साल 2025 में, चीन में एक जमीन मालिक (Ye Yushou) ने सरकार को अपनी संपत्ति हाईवे G206 के निर्माण के लिए लेने की अनुमति नहीं दी. इसके बावजूद हाईवे का निर्माण पूरा हो गया, लेकिन उनका घर वहीं बना रहा. मजबूरन अधिकारियों को रास्ता बदलकर हाईवे को घर के चारों ओर से निकालना पड़ा. बाद में इस ढांचे को नेल हाउस के नाम से जाना जाने लगा.
अब भारत में भी नेल हाउस जैसा एक मामला सामने आया है. उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के मंडोला गांव में एक घर दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे के अहम हिस्से के निर्माण में बाधा बनने के कारण चर्चा में है. स्वाभिमान नाम का यह घर सुर्खियों में बना है. 14 अप्रैल को PM मोदी ने इस परियोजना का उद्घाटन किया, लेकिन 213 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर एक घर अब भी सर्विस रोड के बीचों-बीच खड़ा है.
यह करीब 1,600 वर्ग मीटर में फैला दो मंजिला मकान है. यहां के सिक्योरिटी गार्ड ने जानकारी दी कि इस मकान का मालिक नोएडा में रहता है.
इस मकान को लेकर 1998 से ही जमीन विवाद चल रहा है. मकान के मालिक, स्वर्गीय डॉ. वीरसेन सोराह ने उत्तर प्रदेश आवास बोर्ड द्वारा मंडोला आवास योजना के लिए अपनी जमीन के अधिग्रहण को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी.
अधिकारियों ने मंडोला आवास योजना के लिए क्षेत्र के 6 गांवों से 2,614 एकड़ जमीन के अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी की थी, जिसमें 1,100 रुपये प्रति वर्ग मीटर की पेशकश की गई थी. सोराह इस अधिसूचना से सहमत नहीं हुए और अधिक मुआवजे की मांग करते हुए अदालत में याचिका दायर की.
जमीन मालिक की मां ने बताई अपनी मांग
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस समय यह जमीन वीरसेन सोराह के पोते लक्ष्यवीर सरोह के नाम पर है. आवास योजना अधूरी रह गई थी. 2020 में, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) ने दिल्ली के अक्षरधाम से उत्तराखंड के देहरादून तक एक एक्सप्रेसवे शुरू करने का फैसला लिया. अधिकारियों को सरोहा परिवार के स्वामित्व वाली इस जमीन की जरूरत थी ताकि सर्विस रोड का निर्माण किया जा सके.
जब यह विवाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित था, तब लक्ष्यवीर ने अपने घर को गिराए जाने के खतरे का हवाला देते हुए 2024 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया और किसी भी प्रकार के विध्वंस या आगे के निर्माण पर रोक लगा दी. साथ ही, उच्च न्यायालय से मामले की सुनवाई में तेजी लाने को भी कहा.
जमीन मालिक की मां ने जानकारी दी कि हमारी मांग बिल्कुल स्पष्ट है, हमें वर्तमान बाजार दर के हिसाब से मुआवजा दिया जाए, वरना हमारी जमीन को भूल जाएं.
बता दें, 213 किलोमीटर लंबा दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे दोनों शहरों के बीच यात्रा समय को लगभग 6 घंटे से घटाकर मात्र 2 से 2.5 घंटे कर देता है. इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 12,000 से 13,000 करोड़ रुपये रही.
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