भगवान कार्तिकेय की पहाड़ी पर कहां से आई दरगाह... क्या मदुरै दीपम विवाद की पटकथा 700 साल पहले लिखी गई थी

तमिलनाडु के मदुरै के पास तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का स्थल है, जहां कार्तिगई दीपम की परंपरा सदियों से चली आ रही है. यहां सिकंदर शाह की दरगाह भी स्थित है, जो हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक रही है.

Advertisement
मदुरै स्थित तिरुपरंकुदरम पहाड़ी पर दरगाह का इतिहास 14वीं सदी से जुड़ता है मदुरै स्थित तिरुपरंकुदरम पहाड़ी पर दरगाह का इतिहास 14वीं सदी से जुड़ता है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 07 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:04 PM IST

तमिलनाडु के मदुरै से 10 किमी दूर है तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी. तमिल और आगम शास्त्र की मानें तो यह पहाड़ी तमिलों के भगवान और शिवपुत्र कार्तिकेय के छह निवासों में से एक है. यहां पर सदियों से कार्तिगाई दीपम की परंपरा चलती आ रही है, जिसमें इस पहाड़ी और यहां भगवान मुरुगन से संबंधित स्थलों पर दीप जलाने की परंपरा रही है.

Advertisement

कार्तिगई दीपम विवाद, दीपतून और दरगाह

इस पहाड़ी पर एक दरगाह भी है, जिसे सिकंदर बादुशाह की दरगाह कहते हैं. बीते 3-4 दशक पहले तक तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी हिंदू-मुस्लिम एकता की साझी विरासत का प्रतीक थी, लेकिन अब कार्तिगई दीपम को लेकर विवाद सामने आने लगे हैं. प्रमुख विवाद यहां दरगाह के पास स्थित एक दीपतून (दीप स्तंभ) को लेकर है, और यह विवाद कोर्ट तक पहुंच चुका है.

यह पहाड़ी सिर्फ हिंदू तीर्थ के रूप में नहीं पहचानी जाती है, बल्कि यहां जैन संस्कृति के चिह्न भी मिलते हैं. लेकिन सवाल उठता है कि तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी पर दरगाह का इतिहास कितना पुराना है और इसकी मान्यता कहां से शुरू हुई.

माबार सल्तनत तक जाता है इतिहास

तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी के इतिहास का सिरा पकड़कर चलते हैं तो यह हमें माबार सल्तनत के एक छोर पर ले जाता है. माबार सल्तनत की पहचान मदुरै सल्तनत के तौर पर भी रही है और सबसे बड़ी बात है कि मदुरै के इतिहास में इस सल्तनत का शासन काल 50 साल भी नहीं है.

Advertisement

इतिहासकारों की मानें तो इसकी स्थापना 'जलालुद्दीन अहसन ख़ान' ने की थी. यह राज्य केवल 45-48 वर्षों तक अस्तित्व में रहा और इस दौरान यहां 8 सुल्तानों का शासन रहा. जलालुद्दीन अहसन खान को दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने मदुरै प्रांत का सूबेदार बनाया था. बाद में अहसन खान ने 1335 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्रता की घोषणा कर मदुरै को अपनी राजधानी बनाते हुए खुद को सुल्तान घोषित कर दिया.

अहसन के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने 1378 ईस्वी सत्ता संभाली और जब अंतिम सुल्तान 'अलाउद्दीन सिकंदर शाह' को पड़ोसी विजयनगर साम्राज्य के शासक 'कुमार कंपालन (कुमारा कम्पण)' ने युद्ध में पराजित कर दिया तब माबार सल्तनत का खात्मा हो गया.

इतिहासकारों में मतभेद

हालांकि इस माबार सल्तनत की स्थापना के सटीक वर्ष को लेकर मतभेद हैं. 'सिक्कों से जुड़े प्रमाण (न्यूमिस्मैटिक एविडेंस)' इसके '1335 ईस्वी' में स्थापित होने की ओर संकेत करते हैं, जबकि समकालीन इतिहासकार 'फ़िरिश्ता' के अनुसार माबार सल्तनत की स्थापना '1340 ईस्वी' में हुई थी. माबार सल्तनत में आज के तमिलनाडु के मदुरै, तिरुचिरापल्ली, कड्डालोर और विलुपुरम ज़िले शामिल थे. 1378 ईस्वी में उभरते हुए विजयनगर साम्राज्य ने आगे के वर्षों में इस सल्तनत पर अधिकार कर लिया और इसके साथ ही माबार सुल्तानों का शासन समाप्त हो गया.

