव सिंह को किए गए वायदे पूरे नहीं किए गए थे, उनके कई धार्मिक स्थल पाकिस्तान में चले गए थे. ऐसे में इंदिरा गांधी का भिंडरावाले को संरक्षण देना और फिर खिलाफ जाना, जिसके चलते माहौल गरमाया. उस पर 1971 के युद्ध के एक हीरो सरदार शाबेग सिंह पर तमाम छोटे मोटे आरोप लगाकर जब कोर्टमार्शल किया गया तो वो भिंडरावाले का दायां हाथ बन गया और पाकिस्तान से हथियार मंगाकर सिखों को ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी और स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया. फिर ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और बदले में इंदिरा गांधी की हत्या.

लेकिन फिर जो कांग्रेस ने दिल्ली समेत देश भर में किया वो खौफनाक था. मरने वाले सिखों की संख्या हजारों में थी. कमलनाथ, सज्जन कुमार, टाइटलर जैसे कई कांग्रेस नेताओं के नाम भी आए. उस पर राजीव गांधी का बयान ‘बड़ा पेड़ गिरता तो है तो जमीन तो हिलती ही है’, घावों में नमक जैसा था. ये अलग बाद है कि समय के साथ साथ लगातार ये प्रयास हुए कि लोग इसे भूल जाएं, सिख मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाना, उनके द्वारा 21 साल बाद माफी मंगवाना जैसे प्रयास तो शामिल थे ही, एक और प्रयास किया गया RSS को भी इस मामले में घसीटने का. नानाजी देशमुख के एक लेख जिसमें भिंडरावाले की स्वर्ण मंदिर पर कब्जे के लिए आलोचना थी, तो हिंदू स्वयंसेवकों द्वारा सैकड़ों सिखों की जान बचाने की तारीफ भी की गई थी. लेकिन सालों बाद उस लेख को उठाकर संघ पर निशाना साधा जाता रहा है.
 
खुशवंत सिंह ने खुलकर बताई दंगों में RSS द्वारा सिखों की सहायता की सच्चाई

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खुशवंत सिंह ऐसे पत्रकार माने जाते हैं, जिन्होंने जो भी लिखा किसी के भय या दवाब में आकर नहीं लिखा. कई बातों पर सभी पक्ष उनसे नाराज हो सकते हैं, लेकिन उनको कोई फर्क नहीं पड़ता था. उनकी किताब ‘A History of the Sikhs’ में दिल्ली के 1984 सिख दंगों में संघ की भूमिका पर साफ लिखा है कि, “RSS has played an honorable role in maintaining Hindu-Sikh unity before and after the murder of Indira Gandhi in Delhi and in other places. It was the Congress (I) leaders who instigated mobs in 1984 and got more than 3000 people killed. I must give due credit to RSS and the BJP for showing courage and protecting helpless Sikhs during those difficult days. No less a person than Atal Bihari Vajpayee himself intervened at a couple of places to help poor taxi drivers.”
 
जब खालिस्तानियों ने भून दिए थे 25 स्वयंसेवक

और यही एक बात थी जिससे ना केवल खालिस्तानी बल्कि संघ के सारे विरोधी परेशान हो गए थे. खालिस्तानियों ने तो संघ को इतना निशाने पर लिया था कि पांच साल बाद भी 25 जून 1989 को मोगा में एक शाखा पर हमला बोलकर 25 संघ स्वयंसेवकों को गोलियों से भून डाला था. कई छुटपुट हमले तो होते ही रहे थे. बावजूद इसके संघ के सरकार्यवाह एच वी शेषाद्रि ने देश भर के स्वयंसेवकों को शांत रहने की सलाह दी थी.

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उसी साल प्रतिनिधि सभा की बैठक में मोगा हत्याकांड पर एक प्रस्ताव पारित किया गया था. इस प्रस्ताव में पंजाब प्रशासन सुरक्षा को लेकर कितना मुस्तैद है, उसके दावे की इन लाइनों से एक झटके में धज्जियां उड़ा दी गई थी, “The hollowness of claim by the Punjab administration that the terrorists are now on the run has been thoroughly exposed. That the CRPF, hardly within 50 yard’s of the shooting site, should have reached there full one hour after the attackers had safely slipped away, having completed their beastly assault in broad daylight right in the midst of the city, creates serious misgivings regarding the alertness, sincerity and efficiency, of the police force.”
 
