ईवी रामासामी नायकर (ईवीआर) के नाम की चर्चा किए बिना तमिलनाडु की राजनीति की किताब पूरी नहीं हो सकती. 1920 और 1930 के दौरान उन्होंने जिस तरह के राजनीतिक प्रयोग किए, उनकी वजह से इस दौर को भारतीय राजनीति के सबसे नाटकीय और निर्णायक दौर के रूप में देखा जाता है. ईवीआर ने सामाजिक न्याय, तर्कवाद और द्रविड़ पहचान को केंद्र में रखकर एक नई विचारधारा को जन्म दिया. इससे राजनीति में केवल वो ही मज़बूत नहीं हुए, एक नई राजनीति उठ खड़ी हुई. और ईवीआर को “वैकोम वीरर” के रूप में एक ऐतिहासिक पहचान मिली.
एक तरफ़ आज़ादी की लड़ाई, दूसरी तरफ़ सामाजिक आंदोलन. ईवीआर सीढ़ियां चढ़ते गए. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर उनकी भूमिका मजबूत हुई और 1923 में तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के सचिव तथा 1926 में उसके अध्यक्ष बने. लेकिन ईवीआर यहां ठहरने वाले नहीं थे. कांग्रेस के काम के साथ साथ उन्होंने शराबबंदी और स्वदेशी जैसे आंदोलन खड़े किए और जनआंदोलनों के लिए अपनी निजी संपत्ति तक खर्च कर दी.
लेकिन ईवीआर को पहचान मिली उस लड़ाई से जो उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा थी. वो था जाति व्यवस्था का अंत और गैरब्राह्मणों के लिए समान अवसर.इसी पॉइंट से उनका टकराव महात्मा गांधी से शुरू हुआ, क्योंकि गांधी जहां वर्ण और आश्रम व्यवस्था को एक सामाजिक ढांचे के रूप में स्वीकार करते थे, वहीं ईवीआर इसे दमन का मूल कारण मानते थे.
इसी दौरान एक घटना हुई चेरनमहादेवी गुरुकुलम में, जहां ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण बच्चों को अलग-अलग बैठाकर भोजन कराया जाता था.ईवीआर ने इसका विरोध किया और इसे सामाजिक अपमान का प्रतीक बताते हुए कांग्रेस नेतृत्व की निष्क्रियता पर सवाल उठाए.
अब टकराव खुलकर सामने था. रही सही कसर पूरी हो गई 1925 के कांचीपुरम कांग्रेस सम्मेलन-1925 में जहां उन्होंने आरक्षण को अपने प्रस्ताव का मुद्दा बनाया. उनके सामुदायिक प्रतिनिधित्व यानी Community Representation के आधार पर आरक्षण का प्रस्ताव एक बार फिर खारिज कर दिया गया.
इसी के बाद उन्होंने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया. लेकिन यह घटना दक्षिण भारत की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट बन जाएगी, ऐसा किसी ने सोचा नहीं था.
आरक्षण पर कांग्रेस से अनबन
अपनी बात पर अडिग ईवीआर ने जस्टिस पार्टी का रुख किया, जो पहले से ही गैर- ब्राह्मणों हितो की बात तो करती थी, लेकिन उसके पास राजनीतिक और जनआंदोलन वाली रणनीति नहीं थी.
1930 के दशक में ईवीआर ने इस पार्टी को नई ऊर्जा दी और इसे एक सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन में बदल दिया. 1938 में जब वे हिंदी विरोध आंदोलन के चलते जेल में थे, तब भी उन्हें पार्टी का अध्यक्ष चुना गया.
अबतक 1925 में शुरू हुआ आत्मसम्मान आंदोलन उनकी विचारधारा का मूल आधार बन चुका था. इस आंदोलन का उद्देश्य था समाज में आत्मसम्मान, समानता और तर्कवाद को स्थापित करना. उन्होंने बिना पंडित और मंत्रों के 'सेल्फ-रिस्पेक्ट विवाह' को बढ़ावा दिया.
जिसमें जाति और धार्मिक अनुष्ठानों की भूमिका समाप्त कर दी गई. उन्होंने लोगों से अपने नामों से जाति सूचक शब्द हटाने की अपील की और महिलाओं के अधिकारों, विधवा पुनर्विवाह और शिक्षा पर जोर दिया. 1929 का चेंगलपट्टू सम्मेलन इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना, जहां उन्होंने सामाजिक सुधारों के लिए एक मज़बूत एजेंडा प्रस्तुत किया.
1931-32 में ईवीआर ने यूरोप और सोवियत संघ की यात्रा की और पाया कि सोवियत समाज में धर्म का प्रभाव कम और सामाजिक समानता का बोलबाला अधिक था. उन्होंने देखा कि कैसे समाज बिना धार्मिक बंधनों के भी संगठित रह सकता है. वो इससे काफी प्रभावित हुए और इसे एक मॉडल के रूप में देखने लगे. ईवीआर अब एक अधिक कट्टर और तर्कवादी राजनीतिक बन गए.
सोवियत के बाद उन्होंने यूरोप में सामाजिक व्यवहार और स्वतंत्रता के अलग-अलग पहलुओं और तरीकों को पढ़ा-समझा. नतीजा यह रहा कि सोवियत और यूरोपीय व्यवस्थाएं एक मॉडल की तरह उनके सपनों का समाज बनती गईं और उनके भीतर भारत में चल रही सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ असहमति और विद्रोह अधिक आक्रामक होता गया.
हिंदी विरोध की राजनीति
1937 - 39 का हिंदी विरोधी आंदोलन उनके राजनीतिक जीवन का एक निर्णायक अध्याय बना. जब सी राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास प्रेसीडेंसी के स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य किया, तो ईवीआर ने इसे हिंदी के सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रयास बताते हुए व्यापक विरोध आंदोलन शुरू किया. हजारों लोग सड़कों पर उतरे, सैकड़ों गिरफ्तार हुए और खुद ईवीआर भी जेल गए. दमन की कोशिशों ने आंदोलन की आग को और बढ़ा दिया और दक्षिण भारत में भाषा और पहचान का सवाल राजनीति के केंद्र में आ खड़ा हुआ.
इस असंतोष ने द्रविड़ आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाया. ईवीआर अब इस राजनीतिक केंद्र में एक नायक की तरह खड़े थे. 13 नवंबर 1938 को मद्रास में आयोजित एक महिला सम्मेलन में उन्हें “पेरियार” की उपाधि दी गई, जिसका मतलब है- ‘महान व्यक्ति'. यह उनके सामाजिक और राजनीतिक योगदान की सार्वजनिक मान्यता थी. इसके बाद वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांतिकारी और विचारक के रूप में स्थापित हो गए. 1940 के दशक तक आते-आते उन्होंने जस्टिस पार्टी को एक नई दिशा दी और 1944 में इसे द्रविड़र कड़गम में बदलकर एक संगठित वैचारिक आंदोलन का रूप दिया.
इस पूरे दौर में ईवीआर ने जिस तरह से कांग्रेस, जस्टिस पार्टी और आत्मसम्मान आंदोलन के बीच बैलेंस बनाते हुए अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाया, वह भारतीय राजनीति में एक अनोखा उदाहरण है. आज भी उनकी विरासत दक्षिण भारत की राजनीति और समाज में गहराई से महसूस की जाती है, और “पेरियार” के रूप में उनकी पहचान एक ऐसे नेता की है, जिसने न केवल सत्ता को चुनौती दी, बल्कि समाज की जड़ों को भी बदलने का प्रयास किया.
टीआर जवाहर