केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. देश की शीर्ष अदालत में इस बहुचर्चित मामले पर गहन संवैधानिक मंथन शुरू हो चुका है. भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने इस मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई के लिए 9 जजों की संविधान पीठ का गठन किया है. यह पीठ अब नियमित सुनवाई कर रही है और इसकी अध्यक्षता स्वयं सीजेआई कर रहे हैं.
इस सुनवाई को न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसका प्रभाव आने वाले दशकों तक देश की धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को तय कर सकता है.
क्या है पूरा मामला
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर परंपरागत रूप से प्रतिबंध रहा है. यह प्रतिबंध भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप से जुड़ा माना जाता है.
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने इस परंपरा को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. अदालत ने कहा था कि यह प्रतिबंध महिलाओं के साथ भेदभाव करता है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के खिलाफ है.
हालांकि इस फैसले के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं. कई धार्मिक संगठनों और परंपरा के समर्थकों ने इसे आस्था में हस्तक्षेप बताते हुए विरोध जताया. इसके बाद कुल 67 पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें इस परंपरा को ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) बताते हुए संरक्षित करने की मांग की गई.
तीन दिन में दलीलें पूरी करने का निर्देश
सुनवाई की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने यह सुनिश्चित किया कि सभी पक्षों ने अपनी लिखित दलीलें दाखिल कर दी हैं.
कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं को 7 से 9 अप्रैल के बीच तीन दिनों में अपनी दलीलें पूरी करने का निर्देश दिया. इसके बाद मूल याचिकाकर्ताओं को भी तीन दिन का समय दिया जाएगा.
हालांकि, कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई सूची से ऐसा लगता है कि वे तय समयसीमा का पालन नहीं कर रहे हैं. इस पर सीजेआई ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि 33 में से 9 जज इस पीठ में बैठे हैं, इसलिए समय का सम्मान जरूरी है.
केंद्र सरकार से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखे तर्क
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें रखनी शुरू कीं. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी पक्ष का समर्थन किए बिना केवल कानून के आधार पर अपनी बात रखेंगे.
पुनर्विचार याचिकाओं में कहा गया है कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध किसी भी प्रकार के भेदभाव पर आधारित नहीं है, बल्कि यह भगवान अयप्पा की धार्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है.
साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि न्यायिक समीक्षा के जरिए किसी धर्म की ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह उस संप्रदाय की मूल पहचान से जुड़ा विषय है.
हिंदू धर्म की बहुलता पर जोर
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलों में हिंदू धर्म की बहुलता (plurality) को प्रमुखता से रखा. उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है.
उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म में वेद, उपवेद, वेदांग, पुराण, मीमांसा और न्याय जैसे अनेक ग्रंथ और दर्शन शामिल हैं. साथ ही यह धर्म आस्तिक और नास्तिक दोनों विचारधाराओं को स्वीकार करता है.
उन्होंने चार्वाक दर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि हजारों साल पहले भी ऐसे दर्शन मौजूद थे, जो ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते थे.
इसी तरह उन्होंने जैन और बौद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि ये भी पारंपरिक ईश्वर की अवधारणा से अलग रास्ता अपनाते हैं.
धार्मिक संप्रदायों में भी आंतरिक तौर पर कई फर्क
एसजी ने यह भी कहा कि केवल हिंदू धर्म ही नहीं, बल्कि इस्लाम और ईसाई में भी कई संप्रदाय हैं.
उन्होंने कहा कि सुन्नी, शिया, खवारिज जैसे इस्लामी संप्रदाय doctrinal differences के आधार पर अलग हैं. इसी तरह ईसाई धर्म में भी कई denominations हैं.
उन्होंने अदालत से कहा कि धर्म को एक व्यापक श्रेणी के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि उसके भीतर मौजूद संप्रदायों और उप-संप्रदायों को समझना जरूरी है.
साझा आस्था के स्थल: संप्रदाय से परे पहचान
एसजी ने गुरु आधारित और समावेशी धार्मिक स्थलों का उदाहरण भी दिया. उन्होंने शिरडी का उल्लेख करते हुए कहा कि यह किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है और यहां हिंदू-मुस्लिम सभी श्रद्धालु आते हैं.