बालासाहब देवरस ने भिंडरावाले को लेकर पहले ही जता दी थी आशंका

तत्कालीन संघ प्रमुख बालासाहब देवरस को पहले ही आभास हो गया था कि भिंडरावाले का स्वभाव उग्र है और ये स्वभाव किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकता है. दिसम्बर 1983 में पंजाब प्रवास के दौरान उन्होंने भिंडरावाले को लेकर कहा था कि, “बेगुनाहों की हत्या सिख धर्म में नहीं. उग्रवादी गतिविधियों से संत भिंडरावाले का नाम जुड़ा हुआ है. अपने यहां संतों की जो व्याख्या की गई है, उनसे जिन कामों की अपेक्षा की गई है, वह यह है कि प्रेम का संदेश और भाईचारे का भाव सब लोगों में निर्माण करें. भिंडरावाले संत हैं, पर उनकी भाषा में संयम कम है. वे उग्रवादी भाषा अपनाते हैं. अगर वे ऐसे कुछ वक्तव्य देते हैं, जिनके कारण उग्रवाद को बढ़ावा मिलता है और वह पनपता है तो यह बात खराब है. उससे कोई भी समस्या हल नहीं होगी. उसके कारण सारे देश में एक प्रकार से वे अलग-थलग पड़ जाएंगे. अभी कल या परसों संसद् में यह विषय निकला था. शायद इसी प्रकार का कोई वक्तव्य संत भिंडरावाले ने दिया था. सभी दलों के लोग, जितने भी संसद् में हैं, उनमें कांग्रेसवाले भी हैं, लोकसभा के अध्यक्ष बलराम जाखड़ सहित सभी लोगों ने उनकी आलोचना की है. किसी को अपनी बात मनवानी है तो उसके पक्ष में जनमत भी जागे, ऐसा प्रयास करना पड़ता है. उग्रवाद से समस्या ही निर्माण होती है. निहत्थे व निर्दोष जनों की हत्या करना, यह तो किसी धर्म में नहीं. सिख धर्म में तो है ही नहीं. निहत्थे या निर्दोष लोग जो इधर-उधर मारे जाते हैं, वह सिख धर्म और सिख सिद्धांतों के विरुद्ध बात है. इसके कारण यह समस्या हल नहीं होगी. इस मत को भी उग्र लोगों और उनके नेताओं को समझ लेना अत्यंत आवश्यक है,”
 
संघ स्वयंसेवकों ने दो बार दरबार साहिब को बचाया था

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माणिकचंद्र वाजपेयी और श्रीधर पराडकर ने अपनी किताब ‘Partition Days: The Fiery Saga of RSS’ में इन दोनों घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया है. पहला हमला 6 मार्च 1947 की रात को हुआ. “वह 6 मार्च की रात वर्दीधारी नेशनल गार्ड्स के नेतृत्व में मुसलमानों की एक शक्तिशाली, संगठित भीड़ अमृतसर के शेरावाला गेट से चौक फवारा की ओर बढ़ रही थी। इस बार उनका निशाना प्रसिद्ध कृष्णा टेक्सटाइल मार्केट और पवित्र दरबार साहिब था। लेकिन... चौक फवारा पहुंचते ही उन पर लाठियों, तलवारों, भालों, चाकुओं और बमों से चारों ओर से भीषण हमला किया गया. भीड़ ने देखा कि हमलावर निकरवाले ही थे (आरएसएस के स्वयंसेवक, जिन्हें उस दौर में खाकी शॉर्ट्स से पहचाना जाता था). स्वयंसेवकों के पुराने रिकॉर्ड से वे इतने भयभीत हो गए थे कि भाग गए. इस प्रकार, बहादुर स्वयंसेवकों के नेतृत्व में मिली जीत ने कृष्णा बाजार और दरबार साहिब दोनों को विनाश से बचा लिया.”

