प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट 'जल जीवन मिशन' का संकल्प था- हर घर नल से जल. इस स्कीम को लेकर तमाम सरकारी दावे किए गए हैं, लेकिन इन दावों की जमीनी हकीकत आजतक की विशेष पड़ताल ‘ऑपरेशन जिंदगी’ में पूरी तरह बेनकाब हो गई है. राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में इस योजना की जो हकीकत सामने आई है, वह सरकारी दावों की पोल खोलने के साथ-साथ एक बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है. घरों के बाहर नीले नल लगे हैं, पाइपलाइन बिछी है, कागजों में पानी पहुंच चुका है, लेकिन असल जिंदगी में लोग एक-एक बूंद पानी को तरस रहे हैं.
राजस्थान के जयपुर जिले के गणेशपुरा गांव की तस्वीर सरकार के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. 'हर घर नल से जल' ने जयपुर जिले के गणेशपुरा गांव की तस्वीर और तकदीर बदल दी. आज गांव के घर-घर नल के नाम पर नीली पाइलाइन तो बिछ गई, कागजों पर जल जीवन मिशन के तहत गांववालों तक पानी पहुंच गया, लेकिन गांववाले एक-एक बूंद पानी के लिए तड़प रहे हैं, तरस रहे हैं. कारण, बीते डेढ़ साल में इन नीली पाइप में पानी नहीं आया. हंसा, ममता और लाली जैसी तमाम महिलाओं का दर्द यही है कि आखिर नीले पाइप वाले नल से जल कब मिलेगा?
पानी का संकट ऐसा है कि सरकारी नल से पानी नहीं आता और पानी की जरूरत को पूरा करने में गांववालों को खून-पसीने की पूरी कमाई ही गवानी पड़ रही है. मतलब संकट ये है कि लोग मोल का पानी खरीदकर जिंदा रहे या फिर दो जून की रोटी का इंतजाम करें. संकट जीवन पर है लेकिन 'जल जीवन मिशन' ने ही गांववालों को प्यासा मरने के लिए छोड़ दिया है.
दूदू में 100 करोड़ के घोटाले का आरोप
स्थानीय लोग बताते हैं कि चुनाव से पहले बीजेपी के नेताओं ने हर घर जल पहुंचाने का खूब ढोल पीटा था. गांव वालों ने भरोसा करके वोट दिया, लेकिन बदले में गांववालों को प्यासा रहने की चोट मिली. आरोप है कि इलाका डिप्टी सीएम प्रेमचंद्र के विधानसभा में आता हैं, लेकिन प्रेमचंद्र चुनाव जीत गए, डिप्टी सीएम बन गए, लेकिन गांववालों की सुध एक बार भी नहीं ली, मिला तो सिर्फ आश्वासन.
गांव के तेजकरण बताते हैं कि घर के बाहर नल तो लगा है, लेकिन उन्हें हर महीने 2,400 रुपये का पानी टैंकरों से खरीदना पड़ता है. गांव का बोरिंग का पानी इतना खारा है कि उसे जानवर भी नहीं पी सकते. आरोप है कि यह इलाका डिप्टी सीएम प्रेमचंद्र बैरवा के विधानसभा क्षेत्र में आता है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद किसी ने सुध नहीं ली. दूदू विधानसभा क्षेत्र में जल जीवन मिशन में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा के घोटाले सामने आने की बात भी ग्रामीण कह रहे हैं.
राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, डिप्टी सीएम प्रेमचंद्र बैरवा और जलदाय मंत्री कन्हैया लाल चौधरी को गणेशपुरा गांव की आपबीती सुननी चाहिए. जवाब देना चाहिए कि नल लगाकर हर घर जल पहुंचाने की कागजी खानापूर्ति वाला खेल कब तक चलता रहेगा? आखिर गणेशपुरा गांव को अपने हाल पर क्यों छोड़ दिया गया है?