इसी तरह तिरुपति बालाजी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह वैष्णव तीर्थ होने के बावजूद सभी हिंदुओं के लिए खुला है. उन्होंने ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह का भी जिक्र किया, जहां सभी धर्मों के लोग जाते हैं. उनके मुताबिक, यह भारतीय धार्मिक संरचना की अंतर्निहित बहुलता को दर्शाता है.
भारत में धर्म और धर्म निरपेक्षता
एसजी ने तर्क दिया कि भारत में धर्म और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पश्चिम से अलग है. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 को अमेरिकी संविधान से नहीं लिया गया, बल्कि इन्हें भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किया गया है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इन प्रावधानों की प्रेरणा आयरलैंड के संविधान से भी जुड़ी है.
न्यायिक समीक्षा की सीमा पर बहस
सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठा कि क्या अदालत के पास धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या करने की पर्याप्त विशेषज्ञता है.
एसजी ने कहा कि धार्मिक मामलों में doctrinal differences और interpretative differences होते हैं, जिन्हें समझने के लिए विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है. उनके अनुसार, न्यायिक समीक्षा की एक सीमा होनी चाहिए, खासकर तब जब मामला ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ से जुड़ा हो.
'तीन दिन के अछूत मानना... प्रथा का हिस्सा नही हो सकता'
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा, “सबरीमाला के संदर्भ में अनुच्छेद 17 को कैसे लागू किया जा सकता है, यह मुझे समझ नहीं आता. एक महिला के रूप में कह रही हूं कि हर महीने तीन दिन के लिए अछूत मानना और फिर चौथे दिन सब ठीक हो जाना, यह प्रथा नहीं हो सकती.
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि वे मासिक धर्म के मुद्दे पर तर्क नहीं रख रहे हैं. उन्होंने कहा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध मासिक धर्म से जुड़ा नहीं है, बल्कि केवल एक विशेष आयु वर्ग (10-50 वर्ष) से संबंधित है.
उन्होंने कहा, 'यह स्पष्ट होना चाहिए कि सबरीमाला केवल एक खास आयु वर्ग से संबंधित मामला है. इसमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए. देश और दुनिया में भगवान अयप्पा के अन्य सभी मंदिर सभी आयु वर्ग की महिलाओं के लिए खुले हैं. केवल एक मंदिर में यह प्रतिबंध है. यह एक विशेष (sui generis) मामला है.”
अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, जस्टिस एस बागची और जस्टिस एमएम सुंदरेश ने अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए. यह बहस इस बात पर केंद्रित रही कि क्या अनुच्छेद 25(2) के तहत बनाए गए कानून, अनुच्छेद 25(1) के अधिकारों को सीमित कर सकते हैं.
साथ ही यह भी चर्चा हुई कि ‘मौजूदा कानून’ (existing law) में परंपराएं और प्रथाएं भी शामिल हैं या नहीं.
देवऱु केस का भी हुआ जिक्र
सुनवाई में 1957 के Venkataramana Devaru vs State of Mysore फैसले का विशेष रूप से उल्लेख किया गया.
इस मामले में अदालत ने ‘सार्वजनिक मंदिर’ और ‘संप्रदायिक मंदिर’ के बीच अंतर स्पष्ट किया था. कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि कोई मंदिर सार्वजनिक है, तो उसमें सभी हिंदुओं को प्रवेश का अधिकार होगा, भले ही वह किसी विशेष संप्रदाय से जुड़ा क्यों न हो.
इस सुनवाई में फिलहाल बड़े संवैधानिक सवालों जैसे न्यायिक समीक्षा का दायरा, धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता का अधिकार—पर विचार किया जा रहा है.
सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा अंतिम निर्णय के बाद अलग से तय किया जा सकता है. तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि इस मामले में जो भी फैसला आएगा, उसका असर अगले 30-40 वर्षों तक पूरे देश पर पड़ेगा. उन्होंने यह भी कहा कि उनके अनुसार 2018 का सबरीमाला फैसला गलत है और इसे पुनर्विचार में बदला जाना चाहिए.
अनीषा माथुर