दुनिया भर में मुसलमान खुशी और जोश-ओ-ख़रोश के साथ ईद-उल-फ़ितर मना रहे हैं. इस्लाम धर्म मानने वाले लोग रमज़ान महीने के दौरान सुबह से शाम तक रोज़ा रखते हैं, इबादत और बिना किसी खुदगर्जी के ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं.
यह फेस्टिवल रमज़ान के पवित्र महीने के खत्म होने का एक प्रतीक भी है.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ईद-उल-फितर को ‘मीठी ईद’ क्यों कहा जाता है?
मीठी ईद क्यों कहा जाता है?
ईद-उल-फितर यानी मीठी ईद खुशी, माफी और आभार का प्रतीक है. यह परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर रमज़ान की नेमतों यानी वरदान का जश्न मनाने का वक्त होता है. जब रमजान खत्म होता है, तो अगले दिन ईद मनाई जाती है.
इस दिन की शुरुआत मीठा खाकर की जाती है और ईद के दिन घरों में मीठे पकवान बनाए जाते हैं. लोग एक-दूसरे के घर जाकर मुलाकातें करते हैं, सेवाईयां और मीठे पकवान खाते हैं. इसलिए इस ईद को मीठी भी कहा जाता है.
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मीठी ईद के खास व्यंजन क्या हैं?
ईद-उल-फितर यानी ईद के मौके पर कई तरह की लज़ीज़ मिठाइयां बनाई जाती हैं. इनमें खास तौर से सेवइयां, शीर खुरमा (सेवइयों की खीर), खीर, शाही टुकड़ा और पारंपरिक मिठाइयां जैसे लड्डू, बर्फी और गुलाब जामुन शामिल हैं.
मुख्य पकवानों में कीमामी सेवइयां और शीर खुरमा को खास तौर से पसंद किया जाता है. कीमामी सेवइयां सूखी होती हैं और इसमें घी, मखाने, किशमिश, मेवे और इलायची जैसे मसाले डाले जाते हैं. शीर खुरमा दूध, सेवइयां, खजूर और सूखे मेवों से बनता है.
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क्या है ईद का इतिहास और अहमियत?
ईद-उल-फितर की शुरुआत पैगंबर मोहम्मद के वक्त में हुई थी, जब उन्होंने दो अहम इस्लामिक फेस्टिवल ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा की शुरुआत की थी.
ईद की शुरुआत सुबह की नमाज़ (ईद की नमाज़) से होती है, जो मस्जिदों या ईदगाहों में अदा की जाती है. इसके बाद लोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर दावत का लुत्फ लेते हैं, जिसमें खास तौर पर मीठे व्यंजन जैसे सेवइयां, खीर और मीठी डिश शामिल होते हैं.
मीठी ईद के दिन लोग एक-दूसरे को 'ईद मुबारक' कहकर गले मिलते हैं, जो प्यार और भाईचारे का प्रतीक है. इसके अलावा, लोग अपने खास लोगों के साथ वक्त बिताते हैं. यह त्योहार अल्लाह के प्रति शुक्रगुजार होने यानी आभार जताने का भी प्रतीक है. ईद-उल-फितर समाज में एकता, प्रेम, दया और दान की भावना को बढ़ावा देता है.
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