'रेवड़ी' की राजनीति, खाली होती तिजोरी... क्या मुफ्तखोरी के चक्कर में रुक रहा विकास का पहिया?

भारत में मुफ्त योजनाओं का पैमाना और वित्तीय भार तेजी से बढ़ रहा है, जिससे राज्यों का कर्ज और सब्सिडी बिल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. वहीं, कैश ट्रांसफर से गरीब परिवारों को लाभ भी मिला है. राजनीतिक रूप से मुफ्त योजनाएं चुनावी जीत का माध्यम बन गई हैं.

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'फ्रीबीज' पार्टियों की जीत का जरिया बन गई हैं. ( Representational image) 'फ्रीबीज' पार्टियों की जीत का जरिया बन गई हैं. ( Representational image)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 7:33 PM IST

भारत में एक पुरानी कहावत है कि 'मुफ्त की चीज सबको भाती है', लेकिन जब ये मुफ्तखोरी सरकारी खजाने पर भारी पड़ने लगे, तो ये एक गंभीर आर्थिक चिंता का विषय बन जाती है. पिछले कुछ सालों में भारत में एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई है.

हमने ये पहले भी देखा है जब सरकार कुछ मुफ्त में बांटती है, विपक्ष इसे गैर-जिम्मेदाराना बताता है. सरकार इसे कल्याणकारी योजना कहती है और कोई इस बात पर सहमत नहीं हो पाता कि सीमा रेखा कहां है. लेकिन 2022 के बाद से, 'मुफ्त योजनाओं' का पैमाना, गति और वित्तीय भार एक बिल्कुल नए स्तर पर पहुंच गया है. अब आंकड़ों का हिसाब-किताब करना जरूरी है.

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वित्तीय वर्ष 2025-26 के एक ही बजट चक्र में, भारत के 12 राज्यों ने मिलकर सिर्फ महिलाओं को बिना किसी शर्त के कैश ट्रांसफर के लिए 1,68,040 करोड़ रुपये का बजट रखा है. ये भारत की कुल जीडीपी का लगभग 0.5 प्रतिशत है, जो बिना किसी काम की शर्त, प्रशिक्षण या परिणाम की स्थिति के वितरित किया जा रहा है.

अगर हम इसमें बिजली सब्सिडी, कृषि ऋण माफी, मुफ्त अनाज और मुफ्त परिवहन को भी जोड़ दें, तो राज्यों का कुल सब्सिडी बिल 2018-19 के मुकाबले दोगुना से ज्यादा होकर लगभग 4.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.

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मुख्य आंकड़े एक नजर में:

4.7 लाख करोड़ रुपये: वित्त वर्ष 2025 में राज्यों की कुल अनुमानित सब्सिडी.

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1.68 लाख करोड़ रुपये: 12 राज्यों में सिर्फ महिलाओं पर केंद्रित नकद योजनाएं (FY26).

81 प्रतिशत: जीडीपी के अनुपात में केंद्र और राज्यों का कुल ऋण.
59.60 लाख करोड़ रुपये: राज्यों का कुल कर्ज (FY14 के 17.57 लाख करोड़ से तीन गुना ज्यादा).

दो भारत: राज्यों के बीच बढ़ती खाई

ये आंकड़े राज्यों के बीच की एक कड़वी सच्चाई को भी उजागर करते हैं. भारत के राज्य एक ही कानूनी ढांचे के तहत काम करते हैं, लेकिन उनकी वित्तीय प्राथमिकताएं बिल्कुल अलग हैं.

इसकी तुलना चौंकाने वाली है. पंजाब अपने बजटीय रुपये के हर हिस्से में से सिर्फ 5.5 पैसे पूंजी निवेश (जैसे सड़क, स्कूल बनाना) पर खर्च करता है, जो देश में सबसे कम है. इसके उलट, गुजरात 25.3 पैसे निवेश करता है. ये कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि एक दशक के दौरान किए गए वित्तीय फैसलों का नतीजा है. 

पंजाब का ऋण-GSDP अनुपात 46 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो RBI के अनुमान से दो साल पहले ही खतरे के निशान को पार कर गया है.

क्या मुफ्तखोरी निवेश को खत्म कर रही है?

आर्थिक विशेषज्ञों का सबसे गंभीर आरोप ये है कि फ्रीबीज पर होने वाला खर्च 'पूंजीगत व्यय' की जगह ले रहा है. RBI और दिसंबर 2025 की CAG रिपोर्ट ने इस पर गहरी चिंता जताई है. PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के एक अध्ययन के मुताबिक, जब राज्यों के राजस्व में कमी आती है, तो वो वेतन और पेंशन जैसे अनिवार्य खर्चों में कटौती नहीं कर पाते, बल्कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (सड़क, अस्पताल) के बजट में औसतन 19 प्रतिशत की कटौती कर देते हैं.

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11 राज्यों में तो स्थिति ये है कि ताजा उधारी का इस्तेमाल संपत्ति बनाने के बजाय रोजमर्रा के खर्चों को चलाने के लिए किया जा रहा है. इसका सीधा मतलब है कि हम अपनी भविष्य की पीढ़ियों को कर्ज की विरासत दे रहे हैं, लेकिन उन्हें बुनियादी ढांचा नहीं दे पा रहे.

सिक्के का दूसरा पहलू: कल्याण का लाभ

हालांकि, हर कैश ट्रांसफर बुरा नहीं होता. पीएम-किसान योजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसके तहत 9.35 करोड़ किसानों को सालाना 6,000 रुपये दिए जाते हैं. नीति आयोग और दूसरे वैश्विक अध्ययनों (जैसे केन्या में किया गया अध्ययन) से पता चला है कि कैश ट्रांसफर से स्थानीय अर्थव्यवस्था में तेजी आती है और गरीब परिवारों की खपत बढ़ती है.

वैश्विक स्तर पर 30 से ज्यादा कार्यक्रमों की स्टडी में ये भी पाया गया कि इस पैसे का इस्तेमाल शराब या तंबाकू पर होने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है.

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जुलाई 2022 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दलों के फ्रीबी वादों के लिए 'रेवड़ी संस्कृति' शब्द का इस्तेमाल किया था. लेकिन दो साल से भी कम समय में, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की बीजेपी सरकारों ने 'लाडली बहना' और 'लाड़की बहिन' जैसी योजनाएं शुरू कीं, जो असल में वही हैं जिनकी पीएम ने आलोचना की थी.

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परिणाम क्या रहा? बीजेपी ने दोनों राज्यों में चुनाव जीते. ये सिर्फ राजनीतिक पाखंड नहीं है, बल्कि उस चुनावी ढांचे की प्रतिक्रिया है जो वित्तीय संयम बरतने वालों को सजा देता है और मुफ्त उपहार देने वालों को इनाम देता है.

क्या है समाधान?

तथ्यों के आधार पर तीन परिणाम निकलते हैं. पहला, कर्ज के बोझ तले दबे राज्यों में वित्तीय लागत तेजी से बढ़ रही है. दूसरा, राज्यों के स्तर पर बुनियादी ढांचे में निवेश (Capex) की कमी साफ दिखाई दे रही है. तीसरा, कैश ट्रांसफर के मानवीय और मांग-पक्ष के मुनाफे भी मजबूत हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता.

(रिपोर्ट: डॉ. जवाहर सूरीशेट्टी)

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