गुजरात: योजना की आड़ में करोड़ों का घोटाला
प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में स्थिति और भी चौंकाने वाली है. आजतक की पड़ताल में सामने आया कि अकेले महिसागर जिले में नल से जल योजना में 123 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है. जिले के 600 से ज्यादा गांवों में नल सूखे पड़े हैं. वांटा गांव में 22 लाख रुपये का काम मंजूर हुआ, भुगतान भी हो गया, लेकिन सिर्फ 6 घरों में पानी पहुंचा. इस गांव में 50 से 60 घर हैं. हर घल नल से जल योजना के तहत, सर्वे हुआ, पाइप लाइन बिछाई गईं. लेकिन पानी क्यों नहीं आया, कोई नहीं जानता. कालीबेल गांव में 64 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद दो साल से नल सूखे हैं. मंकोडिया गांव में 24 लाख रुपये का वर्क ऑर्डर जारी हुआ, पाइपलाइन बिछी, लेकिन पानी आज तक नहीं आया.
जांच के दौरान गुजरात सरकार ने माना कि गड़बड़ी हुई है. जल संसाधन मंत्री ईश्वरसिंह पटेल के मुताबिक यूनिट मैनेजर समेत 11 कर्मचारियों को सस्पेंड किया गया, 112 एजेंसियों को डिबार किया गया और रिकवरी की प्रक्रिया चल रही है. सीआईडी क्राइम के अनुसार अब तक 23 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. बावजूद इसके सवाल बना हुआ है कि जब घोटाला पकड़ में आया, तब तक गांव-गांव लोग प्यासे क्यों रहे? सिर्फ महिसागर ही नहीं, नवसारी में 12.44 करोड़, दाहोद और बनासकांठा जिलों में भी नल से जल योजना में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं. कई जगहों पर फर्जी बिल, अधूरे काम और कागजी खानापूर्ति की बात जांच में उजागर हुई है.
जब प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य में ये हाल है, तो सोचिए बाकी जगहों का क्या होगा? गुजरात के जल संसाधन मंत्री, ईश्वरसिंह पटेल, राज्य में नल से जल योजना में हुए घोटाले को पकड़ने और उसकी जांच करवाने की बात तो कर रहे हैं लेकिन इतने सालों से गुजरात के गांवों में ये योजना लागू क्यों नहीं हो पाई. इसका कोई जवाब नहीं है.
उत्तर प्रदेश: दावे ऊंचे, हकीकत शून्य
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह लगातार दावा करते रहे हैं कि हर घर नल से जल योजना पर तेजी से काम हो रहा है और रोड़ा अटकाने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी. लेकिन कानपुर जिले के पचौर और शादीपुर गांव की तस्वीर इन दावों की पोल खोल देती है.
पचौर गांव में दो साल पहले घर-घर नल लग गए, पानी की टंकी भी बन गई, लेकिन आज तक एक बूंद पानी नहीं आया. चंदा देवी बताती हैं कि रोज पानी जुटाने में पूरा दिन निकल जाता है. गांव के लोग कहते हैं कि कागजों में योजना पूरी दिखा दी गई, सरकारी बोर्ड पर लाभार्थियों की संख्या तक लिख दी गई, जबकि जमीनी हकीकत शून्य है.
शादीपुर गांव में भी टंकी बनी, पाइपलाइन डली, लेकिन सप्लाई शुरू नहीं हुई. ग्रामीणों का आरोप है कि जल जीवन मिशन भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है. जब जिम्मेदारों से सवाल पूछे गए तो जवाब मिला कि बजट की कमी है और 2028 तक योजना पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन सवाल यह है कि जहां टंकी और नल मौजूद हैं, वहां पानी क्यों नहीं पहुंचा?
अब सवाल सीधे-सीधे जिम्मेदारों से है कि जब टंकी बन चुकी है, नल घरों तक पहुंच चुके हैं, तो पानी क्यों नहीं पहुंचा? जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, जल निगम ग्रामीण के अध्यक्ष अनुराग श्रीवास्तव, प्रबंध निदेशक राज शेखर और मिशन के प्रभारी प्रभास कुमार को इसका जवाब देना चाहिए कि कब तक 'हर घर नल से जल' सिर्फ कागजों में चलता रहेगा और गांवों की प्यास यूं ही अनसुनी बनी रहेगी? प्रभास कुमार से जब संपर्क किया गया तो उन्होंने यही दावा किया कि जल्द ही काम पूरा होगा, 2028 तक योजना को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. अभी बजट की कमी के चलते काम ठप है.
आजतक ब्यूरो