महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा और टैक्सी ड्राइवर्स का मराठी एग्जाम कराने के फैसले पर सियासत शुरू

महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने घोषणा की है कि 1 मई से ऑटो चालकों के लिए मराठी बोलना अनिवार्य होगा. वहीं अब शिवसेना नेता संजय निरुपम ने सरकार से इस फैसले पर फिर से विचार करने की अपील की है.

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संजय निरुपम ने कहा-ऑटो और टैक्सी चालकों को टूटी-फूटी और कामचलाऊ मराठी बोलने की अनुमति दी जानी चाहिए. (Photo: ITG) संजय निरुपम ने कहा-ऑटो और टैक्सी चालकों को टूटी-फूटी और कामचलाऊ मराठी बोलने की अनुमति दी जानी चाहिए. (Photo: ITG)

ऋत्विक भालेकर

  • मुंबई,
  • 24 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 3:13 PM IST

महाराष्ट्र में परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक की एक घोषणा से राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है. 1 मई से सभी लाइसेंसधारी ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किया गया है. इस फैसले के तहत ड्राइवरों को राज्य के 59 क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों (RTO) में जांच के दौरान मराठी पढ़ना और लिखना आना चाहिए, नहीं तो उनका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है.

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इस घोषणा पर विपक्षी दलों, यूनियनों और कई राजनीतिक संगठनों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, जिससे यह मुद्दा पहचान, शासन और रोजगार से जुड़ी बहस में बदल गया है.

महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि मराठी भाषा का सम्मान जरूरी है, लेकिन इसके आधार पर लाइसेंस रद्द करना एक अत्यधिक कठोर कदम है. उन्होंने आरोप लगाया कि यह फैसला राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक विभाजन को और गहरा कर सकता है.

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता संदीप देशपांडे ने भी इस घोषणा के समय पर सवाल उठाते हुए इसे सरकार की अचानक जागृति करार दिया. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर यह सुनिश्चित करेगी कि इस नीति को सार्थक रूप से लागू किया जाए और यह केवल प्रतीकात्मक कदम बनकर न रह जाए.

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इस बीच शिवसेना नेता संजय निरुपम ने भी महाराष्ट्र सरकार से इस फैसले पर फिर से विचार करने और टूटी-फूटी या कामचलाऊ मराठी बोलने वालों को छूट देने की अपील की है.

परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक को लिखे एक पत्र में निरुपम ने कहा कि प्यार से सिखाई जाने वाली भाषा जीवित रहती है, जबकि जबरदस्ती थोपी जाने वाली भाषा केवल डर पैदा करती है.

उन्होंने अपने पार्टी सहयोगी सरनाईक को कहा, "मराठी भाषा के प्रति सम्मान बनाए हुए, ऑटो और टैक्सी चालकों को टूटी-फूटी और कामचलाऊ मराठी बोलने की अनुमति दी जानी चाहिए. सरकार को मराठी ज्ञान अनिवार्य बनाने और परीक्षा लेने के फैसले पर फिर से विचार करना चाहिए."

निरुपम ने तर्क दिया कि जिन ड्राइवरों की मातृभाषा मराठी नहीं है, उनके लिए परीक्षा थोपना उनके रोजगार पर असर डाल सकता है.

निरुपम ने आगे कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि मराठी भाषा के प्रति सम्मान, उस पर गर्व और उसका संरक्षण हम सभी के दिलों में गहराई से बसा हुआ है. हालांकि, भाषा के प्रति प्रेम पर कठोर नियम थोपना और इसके लिए परीक्षा अनिवार्य करना हजारों मेहनती ऑटो रिक्शा चालकों के जीवन के लिए नुकसान देने वाला साबित हो सकता है.”

1 मई से मराठी बोलना अनिवार्य

इस महीने की शुरुआत में, सरनाईक ने घोषणा की, 1 मई से ऑटो चालकों के लिए मराठी बोलना अनिवार्य होगा और महाराष्ट्र के सभी 59 क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) इस नियम को लागू करने के लिए एक विशेष अभियान चलाएंगे.

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इस फैसले से नाराज होकर, ऑटो रिक्शा चालकों का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ ट्रेड यूनियनों ने 4 मई से स्टेट-वाइ़ड आंदोलन शुरू करने की धमकी दी है. 

मुंबई जैसे मल्टीकल्चरल महानगर में, 70 प्रतिशत से अधिक ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालक गुजरात, उत्तर भारत, पंजाब और दक्षिण भारत के विभिन्न हिस्सों से आते हैं. शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कहा कि उन्होंने कड़ी मेहनत के दम पर शहर में अपनी जगह बनाई है और अपने परिवारों का पालन-पोषण कर रहे हैं, साथ ही मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

निरुपम ने कहा कि ऐसे समय में यह फैसला उनके रोजगार पर लटकती तलवार के समान है. ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के दिलों में डर और असंतोष बढ़ रहा है.

(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

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