आरएसएस ने दरबार साहिब की हर समय किसी भी तरह के हमले से सुरक्षा के लिए 75 स्वयंसेवकों को तैनात किया (नाम और पते सहित पूरी सूची 'पार्टिशन डेज़: द फायरी सागा ऑफ आरएसएस' के परिशिष्ट में उपलब्ध है). दरबार साहिब की सुरक्षा के लिए आरएसएस के अभियानों का नेतृत्व मुख्य रूप से अमृतसर में आरएसएस की शाम की शाखाओं के तत्कालीन प्रमुख डॉ. बलदेव प्रकाश, नगर प्रचारक डॉ. इंद्रपाल और अमृतसर में सुबह की शाखाओं के प्रभारी गोवर्धन चोपड़ा ने किया था.

दरबार साहिब पर मुस्लिम भीड़ का दूसरा हमला 9 मार्च 1947 को शुरू हुआ. वाजपेयी और पराडकर ने इस घटना का भी सिलसिलेवार ब्योरा दिया है। “उस दिन, 9 मार्च 1947 को, वर्दीधारी मुस्लिम नेशनल गार्ड्स के जवान तीन तरफ से गुरुद्वारे की ओर बढ़ने लगे. एक बड़ी टुकड़ी लीग के गढ़ कटरा करम सिंह से, दूसरी नमक मंडी से और तीसरी शेरावाला दरवाजे से आगे बढ़ रही थी. सभी सैनिक हथियारों से लैस थे. वहाँ मुट्ठी भर सेवादार थे और वे डरे हुए थे. दुर्भाग्य से लगभग सौ निहत्थे तीर्थयात्री भी अंदर फंसे हुए थे. कर्फ्यू के कारण वे बाहर नहीं निकल पाए थे. हमले की आशंका की सूचना मिलने पर ग्रामीण इलाकों से आए सिखों के जत्थों को सशस्त्र पुलिसकर्मियों ने बाहर ही रोक दिया. यह सब लीग के साथ मिलीभगत से किया गया था. गुरुद्वारे से पंजाब राहत समिति के कार्यालय में फोन आ रहे थे कि मुस्लिम भीड़ दरबार साहिब की ओर बढ़ रही है और स्वर्ण मंदिर खतरे में है. ‘क्या आप स्वयंसेवक हमारी मदद के लिए नहीं आएंगे?’ कार्यालय (आरएसएस कार्यालय) के प्रभारी दुर्गा दास खन्ना उन्हें आश्वासन देते रहे – घबराइए मत, स्वयंसेवक वहां पहुँच चुके हैं और उन्होंने हर गली में मोर्चा संभाल लिया है. चाहे कुछ भी हो जाए, हम पवित्र दरबार साहिब को कुछ नहीं होने देंगे. इस बार भी हम मुसलमानों को सबक सिखाएंगे.”

वे आगे लिखते हैं, “हमलावर आगे बढ़ रहे थे, लेकिन स्वयंसेवक भी सतर्क थे. डॉ. बलदेव प्रकाश भी स्वयंसेवकों की एक टीम के साथ वहाँ पहुँच चुके थे. हर मोहल्ला और हर घर किले में तब्दील हो चुका था, इस बार योजना सिर्फ आत्मरक्षा की नहीं, बल्कि जवाबी हमले की थी.” पहला टकराव चौक फव्वारा में हुआ, जहां कुछ झड़पों के बाद हमलावरों को पीछे हटना पड़ा, अन्य सभी स्थानों पर भी यही हुआ. वे लिखते हैं कि, “अब पासा पूरी तरह पलट चुका था. हमलावर भाग रहे थे और रक्षक उनका पीछा कर उन्हें दंडित कर रहे थे. पूरा शहर ‘हर हर महादेव’ और ‘सत श्री अकाल’ के नारों से गूंज रहा था।”
 
