अमेरिका-इज़रायल के ईरान पर हमले के बाद पश्चिमी एशिया में जो संघर्ष शुरू हुआ, उसने दुनिया को अपने चपेट में ले लिया. कई देशों में ईंधन का संकट फैल गया है और भारत पर भी इसका असर दिख रहा है. आज जब देश के कई हिस्सों में एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत और बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है, तो एक बार फिर मिट्टी के तेल (केरोसिन) की चर्चा होने लगी है. सरकार की ओर से केरोसिन उपलेब्ध कराने की सुगबुगाहट ने आज की उस 'इंस्टेंट' पीढ़ी को हैरान कर दिया है जो गैस चूल्हे के अलावा कुछ नहीं जानती. लेकिन इसी खबर ने 90 के दशक से पहले की उस पीढ़ी को स्मृतियों के गलियारे में ला खड़ा किया है, जहाँ रसोई का मतलब पीतल या लोहे का वह चमकता हुआ 'स्टोव' हुआ करता था. रसोई का वह पुराना खिलाड़ी, जो सिर्फ चूल्हा नहीं था, बल्कि मध्यवर्गीय परिवारों के धैर्य और संघर्ष का प्रतीक था.
आज की 'इंस्टेंट' दुनिया में जब हम एक बटन दबाकर नीली लौ पर खाना बनाना शुरू कर देते हैं, तो शायद हमें अंदाजा भी नहीं कि 90 के दशक से पहले की रसोई किसी 'एडवेंचर' से कम नहीं थी. एलपीजी सिलेंडर की किल्लत ने आज फिर उस पुराने खिलाड़ी की याद दिला दी है जिसे 'स्टोव' कहते थे. पीतल का वो चमकता हुआ यंत्र, जो कबाड़खाने में जाने से पहले हर घर की धड़कन हुआ करता था.
स्टोव जलाना अपने आप में एक 'मिशन' था. सबसे पहले उसकी टंकी में मिट्टी का तेल (केरोसिन) भरना और फिर शुरू होता था सबसे रिस्की काम—पंप मारना. हवा भरने के लिए जब उस हैंडल को ऊपर-नीचे किया जाता था, तो उसकी 'खट-खट' की आवाज़ पूरे मोहल्ले को बता देती थी कि फलां के घर में चाय की तैयारी हो रही है.
यहीं से जीवन का वो सबक शुरू होता था जिसे आज की 'जेन-ज़ी' शायद कभी न समझ पाए. स्टोव सिखाता था कि आग और सुकून, दोनों वक्त मांगते हैं. जौन एलिया का कोई शेर हो या स्टोव की नीली लौ, दोनों को समझने के लिए खुद को तपाना पड़ता है. स्टोव कहता था कि मंज़िल पाना (हासिल-ए-कुन) आसान है, पर हकीकत में लौ जलाने के लिए मेहनत की रगड़ ज़रूरी है.
उस दौर में स्टोव की 'पिन' अलग ही लेवल का कंट्रीब्यूट करता था, इसलिए उसका स्वैग भी कम नहीं था. आंच धीमी पड़ते ही एक पतली सी तार वाली पिन से बर्नर के छेद को साफ किया जाता था. यह काम किसी डॉक्टर की सर्जरी जैसा सटीक होता था—ज़रा सी चूक और हाथ जलने का डर. और वो 'भभकना'! जब स्टोव अचानक आग के गोले में बदल जाता था, तब घर की महिलाओं की फुर्ती देखने लायक होती थी. उसे उठाकर आंगन में फेंकना किसी एक्शन फिल्म के सीन से कम नहीं था.
ज़रा सोचिए, एक तरफ स्टोव अपनी पूरी लय में 'घरघराहट' कर रहा हो और बैकग्राउंड में अजीज मियां की कव्वाली गूंज रही हो. क्या गजब का तालमेल होता होगा. अजीज मियां जब अपनी मखमली आवाज़ में 'शराब' और 'साकी' की बात करते थे, तो इधर स्टोव से उठती मिट्टी के तेल की वो तीखी गंध एक अलग ही नशा घोलती थी. वह गंध अभाव की नहीं, बल्कि एक भरे-पूरे घर के 'अपनेपन' की पहचान थी.
राशन की दुकान पर लंबी कतारों में लगकर नीले रंग का केरोसिन लाना घर के बच्चों की बड़ी ज़िम्मेदारी होती थी. स्टोव पर खाना बनने में वक्त लगता था, इसलिए बातचीत के लिए बहुत समय मिलता था. आज की डिजिटल दुनिया में वो सब्र कहीं खो गया है.
आज जब मिट्टी के तेल और स्टोव की वापसी की चर्चा होती है, तो यह सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि उस सादगी भरे दौर की याद है. शायद आज की पीढ़ी को यह सिर्फ एक संघर्ष लगे, लेकिन उस शोर और धुएं में भी एक तरह का सुकून छिपा था. आखिर जिंदगी भी तो एक स्टोव ही है—जब तक उम्मीदों का 'पंप' न मारा जाए और मेहनत की 'पिन' से रुकावटें साफ न की जाएं, कामयाबी की नीली लौ नहीं जलती.
स्टोव जलाने का 'मिशन मंगल'
स्टेप 1: सबसे पहले राशन वाली नीली केन ढूंढें और कुप्पी की मदद से तेल ऐसे भरें जैसे फाइटर जेट में फ्यूल डाला जा रहा हो.
स्टेप 2: टंकी का ढक्कन और एयर वॉल्व ऐसे कसें जैसे किसी पनडुब्बी को सील कर रहे हों, क्योंकि एक 'लीक' और आपका पूरा खेल खत्म.
स्टेप 3: बर्नर के नीचे की प्याली में तेल डालकर आग लगाएं—यह स्टोव को 'वार्म अप' करने का वही तरीका है जो जिम जाने से पहले लोग स्ट्रेचिंग के लिए करते हैं.
स्टेप 4: अब आता है असली वर्कआउट! पंप को तब तक ऊपर-नीचे मारें जब तक आपकी बाजू जवाब न दे जाए और टंकी पत्थर जैसी सख्त न हो जाए.
स्टेप 5: धीरे से हवा वाला पेंच खोलें, 'सुऊऊऊ' की आवाज़ आएगी, जो संकेत है कि आपका चूल्हा अब 'टेक-ऑफ' के लिए तैयार है.
स्टेप 6: माचिस दिखाते ही नीली लौ प्रकट होगी, और अगर गलती से भौहें नहीं जलीं, तो समझिए आप एक सफल 'ऑपरेटर' बन गए.
स्टेप 7: अगर आंच धीमी हो, तो जादुई 'पिन' निकालें और बर्नर के छेद में ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक करें कि स्टोव फिर से दहाड़ने लगे.
स्टेप 8: काम हो गया हो तो हवा वाले छोटे पेंच को धीरे से खोलें ताकि 'फिस्स' की आवाज़ के साथ प्रेशर निकले और लौ बुझ जाए.
मोहित ग्रोवर