केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. मंदिर प्रबंधन देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के वकील एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने बुधवार को अपने तर्क रखे. उन्होंने कहा कि किसी समुदाय की परंपरा या आस्था सही है नहीं, यह उसी समुदाय की आस्था के आधार पर तय होना चाहिए.
सबरीमाला में फिर शुरू हुई है सुनवाई
सिघवी ने कहा कि. धर्म एक समूह या समुदाय की आस्था से जुड़ा है. इसलिए कुछ लोगों (महिलाओं की एंट्री) के अधिकार को पूरे समुदाय के अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता.
इससे पहले 7 से 9 अप्रैल तक 3 दिन सुनवाई के दौरान भी महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखी गईं, तब केंद्र सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए.
'धर्म किसी एक सटीक परिभाषा में नहीं बंध सकता'
बता दें कि बुधवार को एक बार फिर सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच से सुनवाई शुरू की. त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि 'धर्म किसी एक सटीक परिभाषा में नहीं बंध सकता, बल्कि यह किसी समुदाय के साझा विश्वासों और प्रथाओं का समूह होता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि अदालत को किसी समुदाय के विश्वास को स्वीकार करना चाहिए और उसकी वैधता पर सवाल नहीं उठाना चाहिए, जब तक कि वह अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करे.'
अदालत की सीमाएं क्या?
सिंघवी ने कहा कि कोर्ट यह तय नहीं कर सकता कि कौन-सी धार्मिक प्रथा सही या गलत है. संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता पर केवल चार आधारों, पब्लिक ऑर्डर, नैतिकता, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था पर ही प्रतिबंध की अनुमति दी है. इसके अलावा कोई नया आधार नहीं जोड़ा जा सकता. उन्होंने राम जन्मभूमि मामला का हवाला देते हुए कहा कि अदालत को किसी भी धार्मिक आस्था की व्याख्या करने की कोशिश से बचना चाहिए.
सिंघवी ने कहा कि संविधान का आर्टिकल 25 धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं की रक्षा करता है. वहीं अनुच्छेद 16(5) के तहत धार्मिक संस्थाएं अपने यहां नियुक्तियों में कुछ हद तक प्रतिबंध लगा सकती हैं, लेकिन जाति, लिंग या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकतीं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई संस्थान कहता है कि “सिर्फ हिंदू आ सकते हैं”, तो यह स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन अगर वह कहे कि 'सिर्फ उत्तर भारत के हिंदू ही आएंगे', तो यह भेदभावपूर्ण होगा.
CJI ने पूछे सवाल
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या एक ही पंथ के भीतर भी भेदभाव संभव है? इस पर सिंहवी ने कहा कि 'धार्मिक आचरण और उसके प्रचार में फर्क है' और जब तक एक समुदाय का आचरण दूसरे के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करता, उसे संरक्षित किया जाना चाहिए. जस्टिस बीवी. नागरत्ना ने कहा कि धर्म का मूल संबंध “मनुष्य और ईश्वर” के बीच है, लेकिन सेक्युलर प्रथाओं का क्या होगा? इस पर सिंघवी ने जवाब दिया कि हिंदू धर्म में चार्वाक जैसे नास्तिक दर्शन भी मौजूद हैं, जो इसे एक 'जीवन शैली' बनाते हैं, न कि केवल ईश्वर से संबंध.
सिंहवी ने कहा कि यह तय करना समुदाय का अधिकार है कि कौन-सी प्रथा उसके विश्वास का हिस्सा है. अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए, जब तक कि वह किसी अन्य मौलिक अधिकार का उल्लंघन न करे. उन्होंने शिरूर मठ केस और देवरु केस का हवाला देते हुए कहा कि केवल वही प्रथाएं संरक्षित होंगी, जो समुदाय के सामूहिक विश्वास का हिस्सा हों, न कि कुछ व्यक्तियों की निजी व्याख्या.
सिंघवी ने उदाहरण देते हुए कहा कि दिगंबर जैन मुनियों या कुंभ में नग्न नागा साधुओं की परंपरा को सामान्य सामाजिक नैतिकता के आधार पर नहीं परखा जा सकता, क्योंकि यह उनके धर्म का मूल हिस्सा है.
सुनवाई के दौरान जस्टिस सुंदरेश ने पूछा कि जब कानून सामाजिक सुधार के लिए बनाया जाता है- जैसे हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन तो अदालत की भूमिका क्या होगी? इस पर सिंघवी ने कहा कि राज्य को सेक्युलर गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार है, लेकिन इससे धार्मिक स्वतंत्रता खत्म नहीं होनी चाहिए.
अनीषा माथुर