बीते 7-8 वर्षों में इंदौर को आप कैसे जानते हैं? जाहिर तौर पर जवाब होगा, 'सबसे साफ शहर' , लेकिन इस 'साफ शहर' की लापरवाही ऐसी भारी पड़ी कि इसकी कीमत 10 लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. इनमें एक जान तो इतनी नन्हीं सी थी कि उसका शव उठने में सबसे भारी था.
तस्वीरें... क्या होती हैं तस्वीरें? यादों का सहारा, बीते दौर की बातें और वर्तमान में भी रहकर भूतकाल को झांक लेने की कोशिश... अक्सर उनके साथ अच्छी और खुशनुमा यादें जुड़ी होती हैं, लेकिन कुछ तस्वीरें ऐसी भी होती हैं जिनका कैप्शन सिर्फ 'विडंबना' हो सकता है.
सोचकर देखिए... जिस इंदौर को बीते 8 वर्षों से आप 'सफाई का सिरमौर' बनाते आ रहे थे, उस शहर का दूषित-गंदा पानी 10 लोगों के लिए 'जहर' बन गया. सोचने वाली बात ये भी है कि एक समाज के तौर पर हम कितने असुरक्षित हो चुके हैं, कि अब हम अपने ही हाथों से, अपने ही घर में, अपने ही शहर में सिर्फ एक गिलास पानी पीकर मर सकते हैं. साफ शहर में मौत इतनी आसान है...
यहां उन्हीं 10 लोगों की तस्वीरे हैं जो बार-बार इस लापरवाही का गवाह बनेंगी और चीख-चीख कर पूछेंगी कि हमारी क्या गलती थी?
क्या हुआ था?
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में बीते दिनों जो हुआ, उसने इंदौर के चमकते तमगे को न सिर्फ काला कर दिया है, बल्कि यह बदनुमा दाग हमेशा के लिए शहर के दामन पर लग गया है. यहां पानी सिर्फ गंदा नहीं था, पानी जहर बन चुका था. ऐसा जहर, जिसने कई जिंदगियां लील लीं और सैकड़ों लोगों को अस्पताल के बेड तक पहुंचा दिया. जिन 10 लोगों की मौत हुई है, उनकी तस्वीरें सामने आई हैं. इसमें पहली तस्वीर है 75 साल के नंदलाल की. नंदलाल पाल की तस्वीर के बैकग्राउंड में स्वच्छ सर्वेक्षण के उजले रंगों से रंगी-पुती दीवार है, लेकिन उनके घर में जो गम का अंधेरा पसरा है, उसे कौन दूर करेगा.
कहीं मां के जाने का गम, कहीं परिवार बिखरने का दुख
भागीरथपुरा की गलियों में दूषित पानी से होने वाली मौतों के कारण कोहराम मचा हुआ है. कई घर अपनों को खोने के गम में डूबे हुए हैं. कहीं मां की मौत का मातम है, कहीं बेटी की, तो कहीं बच्चे की. सवाल सबके मन में एक ही है- आखिर हमारी गलती क्या थी? क्या सिर्फ इतना कि हमने वही पानी पिया, जो सरकार हमें पीने के लिए देती है? यह कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं है. यह कहानी लापरवाही, अनदेखी, सिस्टम की सुस्ती और जवाबदेही से बचने की कोशिशों की है. यह कहानी उन शिकायतों की है, जिन्हें महीनों तक अनसुना किया गया. यह कहानी उन लोगों की है, जिन्होंने बार-बार कहा- पानी गंदा आ रहा है, बदबू आ रही है, लेकिन किसी ने नहीं सुना.
मोहल्ले के लोगों के मुताबिक, कई दिनों से घरों में जो पानी आ रहा था, उसमें बदबू थी. रंग बदला हुआ था. कई लोगों ने पानी उबालकर पीना शुरू कर दिया, तो कई मजबूरी में वही पानी इस्तेमाल करते रहे. शिकायतें पार्षद तक पहुंचीं, विधायक तक बात गई, लेकिन हुआ कुछ नहीं. मगर ये परेशानी हल होने से पहले पानी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. इलाके में एक-एक कर लोग बीमार पड़ने लगे. उल्टी, दस्त, बुखार... शुरुआत में लोगों ने इसे सामान्य बीमारी समझा. लेकिन जब अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने लगी और मौतों की खबर आई, तो हड़कंप मच गया. इन्हीं मृतकों में एक हैं 50 साल की सीमा प्रजापत... सीमा की मौत भी गंदे पानी के कारण हुई बताई जा रही है.
