मेरा नाम अमरदीप कुमार है. हरीश राणा की 'इच्छामृत्यु' की कहानी की रिपोर्टिंग शुरू से कर रहा हूं. इस रिपोर्ट में आपको बताने जा रहा हूं कि इच्छामृत्यु की बातें सुनकर कैसा महसूस होता है. इस मामले में हरीश राणा का परिवार क्या महसूस करता रहा है. दिल्ली एम्स से लेकर श्मशान भूमि तक, हर पल कैसा महसूस होता था. आइए जानिए ये कहानी, मेरी जुबानी.
हरीश राणा की कहानी के बारे में तब लोगों को पता लगा, जब 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से 'इच्छामृत्यु' पर फैसला आया. इसके बाद हरीश राणा की कहानी हर किसी के जेहन में बैठ गई. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 14 मार्च को उन्हें एम्स लाया गया. उनके साथ पिता और परिवार परछाई की तरह थे. सबको अब लगने लगा था कि हरीश उनके बीच चंद दिनों के मेहमान हैं.
कोर्ट ने 'इच्छामृत्यु' का फैसला भले ही दे दिया हो, लेकिन हरीश राणा के दुनिया से चले जाने का एहसास पूरे परिवार को होने लगा था. हम लोग भी एम्स में हरीश के परिजनों से मिलने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अस्पताल में जो समय चल रहा था, मानो हरीश के जीवन की हर एक घड़ी घटती जा रही थी. ऐसी स्थिति में परिवार के लोग पूरा वक्त हरीश को देना चाहते थे. वे बात करने की स्थिति में नहीं थे.
एक इंसान होने के नाते मैं भी इस स्थिति को समझ सकता था. इसलिए मैंने कभी उनके परिजनों पर दबाव नहीं डाला. हरीश राणा को लेकर एम्स प्रशासन से जो भी सूचना मिलती, वही मैं भी जान पाता था. पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रही थी, इसलिए एम्स प्रशासन भी ज्यादा नहीं बोल रहा था. हरीश 13 साल से कोमा में थे. लाइफ सपोर्ट, दवाइयों और पाइप के जरिए दिए जा रहे भोजन के सहारे जिंदा थे.
24 मार्च की शाम 4:10 बजे हुई हरीश राणा की मौत
डॉक्टर उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे हटा रहे थे. पहले उनका खाना-पीना बंद किया गया, फिर दर्द से राहत देने वाली दवाइयां दी गईं. ऐसा हर रोज होता रहा, ताकि हरीश को दर्द न हो. 14 मार्च से हर रोज एम्स जाना और हरीश की तबीयत के बारे में जानना एक रूटीन बन गया था. लेकिन 24 मार्च की शाम 4:10 बजे जब डॉक्टरों ने हरीश की मृत्यु की जानकारी दी, हर किसी का दिल दहल उठा.
यहां लड़ाई भले ही 'इच्छामृत्यु' की थी, लेकिन मृत्यु के बाद का एहसास ऐसा होगा, किसी ने भी नहीं सोचा था. परिवार में मातम का माहौल देखकर हर किसी का दिल रो पड़ा. उस वक्त ख्याल आते थे कि एक परिवार अपने युवा बेटे को पढ़ने के लिए अच्छे संस्थान में भेजता है, लेकिन वहां ऐसी घटना हो जाती है कि उनका बच्चा 13 साल तक कोमा में चला जाता है. आखिर में इच्छा अनुसार उसकी मृत्यु हो जाती है.
हरीश राणा के परिवार ने पहले ही तय कर लिया था कि वे उसका अंगदान करेंगे. इसलिए जरूरी कार्रवाई की गई. पूरी प्रक्रिया के बाद हरीश के शव को एम्स के शवगृह में भेज दिया गया. 25 मार्च की सुबह 9 बजे एम्स की एंबुलेंस से हरीश के शव को ग्रीन पार्क स्थित श्मशान भूमि में लाया गया. मैं भी उस वक्त वहां मौजूद था. हरीश की मौत को एक दिन बीत चुका था, लेकिन परिवार के आंसू अभी तक सूखे नहीं थे.
श्मशान पर हरीश राणा के लिए लोगों की प्रार्थना
हरीश के शव को उठाकर एक जगह रखा गया, जहां 'विश्राम स्थल' लिखा हुआ था. उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सनातन धर्म के आधार पर हो रही थी. उसके अनुसार श्मशान भूमि के पंडित जी आए और विश्राम स्थल पर मंत्रोच्चार करने लगे. इस दौरान वहां आए सभी परिवार और रिश्तेदार हरीश के लिए प्रार्थना कर रहे थे. लेकिन रह-रहकर परिवार के लोगों की आंखों से आंसू छलक जाते थे.
महिलाएं एक-दूसरे से लिपटकर रो रही थीं. अंतिम संस्कार कर रहे भाई आशीष जोर-जोर से रो रहे थे. एक व्यक्ति की गोद में करीब 1 साल का बच्चा था, वह भी लगातार रोए जा रहा था. हरीश के पिता अशोक राणा सफेद रंग का कुर्ता पहनकर आए थे. उन्होंने मास्क भी लगा रखा था. वे खुद को संभालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनका अंदर का दर्द हर कोई महसूस कर रहा था.
हरीश राणा के 13 साल की पीड़ा का अंत हो गया
विश्राम स्थल पर मंत्रोच्चार के बाद अंतिम संस्कार शुरू हुआ. शव को कंधे पर लेकर चिता की ओर बढ़ते समय 'राम नाम सत्य है' गूंज रहा था, जो मानो चीख और शांति के बीच समन्वय स्थापित कर रहा था. चिता को चारों तरफ से लाल गुलाब की पंखुड़ियों से सजाया गया था. परिवार, पड़ोसी और रिश्तेदारों की भारी मौजूदगी थी. ब्रह्माकुमारी संस्थान के भी लोग आए थे. उनका कहना है कि शरीर नश्वर होता है.
आत्मा अमर होती है. हर कोई हरीश को आखिरी बार देख रहा था. हमें भी पता था कि कोर्ट के फैसले का अंत आज होने वाला है. परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था, लेकिन सबको इस बात का एहसास भी था कि आज हरीश के 13 साल की पीड़ा का अंत हो गया है. हरीश के छोटे भाई आशीष ने मुखाग्नि दी. बहन ने भी चिता की परिक्रमा की. कुछ देर बाद हरीश का शव पंचतत्व में विलीन हो गया.
हरीश की आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हुए सभी लोग वहां से धीरे-धीरे चले गए.
ऊं शांति शांति शांति!
अमरदीप कुमार