गाजियाबाद में तीन किशोरियों ने एक हाई-राइज बिल्डिंग से गिरकर कथित तौर पर जान देने के मामले ने डिजिटल लत के उस खतरे को उजागर कर दिया है, जिसको लेकर आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में चिंता जताई गई थी. कथित तौर पर आत्महत्या के इस मामले में अभी जांच जारी है.
शुरुआती जानकारी के अनुसार, किशोरियां का बिल्डिंग से गिरने या छलांग लगाने का प्राथमिक कारण मोबाइल फोन छीनने से उत्पन्न तनाव बताया जा रहा है.
शुरुआती पुलिस जांच के अनुसार, पिता द्वारा लगभग 15 दिन पहले फोन लिए जाने से लड़कियां परेशान थीं और लड़कियों के कोरियन पॉप कल्चर (K-Pop) में गहरी रुचि होने के दावे भी सामने आ रहे हैं.
बताया जा रहा है कि कोविड महामारी के बाद से लड़कियां स्कूल नहीं जा रही थीं और आस पड़ोस के बच्चों से भी उन लोगों को संपर्क बेहद कम ही था. ये दुखद घटना आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के उन दावों की पुष्टि करती है, जिनमें डिजिटल लत के कारण सामाजिक नेटवर्क के नुकसान और मानसिक स्वास्थ्य संकट की बात कही गई थी.
क्या कहती है रिपोर्ट
आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में स्पष्ट किया गया है कि डिजिटल एडिक्शन से सामाजिक नेटवर्क कमजोर हो रहा है और लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क टूट रहा है.
रिपोर्ट के अनुसार, मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल न केवल पढ़ाई और उत्पादकता को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि स्वास्थ्य पर भी भारी बोझ डालता है. सर्वेक्षण रिपोर्ट में चेतावनी दे हुए कहा गया है कि इंटरनेट का मजबूरन इस्तेमाल (Compulsive Use) समाज को आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर बना रहा है, जिससे भविष्य में बड़े वित्तीय और स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकते हैं.
डराने वाले हैं आंकड़े
अर्न्स्ट एंड यंग की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीयों ने साल 2024 में अपने फोन पर एक ट्रिलियन से अधिक घंटे बिताए हैं. इस आंकड़े की मानें तो औसतन एक भारतीय दिन में पांच घंटे मोबाइल देख रहा है जो दुनिया में तीसरे स्थान पर है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि लोग अधिकांश अपना समय सोशल मीडिया, मनोरंजन और गेम्स पर खर्च कर रहे हैं. किशोरों में ये 'कम्पल्सिव स्क्रॉलिंग' नींद में व्यवधान, आक्रामकता और डिप्रेशन पैदा कर रही है, जैसा कि गाजियाबाद के मामले में भी संदिग्ध रूप से देखा गया है.
सख्त होते नियम
वहीं, कई देश बच्चों को डिजिटल लत से बचाने के लिए सख्त कदम उठा रहे हैं. उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब जैसे 10 प्रमुख सोशल मीडिया एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया है. नाबालिगों को केवल यूट्यूब किड्स, गूगल क्लासरूम और व्हाट्सएप जैसी सीमित प्लेटफॉर्म्स की अनुमति दी गई है.
हालांकि, ऑनलाइन गेमिंग साइटों पर फिलहाल ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, गंभीर या बार-बार उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया कंपनियों पर 32 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.
इसी तरह भारत में भी अब सिम्पलर डिवाइसों, जैसे बेसिक फोन या केवल शिक्षा के लिए बने टैबलेट के इस्तेमाल और कंटेंट फिल्टर लगाने जैसे सुझाव दिए जा रहे हैं.
डिजिटल फास्टिंग जरूरी
सर्वेक्षण सुझाव दिया गया है कि बच्चों को सुरक्षित ऑनलाइन स्पेस और मोहल्लों में यूथ क्लब उपलब्ध कराए जाने चाहिए. साथ ही मानसिक स्वास्थ्य संसाधनों तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना वक्त की मांग है.
रिपोर्ट में लोगों को सलाह दी गई है कि वे समय-समय पर 'डिजिटल फास्टिंग' यानी मोबाइल से दूरी बनाने की आदत डालें. ये छोटा-सा कदम हमें अपनी जेब में मौजूद इस सर्वव्यापी उपकरण के चंगुल से बाहर निकालने और वास्तविक दुनिया से जुड़ने में मदद कर सकता है.
aajtak.in