Great Nicobar Project पर कांग्रेस ने उठाए सवाल, बताया 'विनाशकारी'

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ग्रेट निकोबार परियोजना को रणनीतिक महत्व और पर्यावरणीय शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपायों का हवाला देते हुए मंजूरी दे दी है. हालांकि कांग्रेस और पर्यावरणविदों ने इसके गंभीर पारिस्थितिक प्रभावों, जैव विविधता को खतरे और आदिवासी अधिकारों पर असर को लेकर कड़ा विरोध जताया है.

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 अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का एरियल व्यू. (Photo: iStock) अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का एरियल व्यू. (Photo: iStock)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:52 PM IST

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने द ग्रेट निकोबार परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है. कोलकाता स्थित एनजीटी की ईस्टर्न जोनल बेंच ने, अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अगुवाई में, परियोजना को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए और पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने का हवाला देकर स्वीकृति प्रदान की. हालांकि, कांग्रेस और पर्यावरणविदों ने इस फैसले का तीखा विरोध करते हुए इसके गंभीर और दीर्घकालिक पारिस्थितिक दुष्प्रभावों की चेतावनी दी है. 

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उनका कहना है कि यह परियोजना जैव विविधता, तटीय पारिस्थितिकी और आदिवासी समुदायों के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकती है. मामले से जुड़ी याचिकाएं फिलहाल कलकत्ता हाई कोर्ट में लंबित हैं, जिससे विरोध करने वाले पक्षों को न्यायिक हस्तक्षेप की उम्मीद बनी हुई है. इस बीच, 70 से अधिक शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से अपील की है कि परियोजना पर पुनर्विचार किया जाए और इसके संभावित दीर्घकालिक पर्यावरणीय जोखिमों को गंभीरता से लिया जाए. 

द ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?

भारत के दक्षिणी छोर से महज 9 किमी दूर और मलक्का जलडमरूमध्य से लगभग 900 किमी की दूरी पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप पर केंद्र सरकार एक बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना पर दांव लगा रही है. इसे ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट कहा जाता है, जिसकी कुल लागत करीब 80 से 90,000 करोड़ रुपये है. इस परियोजना का औपचारिक नाम Holistic Development of Great Nicobar Island है, जिसे 2021 में नरेंद्र मोदी सरकार की कैबिनेट ने मंजूरी दी थी. यह परियोजना लगभग 166 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली होगी और इसे 30 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जाएगा.

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इसमें चार मुख्य हिस्से हैं-

  • गैलेथिया बे में अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, जो हर साल करोड़ों कंटेनर संभाल सकेगा.
  • ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट.
  • 450 मेगावाट का गैस और सोलर पावर प्लांट.
  • करीब 65 हजार लोगों के लिए टाउनशिप.

सरकार का दावा है कि यह बंदरगाह 2040 तक हर साल 30,000 करोड़ रुपये की कमाई और लगभग 50,000 नौकरियां पैदा कर सकता है.

केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने वर्ष 2023 में कहा था कि करीब 80 से 90,000 करोड़ की द ग्रेट निकोबार परियोजना को सरकार और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत 30 वर्षों में पूरा किए जाने की उम्मीद है. (Photo: NITI Aayog)

भारत इससे क्या हासिल करना चाहता है?

यह प्रोजेक्ट भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में मजबूत भूमिका दिलाने, विदेशी बंदरगाहों पर उसकी निर्भरता घटाने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का जवाब देने के लिए अहम माना जा रहा है. ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि रक्षा के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है. यह परियोजना पूर्वी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संभावित समुद्री खतरों के खिलाफ भारत की अग्रिम पंक्ति के रूप में काम कर सकती है. 

साल 2021 में भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त एडमिरल करमबीर सिंह ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा था कि अंडमान-निकोबार जैसे द्वीप भारत को व्यापक रणनीतिक पहुंच देते हैं और जरूरत पड़ने पर सैन्य अभियानों के लिए लॉन्चपैड की तरह काम कर सकते हैं. इसी कारण यहां वायु और नौसैनिक ढांचे के विकास पर जोर दिया जा रहा है.

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भारतीय नौसेना के एक अन्य सेवानिवृत्त वाइस एडमिरल बिस्वजीत दासगुप्ता ने 2024 में एक अखबार में लिखा कि यह परियोजना सुंडा, लोम्बोक और ओम्बाई-वेटार जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक चोक पॉइंट्स पर भारत की निगरानी और शक्ति-प्रदर्शन क्षमता को मजबूत करती है.

भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप से लगभग 900 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित मलक्का जलडमरूमध्य एक संकरा अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है. इस मार्ग से चीन के लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात की आवाजाही होती है. (Photo: Google Earth)

इस प्रोजेक्ट को लेकर राजनीति क्यों गरमाई?

हालांकि, इस परियोजना की सामरिक और आर्थिक संभावनाओं के बावजूद कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई पर्यावरणविदों ने स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव, आदिवासी अधिकारों को खतरा, कानूनी खामियों और निवेश जोखिमों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं.

यह द्वीप दुनिया के सबसे बायो-डायवर्सिटी और डिजास्टर-सेंसिटिव इलाकों में से एक है. यहीं पर शोम्पेन जनजाति (PVTG) रहती है, जिनकी आबादी करीब 300 है. पर्यावरणविदों और आदिवासी अधिकार समूहों को आशंका है कि परियोजना से...

