12 साल जेल काटने के बाद गैंगरेप का आरोपी बाइज्जत बरी, मुंबई के कोर्ट का बड़ा फैसला

मुंबई की दिंडोशी कोर्ट ने नाबालिग से गैंगरेप के आरोपी को 12 साल बाद बरी किया. कोर्ट ने FIR में देरी और मेडिकल साक्ष्यों की कमी को आधार माना. जानें क्यों फेल हुआ पुलिस का केस...

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पॉक्सो केस में 12 साल बाद न्याय.(Photo: Representational) पॉक्सो केस में 12 साल बाद न्याय.(Photo: Representational)

विद्या

  • मुंबई,
  • 26 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:29 PM IST

मुंबई की दिंडोशी सेशंस कोर्ट ने 12 साल पुराने गैंगरेप और POCSO एक्ट के एक मामले में 35 साल के शख्स को बाइज्जत बरी कर दिया. यह शख्स पिछले एक दशक से अधिक समय से जेल की सलाखों के पीछे था. कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस की जांच और पीड़िता के बयानों में मौजूद गंभीर खामियों को आधार बनाया है.
 
यह केस 2 नवंबर 2014 को एक विधवा महिला ने दर्ज कराया था, जिसकी तीन बेटियां और एक बेटा है. उसकी 11 साल की बेटी ने घटना से करीब एक महीने पहले अपने प्राइवेट पार्ट्स में दर्द होने की शिकायत की थी. लेकिन चूंकि उसे कुछ ही महीने पहले पीरियड्स आने शुरू हुए थे, इसलिए उसकी मां ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

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वह विधवा महिला दिन का ज्यादातर समय काम पर बिताती थी, लेकिन उस साल 31 अक्टूबर को वह जल्दी घर लौट आई और देखा कि उसकी बेटी गायब है. उसे अपनी बेटी आरोपी के घर पर कुछ और लोगों के साथ मिली. जब उसने अपनी बेटी का भरोसा जीता, तो लड़की ने उसे बताया कि पड़ोसी और कुछ अन्य लोग उसे अश्लील वीडियो दिखाते थे और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाते थे, साथ ही उसे किसी को भी इस बारे में न बताने की धमकी देते थे.

इसके बाद, मुंबई के पश्चिमी उपनगर में स्थित दहिसर पुलिस स्टेशन में यह केस दर्ज किया गया. कोर्ट में आरोपी ने खुद को बेकसूर बताया, जिसके बाद पड़ोसी के खिलाफ पूरी तरह से ट्रायल शुरू हुआ. आरोपी ने कोर्ट में कहा कि उसे इस केस में झूठा फंसाया गया है.

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कोर्ट ने क्यों किया बरी?

कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बयानों में गंभीर विसंगतियां थीं, जिन्हें पुलिस और मजिस्ट्रेट ने रिकॉर्ड किया था. पीड़िता की सही उम्र भी रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई थी. 

कोर्ट ने यह भी पाया कि विधवा महिला ने अपने पड़ोसियों की सलाह पर FIR दर्ज कराई थी, जबकि FIR दर्ज कराने में हुई देरी का कोई भी उचित कारण नहीं बताया गया था. FIR का तुरंत दर्ज होना, किसी घटना के घटित होने और उसकी सत्यता का एक संकेत है. 

इसके विपरीत, यदि FIR दर्ज करने में अत्यधिक और बिना किसी स्पष्टीकरण के देरी होती है, तो यह निष्कर्ष निकालने की पूरी गुंजाइश रहती है कि उक्त FIR शायद बाद में सोच-समझकर दर्ज कराई गई हो.

अदालत ने आगे कहा, "FIR दर्ज करने में अत्यधिक और बिना किसी स्पष्टीकरण के देरी हुई है. अभियोजन पक्ष की ओर से रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया गया है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी और सह-आरोपियों ने किसे जान से मारने की धमकी दी थी और पीड़ित लड़की ने एक महीने की अवधि के दौरान इस घटना के बारे में किसी को क्यों नहीं बताया."

इसके अलावा, इस मामले में आरोप यह था कि आरोपियों ने पीड़ित लड़की को मोबाइल पर अश्लील वीडियो दिखाए थे; हालांकि, इस दावे के समर्थन में मोबाइल की रिपोर्ट पेश नहीं की गई है.

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हाइमन इंजरी पर कोर्ट का बड़ा फैसला

मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के हाइमन (Hymen) में चोट के निशान पाए गए थे. इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि "सिर्फ हाइमन में चोट के आधार पर यह साबित नहीं किया जा सकता कि शारीरिक संबंध बनाए गए थे." ऐसे आरोपों की पुष्टि के लिए अन्य सहायक और विश्वसनीय सबूतों का होना अनिवार्य है.

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