संघ ने 1984 के दंगों में सिखों की मदद की

आरएसएस के स्वयंसेवकों ने दिल्ली जैसे दंगा प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा दस्ते बनाए और सिखों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने, भोजन, चिकित्सा सहायता और आश्रय प्रदान करने में मदद की। उस समय की कई रिपोर्ट्स से पता चलता है कि आरएसएस स्वयंसेवकों ने भीड़ के हमलों में हस्तक्षेप करने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाली और कई बार उन्होंने सिख परिवारों और संपत्तियों को दंगाइयों से बचाया. अन्य संगठनों के सहयोग से, आरएसएस ने विस्थापित सिखों को आश्रय देने के लिए गुरुद्वारों और सामुदायिक सभाघरों में अस्थायी राहत केंद्र स्थापित किए. ये विभाजन के समय से थोड़ा अलग माहौल था, संघ को विभाजन के समय सिखों को मुस्लिमों से बचाना था, हालांकि तब उनके ही कई स्वयंसेवक सिख थे, 1984 में कांग्रेस के भड़काए में आए उनके हिंदू कार्यकर्ताओं से बचाना था. जहां आरएसएस ने दिल्ली में तिलक नगर, जंगपुरा और अन्य दंगा प्रभावित क्षेत्रों सहित कई राहत शिविर स्थापित और प्रबंधित किए, जहां उन्होंने हजारों प्रभावित सिखों को भोजन, वस्त्र, कंबल और चिकित्सा सामग्री जैसी आवश्यक वस्तुएं प्रदान कीं.

ऐसे अधिकांश शिविर सिख संस्थाओं के सहयोग से लगाए गए थे. स्थानीय संस्थाओं, मोहल्ला समितियों आदि की भी मदद ली गई थी. इस दौरान पुराने स्वयंसेवक अटल बिहारी बाजपेयी तो खाली बैठे ही नहीं थे, रात रात भर पूरी दिल्ली में घूम घूमकर उन्होंने कई सिखों की जान बचाई. खुशवंत सिंह ने भी उनके इन प्रयासों के बारे में लिखा है.

ऑर्गनाइजर के 11 नवम्बर 1984 के अंक में संघ प्रमुख बालासाहब देवरस का वक्तव्य प्रकाशित हुआ, जिसमें इंदिरा गांधी की हत्या की भी निंदा की गई थी और हत्या के बाद सिखों के साथ हो रही हिंसा की भी. उन्होंने हिंदुओं से अपील की कि अपने सिख भाइयों की रक्षा करना उनका कर्तव्य है. उन्होंने स्वंयसेवकों से अपील की कि सुरक्षा दस्ते बनाकर सिख भाइयों की रक्षा करें.

इसके बाद संघ के स्वयंसेवकों ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान क्षतिग्रस्त अकाल तख्त और हरमंदर साहब के पुनर्निर्माण के लिए भी सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति का सहयोग किया. संघ के 100 साल पूरा होने पर हुए कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि 1984 में हुए सिख कत्लेआम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने सिखों की मदद की थी. RSS कार्यकर्ताओं ने कई कई सिख परिवारों को अपने घरों में शरण दी थी. भाजपा के प्रवक्ता आरपी सिंह ने भी कहा कि वह भी इन दंगों में इसी वजह से बच पाए थे, क्योंकि उस समय आरएसएस ने उनकी मदद की. उस समय उसके माता-पिता भी उनके साथ थे.
 
सिखों से रिश्ते संघ के लिए महत्वपूर्ण

संघ से जुड़ा संगठन सिख संगत और सरदार चिरंजीव जैसे प्रचारक लगातार परम्पराओं के आधार पर हिंदू-सिख रिश्तों की मजबूती पर जोर देते रहे हैं. सिख दंगों की जांच में तेजी लाने का मोदी सरकार का निर्णय हो, विभाजन विभीषिका दिवस मनाने का निर्णय, करतारपुर कॉरीडोर समझौता हो या फिर वीर बाल दिवस मनाने का निर्णय, या फिर हालिया दिल्ली सरकार का 1984 के सिख विरोधी दंगों से प्रभावित परिवारों के 36 आश्रितों को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र सौंपना इन्हीं प्रयासों में आते हैं और जाहिर है इन सबके पीछे संघ के ही अथक प्रयास रंग लाए हैं.

पिछली कहानी: जब कट्टर मार्क्सवादी बना स्वदेशी जागरण मंच का पहला संयोजक

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