  • परियोजना से घने वर्षावन और मैंग्रोव जंगलों का विनाश होगा.
  • कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों का प्राकृतिक आवास नष्ट होगा.
  • शोम्पेन और निकोबारी जैसे आदिवासी समुदायों की जीवनशैली और अधिकार प्रभावित होंगे.
  • यह क्षेत्र भूकंप और सुनामी के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील है.

कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक अखबार में लेख लिखकर इस परियोजना को 'अधूरा और गलत सोच पर आधारित' बताया था. उनके समर्थन में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा भी सामने आए थे. एनजीटी द्वारा इस प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय मंजूरी दिए जाने के बाद कांग्रेस नेताओं- जयराम रमेश और पवन खेड़ा ने फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया.

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ग्रेट निकोबार द्वीप अपनी विशिष्ट वनस्पतियों, स्थानिक (एंडेमिक) ऑर्किड और फर्न प्रजातियों के लिए जाना जाता है. इसके साथ ही गलाथिया खाड़ी में फैले मैंग्रोव वन इस द्वीप की जैव-विविधता को और भी समृद्ध बनाते हैं. (Photo: Unsplash)

जयराम रमेश ने कहा, 'नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा ग्रेट निकोबार परियोजना को मंजूरी देने का फैसला बेहद निराशाजनक है. इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि इस परियोजना से गंभीर और विनाशकारी पारिस्थितिक प्रभाव पड़ेंगे. जिन शर्तों के आधार पर एनजीटी ने मंजूरी का हवाला दिया है, वे इन दीर्घकालिक परिणामों से निपटने में नाकाफी साबित होंगी. हालांकि, यह मामला अब भी कलकत्ता हाईकोर्ट में विचाराधीन है, जो अब एकमात्र उम्मीद की किरण बना हुआ है.'

पवन खेड़ा ने कहा, 'नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने द ग्रेट निकोबार द्वीप की मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को मंजूरी दे दी है, इसका मतलब यह नहीं है कि यह परियोजना एक पर्यावरणीय आपदा नहीं साबित होगी. एनजीटी की मंजूरी मिलने से द्वीप पर होने वाले पर्यावरणीय और पारिस्थितिक नुकसान का खतरा कम नहीं हो जाता. इसके बावजूद बीजेपी इसे उपलब्धि के तौर पर पेश करेगी, जबकि सच यह है कि यह हमारी प्राकृतिक विरासत की सामूहिक क्षति का प्रतीक है. हम बेहद चिंताजनक दौर से गुजर रहे हैं. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव हर दिन और गंभीर होते जा रहे हैं. ऐसे समय में संरक्षण और पर्यावरणीय मजबूती को प्राथमिकता देने के बजाय, यह सरकार हमें अपरिवर्तनीय नुकसान और विनाश की दिशा में और आगे धकेलती नजर आ रही है.'

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एनजीटी के फैसले के बाद बीजेपी का पलटवार

वहीं, बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा कि यह परियोजना भारत की रणनीतिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है. केंद्रीय कोयला एवं खदान मंत्री जी किशन रेड्डी ने इस परियोजना का विरोध करने के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला. उन्होंने X पर एक पोस्ट में लिखा, 'अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के निर्देशों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मां-बेटे की जोड़ी लगभग 80,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को पटरी से उतारने की कोशिशों में बहुत आगे तक जाते रहे हैं.'

उन्होंने आगे कहा, 'भारत वर्तमान में ट्रांसशिपमेंट के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर है. ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना का उद्देश्य एक इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, इंटरनेशनल एयरपोर्ट, पावर प्लांट और टाउनशिप का निर्माण करना है. साथ ही मलक्का जलडमरूमध्य के पास अपनी रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर भारत इसे अपना एक प्रमुख हब बनाना चाहता है. यह प्रस्तावित हब पूर्व-पश्चिम शिपिंग मार्गों पर चलने वाले कार्गो की जरूरतों को पूरा करेगा.'

भारत ने निकोबार द्वीपसमूह में रणनीतिक सैन्य क्षमताओं को तेजी से मजबूत किया है. इसके तहत कैंपबेल बे स्थित आईएनएस बाज (INS Baaz) के रनवे का विस्तार भी किया गया है. (Photo: Indian Navy)

जी किशन रेड्डी ने लिखा, 'परियोजना को और बाधित करने, इसके खिलाफ अभियान चलाने के लिए सोनिया गांधी ने एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर एक लेख भी लिखा. इसके बावजूद अब एनजीटी ने ग्रेट निकोबार आइलैंड परियोजना को मंजूरी दे दी है. यह भारत सरकार की एक रणनीतिक पहल है और एनजीटी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि 2022 में दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है. एनजीटी ने यह भी माना कि स्वीकृति की शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं.'

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उन्होंने अंत में कहा, 'इसके साथ ही सोनिया गांधी-राहुल गांधी की जोड़ी की एक और कोशिश पूरी तरह विफल हो गई. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण के लिए अपना जीवन समर्पित किए हुए हैं, तब कुछ लोग भारत की विकास यात्रा में बाधाएं डालने में लगे हैं. लेकिन भारत और उसके उत्थान का विरोध करने वालों की मंशाएं कभी पूरी नहीं होंगी और वे लगातार असफल होते रहेंगे.'
 

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