सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद एम्स दिल्ली ने 13 साल से कोमा में चल रहे हरीश राणा के लिए पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) का प्रोसेस शुरू कर दी है. इसके लिए विशेषज्ञों की एक विशेष टीम गठित की गई है जो आने वाले दिनों में इस पूरी प्रक्रिया को संपन्न करेगी. सूत्रों के अनुसार, हरीश के मामले में पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में दो से तीन हफ्ते का वक्त लग सकता है.
भारत में पहली बार इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. सीमा मिश्रा के नेतृत्व में एक विशेष चिकित्सा दल का गठन किया गया है. इस टीम में न्यूरो सर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन तथा मनोचिकित्सा विभागों के डॉक्टर शामिल हैं.
इस टीम का मुख्य उद्देश्य मृत्यु में जल्दबाजी में करना नहीं, बल्कि जीवन रक्षक उपायों को धीरे-धीरे हटाकर प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति देना है. इसमें मरीज को पोषण सहायता और दवाओं से धीरे-धीरे दूर किया जाता है. साथ ही ये सुनिश्चित किया जाता है कि उन्हें कोई दर्द या परेशानी न हो. इसके लिए 'पैलिएटिव सीडेशन' का इस्तेमाल किया जाएगा.
पैलिएटिव केयर यूनिट में किया गया शिफ्ट
प्राप्त जानकारी के अनुसार, शनिवार को हरीश राणा को उनके गाजियाबाद स्थित आवास से एम्स के डॉ. बीआर अंबेडकर संस्थान रोटरी कैंसर अस्पताल की पैलिएटिव (शांति देने वाला) देखभाल यूनिट (पैलिएटिव केयर यूनिट) में शिफ्ट किया गया है.
वहीं, हरीश को अस्पताल ले जाने से पहले गाजियाबाद स्थित उनके घर पर एक भावुक विदाई दी गई. ब्रह्मकुमारी संस्था की सदस्य सिस्टर लवली ने हरीश के माथे पर तिलक लगाकर उन्हें शांति से सोने और सबको माफ करने का संदेश दिया.
परिवार के करीबी सदस्यों के अनुसार, पिछले 13 वर्षों के कठिन समय में आध्यात्मिकता ने ही उन्हें सहारा दिया है. माता-पिता की बढ़ती उम्र और हरीश के भविष्य की चिंता ने उन्हें इस कठिन, लेकिन आवश्यक फैसला लेने को मजबूर किया.
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिसाहिक फैसला
हरीश के पिता की याचिका पर ऐतिसाहिक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये सक्रिय इच्छा मृत्यु नहीं, बल्कि लाइफ सस्टेनिंग ट्रीटमेंट को वापस लेना है. क्योंकि मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में हरीश की स्थिति में सुधार की गुंजाइशों से इनकार कर दिया था और कहा कि इलाज जारी रखने से उनका न्यूरोलॉजिकल फंक्शन वापस नहीं आएगा.
जरूरी था फैसला
वहीं, हरीश के पिता अशोक राणा ने इस फैसले को बहुत-ही दर्दनाक, लेकिन जरूरी बताया. उनका मानना है कि ये निर्णय उन कई परिवारों के लिए एक मिसाल बनेगा, जिनके अपने इसी तरह की लाइलाज स्थिति से जूझ रहे हैं.
डॉक्टरों के अनुसार, पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ पोषण और ऑक्सीजन सपोर्ट को धीरे-धीरे कम करना है, ताकि शरीर स्वाभाविक रूप से शांत हो जाए.
दिल्ली एम्स के ऑन्को-एनेस्थीसिया, दर्द और पैलिएटिव केयर विभाग की पूर्व प्रमुख डॉ. सुषमा भटनागर का कहना है कि इस प्रक्रिया में आम तौर पर पर्याप्त दर्द निवारण सुनिश्चित करते हुए पोषण संबंधी सहायता को धीरे-धीरे रोका या बंद किया जाता है. रोगी को दर्द से राहत दिलाने के लिए उसे पैलिएटिव सेडेशन दिया जाता है. इस प्रक्रिया का उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि मरीज को कोई कष्ट न हो. अस्पताल प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां इस पूरी प्रक्रिया के दौरान गोपनीयता और मर्यादा बनाए रखने के लिए समन्वय कर रही हैं. ये मामला भारत में चिकित्सा और कानूनी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ रहा है, जहां मृत्यु के अधिकार को गरिमा के साथ जोड़ा गया है.
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