Advertisement

अमेरिकी इतिहासकार ने बुक में किया है युद्ध का जिक्र

अमेरिकी इतिहासकार बर्टन स्टेन ने भारत के दक्षिणी राज्यों के इतिहास को सामने रखते हुए किताबें लिखी हैं. ऐसी ही अपनी एक किताब 'विजयनगर' में वह 14वीं सदी में विजयनगर द्वारा माबार सल्तनत पर विजय को बहुत बारीकी से सामने रखते हैं.

वह लिखते हैं कि 14वीं सदी में दक्षिण भारत में धर्म और सत्ता का महायुद्ध चल रहा था. उस समय, विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के बाद उसकी शक्ति को मजबूत करने के लिए विभिन्न सैन्य अभियान चलाए जा रहे थे. इसी क्रम में कुमार कम्पना, बुका प्रथम के पुत्र और हरिहर द्वितीय के भाई, ने दक्षिण तमिल देश में युद्ध छेड़ा. यह अभियान केवल सैन्य विजय नहीं था, बल्कि इसे धर्म और न्याय की स्थापना के रूप में प्रस्तुत किया गया. कई शिलालेखों में इसे मुसलमानों के अत्याचार को समाप्त करने और "धार्मिक राजा" की नई पहचान के तौर पर देखा गया है.

 

बर्टन अपनी किताब में जिक्र करते हैं कि, इसी सिलसिले में कुमार कम्पना का अभियान थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी तक पहुंचा, जो मदुरै के पास है. यह स्थल भगवान मुरुगन के दक्षिण में पहले निवास के रूप में प्रसिद्ध था. सिकंदर शाह युद्ध में मारे गए, और उनके मरने के बाद विजयनगर साम्राज्य ने दक्षिण तमिल क्षेत्रों में अपनी प्रभुता स्थापित की.

Advertisement

कुमार कम्पना की विजय ने क्षेत्रीय मुसलमान शासकों की शक्ति को कमजोर किया और विजयनगर साम्राज्य के विस्तार को बढ़ावा दिया.' कुमार कम्पना का अभियान और सिकंदर शाह का पराजय दक्षिण भारत के मध्यकालीन इतिहास में निर्णायक मोड़ था. थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी इस युद्ध का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीक है. विजय और मृत्यु की घटनाएं स्थानीय इतिहास और लोगों की यादों में जीवित रहीं.

साहित्य रचना में भी विजयनगर अभियान का जिक्र

ऐतिहासिक पुस्तकों के अलावा साहित्यिक रचनाओं में भी कुमार कम्पना की विजय का वर्णन बहुत विस्तार से हुआ है. कुमार की पत्नी गंगादेवी जो खुद एक विद्वान और लेखिका थीं. उन्होंने इस युद्ध और विजयनगर की विजय का वर्णन अपने प्रसिद्ध संस्कृत महाकाव्य 'मदुरै विजयम्’ में किया है. काव्यात्मक किंवदंती के अनुसार, गंगादेवी खुद देवी का शस्त्र कुमार कम्पना को देती हैं, ताकि वे सल्तनत से मदुरै को मुक्त कराएं, मीनाक्षी मंदिर को फिर से खोलें और अन्याय के दूर कर न्यायप्रिय शासन की स्थापना करें. हालांकि इस काव्यकृति में भी पहाड़ी पर कहीं किसी निर्माण की जानकारी नहीं मिलती है.

हालांकि बाद के दिनों में यह पहाड़ी जिसे हमेशा सिकंदर शाह की याद से जोड़कर देखा जाता रहा था, वह आस्था का केंद्र बनी रही और इसी बीच कभी यहां दरगाह का निर्माण हुआ. लेकिन यह दरगाह किसी सुल्तान की है या किसी सूफी संत की इस पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं. हालांकि अधिकांश विवरण और मीडिया रिपोर्ट में यही दर्ज है कि सुल्तान सिकंदर शाह की याद में ही यहां दरगाह बनाई गई. जिसके निर्माण का इतिहास भी 14वीं शताब्दी से जुड़ा है.

Advertisement

साल 1805 में हुआ दरगाह का जीर्णोद्धार!

यह मदुरै सल्तनत के अंतिम सुल्तान अला-उद-दीन सिकंदर शाह (शासनकाल 1368-1378 ई.) की याद में बनी. 1378 ई. में विजयनगर के कुमार कंपना ने उन्हें युद्ध में हराया और मार डाला. उनके अनुयायियों ने उन्हें सूफी संत मानते हुए पहाड़ी पर कब्र के ऊपर स्मारक बनाया, जो आगे चलकर दरगाह बन गई. साल 1805 ई. में इलायंगुडी के जमींदार मीरान मुगैदीन रावथर (रावथर मुस्लिम समुदाय के प्रभावशाली जमींदार) ने दरगाह का जीर्णोद्धार कराया, जिससे वर्तमान संरचना का स्वरूप मिला. ये दरगाह तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की ओर से उसकी संपत्ति के तौर पर लिस्ट में शामिल है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement