मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर एक बार फिर चर्चा में है. बीते हफ्ते हाईकोर्ट ने इस परिसर को मंदिर माना था. इसके बाद आज पहला शुक्रवार है, जब भोजशाला में वाग्देवी की पूजा और आरती की जा रही है. कोर्ट के आदेश के मुताबिक ही अब यहां पर नमाज नहीं पढ़ी जाएगी.
जबकि इस स्थल पर बीते लगभग 700 वर्षों से मुस्लिम समुदाय भी अपना हक जताता रहा है. हालांकि यहां पर वाग्देवी के प्राचीन मंदिर होने के सबूत उससे भी पुराने समय से रहे हैं और ASI के सर्वे में यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आई थी कि धार का भोजशाला परिसर एक प्राचीन मंदिर है.
आखिर 721 साल पहले ऐसा क्या हुआ?
सवाल उठता है कि आखिर 721 साल पहले ऐसा क्या हुआ था और कैसे एक मंदिर परंपरा के स्थल का ढांचा बदल गया था? हिंदू पक्ष इसे मां वाग्देवी यानी सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र मानता है, तो दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता रहा है.
क्या है भोजशाला का विवाद?
अगर वक्त में पीछे की ओर जाएं तो पाएंगे कि भोजशाला का इतिहास कई परतों में फैला हुआ है. जैन ग्रंथ प्रबंध चिंतामणि में दर्ज है कि प्रसिद्ध परमार शासक राजा भोज ने 1034 ईस्वी में मध्यप्रदेश के धार में देवी सरस्वती की पूजा के लिए भोजशाला मंदिर बनवाया. यह मंदिर हिंदू दर्शन और संस्कृत भाषा का प्रमुख केंद्र था.
यह स्थल इसके साथ ही यह एक बड़ा और प्रसिद्ध आवासीय विश्वविद्यालय परिसर भी रहा है. यहां लगभग 1400 महान विद्वान, कवि और धर्मशास्त्री रहे और अध्ययन किए हैं. बाणभट्ट, भवभूति, मानतुंग, भास्कर भट्ट और धनपाल से होते हुए यह कड़ी प्राचीन काल में माघ और कालिदास के साथ भी जुड़ती रही है. ये कवि मालवा शासन के संरक्षण में रहे थे.
धार प्राचीन मालवा की राजधानी हुआ करता था. यहां शिक्षा, संस्कृति और धार्मिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र विकसित हुआ. लेकिन 13वीं और 14वीं शताब्दी आते-आते मालवा की राजनीतिक स्थिति बदलने लगी. लगातार युद्धों, हमलों और सत्ता संघर्षों के बीच धार पर कई बार हमले और और इसी दौर में दिल्ली सल्तनत का प्रभाव मालवा तक पहुंचा.
14वीं सदी तक मालवा पर हो चुका था दिल्ली सल्तनत का अधिकार
दिल्ली सल्तनत के प्रसिद्ध दरबारी कवि और इतिहासकार अमीर खुसरो के लिखे दस्तावेज 'तारीख-ए-अलाई' में अलाउद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों (गुजरात, मालवा, चित्तौड़ आदि) का जिक्र मिलता है. इसकी मानें तो 1305 ईस्वी में मालवा पर दिल्ली सल्तनत का नियंत्रण स्थापित हुआ. अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी ने धार और आसपास के इलाकों पर कब्जा कर लिया. इसके बाद मालवा में इस्लामी शासन की प्रशासनिक और धार्मिक संरचनाएं विकसित होने लगीं.
13वीं सदी के आखिर में यहां आए सूफी संत कमाल मालवी
इतिहासकार मानते हैं कि इसी दौर में भोजशाला परिसर के कुछ हिस्सों का उपयोग मस्जिदनुमा परिसर के रूप में शुरू हुआ. यही वो वक्त था जब चिश्तिया परंपरा के सूफी संत कमाल अल-दीन चिश्ती मालवा आए थे और यहीं रह गए थे. कमाल अल-दीन चिश्ती को कमाल मालवी भी कहा जाता है.
वे सूफी संत फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर के वंशज और हजरत निजामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे. लगभग 1331 ईस्वी में उनका निधन बताया जाता है और इसके बाद ही भोजशाला परिसर से बिल्कुल पास ही उनकी दरगाह बनाई गई, जो आगे चलकर कमाल मौला दरगाह के नाम से जानी गई.
कमाल अल-दीन की दरगाह धार्मिक आस्था का केंद्र बन गई. इसके साथ ही परिसर के एक हिस्से में नमाज पढ़े जाने की शुरुआत हो गई. दिल्ली सल्तनत और बाद के मुस्लिम शासकों के समय कई पुराने मंदिरों और शैक्षणिक परिसरों के हिस्सों को मस्जिदों या प्रशासनिक इमारतों के रूप में काम में लाया गया. भोजशाला परिसर में भी इसकी शुरुआत होने लगी थी.
यहां मौजूद है अरबी-फारसी शिलालेख
14वीं और 15वीं शताब्दी में इस परिसर में कई निर्माण कार्य हुए. कमाल मौला दरगाह के चारों ओर दीवार बनाई गई और एक भव्य प्रवेशद्वार भी तैयार किया गया. फारसी शिलालेखों में इसका उल्लेख मिलता है कि यहां यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी. दरगाह का स्थापत्य तुगलक और मालवा सल्तनत काल की शैली को दर्शाता है. यहां मौजूद एक लंबा अरबी-फारसी शिलालेख भारत के सबसे बड़े तुगलककालीन शिलालेखों में गिना जाता है.
समय बीतने के साथ यह परिसर दो धार्मिक परंपराओं का केंद्र बन गया. हिंदू पक्ष इसे भोजशाला और मां वाग्देवी मंदिर कहता रहा, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में मान्यता देता रहा. मध्यकालीन रिकॉर्ड और बाद के ब्रिटिश दस्तावेजों में यहां नमाज पढ़े जाने और हिंदू धार्मिक गतिविधियों दोनों के उल्लेख मिलते हैं.
ब्रिटिश शासन में हुआ पुरातात्विक सर्वे
ब्रिटिश शासन के दौरान 19वीं सदी में इस स्थल का पुरातात्विक सर्वे हुआ. अंग्रेज अधिकारियों और इतिहासकारों ने यहां बड़ी संख्या में हिंदू और जैन स्थापत्य अवशेषों का जिक्र किया. इसी दौरान यह विवाद औपचारिक रूप से रिकॉर्ड में आने लगा कि यह मूल रूप से मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र था या मस्जिद.
1902 में ब्रिटिश प्रशासन ने दोनों समुदायों के बीच एक व्यवस्था लागू की. इसके तहत हिंदू और मुस्लिम समुदाय को अलग-अलग समय पर पूजा और नमाज की अनुमति दी गई. स्वतंत्र भारत में भी लंबे समय तक यही व्यवस्था जारी रही. बाद में प्रशासनिक आदेशों के तहत मंगलवार को हिंदू पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम नमाज की परंपरा लागू की गई.
बीते हफ्ते मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भोजशाला को प्राचीन संस्कृत अध्ययन केंद्र और वाग्देवी मंदिर परंपरा से जुड़ा माना. अदालत ने ASI की वैज्ञानिक रिपोर्टों का हवाला देते हुए कई ऐतिहासिक तथ्यों को स्वीकार किया. साथ ही मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक व्यवस्था के लिए सरकार से संपर्क करने की बात भी कही गई. इसके बाद आज शुक्रवार को भोजशाला परिसर में वाग्देवी की पूजा और महाआरती का आयोजन किया जा रहा है.
विकास पोरवाल