मृतका सीमा प्रजापति के परिवार का भी ऐसा ही दर्द है. उनके भाई कहते हैं कि पार्षद से पानी की समस्या पर बात की थी. कहा गया था कि सुधार करेंगे, लेकिन सुधार कुछ नहीं हुआ और इसी लापरवाही की कीमत उनकी बहन की तरह कई लोगों ने जान देकर चुकाई. शुरुआती रिपोर्ट में सामने आया कि इलाके में चल रही खुदाई के दौरान ड्रेनेज लाइन फूट गई. गंदा, टॉयलेट का पानी पीने की सप्लाई लाइन में मिल गया. दूसरी आशंका यह भी जताई गई कि पानी की टंकी दूषित हो गई थी. यानि जिस पानी को लोग रोज पी रहे थे, उसी में सीवेज मिला हुआ था.
उर्मिला यादव के घर में सन्नाटा है. बहू चंद्रकला यादव की आंखें सूखी हैं, चेहरे पर दर्द है. उन्होंने कहा कि 27 तारीख से उल्टी-दस्त शुरू हुआ. अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन 28 की सुबह मां ने दम तोड़ दिया. पानी बहुत दिनों से खराब आ रहा था. नर्मदा का पानी भी गंदा आ रहा था. यह दर्द सिर्फ उर्मिला यादव के परिवार का नहीं है. यही कहानी कई घरों में दोहराई गई. उर्मिला यादव 60 साल की थीं.
बाद में लैब टेस्ट ने भी इस आशंका की पुष्टि कर दी. अधिकारियों ने बताया कि दूषित पानी के कारण डायरिया फैला और कम से कम चार मौतों की पुष्टि लैब रिपोर्ट में हुई है, जबकि कुल मौतों का आंकड़ा 10 तक पहुंच चुका है. 1,400 से ज्यादा लोग प्रभावित बताए गए हैं. मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव प्रसाद हसानी ने कहा कि भागीरथपुरा इलाके में पाइपलाइन लीकेज की वजह से पानी दूषित हुआ. एक जगह पीने की मुख्य पाइपलाइन के ऊपर ही शौचालय बना हुआ पाया गया.
अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय दुबे ने न्यूज एजेंसी को बताया, "हम भागीरथपुरा में पूरी पीने के पानी की सप्लाई पाइपलाइन की बारीकी से जांच कर रहे हैं ताकि पता चल सके कि कहीं और कोई लीकेज तो नहीं है." उन्होंने कहा कि जांच के बाद गुरुवार को भागीरथपुरा के घरों में पाइपलाइन के जरिए साफ पानी की सप्लाई की गई, हालांकि एहतियात के तौर पर लोगों को सलाह दी गई है कि वे पानी को उबालकर ही पिएं. दुबे ने कहा, "हमने इस पानी के सैंपल भी लिए हैं और उन्हें जांच के लिए भेजा है."
...और नहीं रहा छह महीने का नवजात भी
भागीरथपुरा इलाके के मराठी मोहल्ले में रहने वाली साहू फैमिली का दर्द तो और गहरा है. इसे शब्दों में तो बयां किया ही नहीं जा सकता है. यहां दूषित पानी की वजह से छह महीने के मासूम की मौत हो गई. बच्चे के परिजनों ने प्रशासन और नगर निगम पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं.
साहू परिवार का कहना है कि इलाके में लंबे समय से गंदा और बदबूदार पानी सप्लाई हो रहा था, जिसकी कई बार शिकायत की गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. इसी दूषित पानी की वजह से उनके छह माह के बेटे की जान चली गई. बच्चे को उल्टी-दस्त की शिकायत हुई थी, जिसके बाद उसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई. परिजन उसे इलाज के लिए अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं सके.
मासूम की मौत के बाद मां साधना साहू का रो-रोकर बुरा हाल है. उन्होंने कहा कि करीब दस साल की मन्नतों और दुआओं के बाद उन्हें बेटा हुआ था. प्रेग्नेंसी के दौरान भी गंभीर समस्याएं रहीं, जिस कारण करीब नौ महीने तक बेड रेस्ट पर रहना पड़ा. साधना का कहना है कि मां का दूध कम आने के कारण मजबूरी में बाहर से दूध लाकर बच्चे को पिलाना पड़ता था, जिसमें पानी मिलाया जाता था. वही पानी उनके बच्चे के लिए जानलेवा साबित हुआ.
काश! ये सब पहले हुआ होता...
भागीरथपुरा में पानी की त्रासदी से सबक लेते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पूरे राज्य के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी किया जाएगा. मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश पर अफसरों ने स्थिति का जायजा लेने के लिए भागीरथपुरा का दौरा किया.
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि गुरुवार को भागीरथपुरा में 1714 घरों के सर्वे के दौरान 8571 लोगों की जांच की गई. उनमें से 338 लोगों में उल्टी-दस्त के हल्के लक्षण दिखे, जिन्हें उनके घरों पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया. उन्होंने बताया कि बीमारी फैलने के आठ दिनों में 272 मरीजों को स्थानीय अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जिनमें से 71 को अब तक डिस्चार्ज किया जा चुका है.
NHRC ने मध्य प्रदेश सरकार को भेजा नोटिस
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस घटना का स्वतः संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है. आयोग ने इसे नागरिकों के 'मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला' करार दिया है. NHRC ने मीडिया रिपोर्ट्स का खुद संज्ञान लिया है कि दूषित पानी पीने से कई लोगों की मौत हो गई और 40 से ज्यादा लोग बीमार पड़ गए.
मेयर पुष्यमित्र भार्गव के अनुसार, शुरुआती जांच में पता चला है कि लीकेज के कारण नाले का पानी पीने के पानी की पाइपलाइन में घुस गया, जिससे भागीरथपुरा इलाके में डायरिया और उल्टी का प्रकोप फैल गया. आयोग ने कहा कि यह पीड़ितों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का एक गंभीर मामला है. इसलिए मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है.
इस घटना के बाद मौतों की संख्या को लेकर मेयर, मंत्री और अफसरों के बयान सामने आए तो सबके आंकड़े अलग थे. मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का बयान सामने आया. उन्होंने कहा कि 1400 लोग बीमार हुए, जिसमें से 200 लोग अस्पताल में भर्ती हैं. डेंजर जोन में कोई मरीज नहीं, सिर्फ एक पेशेंट वेंटीलेटर पर है. उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश है कि लोगों की जान बचाई जाए. उनकी सूची बना ली है, जिन्होंने अस्पताल में पैसे देकर इलाज कराया है, उन्हें पैसे वापस करेंगे. आधिकारिक मौत की पुष्टि 4 है, लेकिन मेरे पास 9 लोगों की मौत की जानकारी है. वहीं इंदौर के मेयर ने कहा है कि हमें जानकारी मिली है कि दूषित पानी से फैले डायरिया से अब तक दस लोगों की मौत हो चुकी है.
हालात इतने गंभीर हो गए कि स्वास्थ्य विभाग को घर-घर सर्वे करना पड़ा. 1,714 घरों के सर्वे में 8,571 लोगों की जांच की गई. 338 लोगों में उल्टी-दस्त के लक्षण मिले. 272 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया. 201 मरीज अब भी अस्पताल में हैं. 32 मरीज ICU में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं. हर अस्पताल में एक जैसी कहानी है. कमजोर शरीर, डिहाइड्रेशन, डरी हुई आंखें और बाहर खड़े परिजनों की बेचैनी. मौतों के बाद सियासत भी गर्मा गई.
विपक्षी कांग्रेस ने मोहन यादव सरकार पर हमला बोल दिया. आरोप लगाया गया कि मौतों के आंकड़ों में हेरफेर किया जा रहा है. जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक FIR नहीं हुई. कांग्रेसियों ने आरोप लगाया कि सिर्फ तीन अधिकारियों का निलंबन इस बड़ी त्रासदी के लिए काफी नहीं है.
रवीश पाल सिंह