महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम रहे अजित पवार को गुरुवार को बारामती में अंतिम विदाई दे दी गई. दादा को अंतिम संस्कार देने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे समेत तमाम बड़ी राजनीतिक हस्तियों ने पहुंचकर उन्हें श्रदांजलि दी. छह बार डिप्टी सीएम रहे अजित दादा के चले जाने से पवार परिवार ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र की राजनीतिक को भी गहरा झटका लगा है.
अजित पवार का निधन से सिर्फ एनसीपी के सियासी भविष्य का सवाल नहीं है बल्कि महाराष्ट्र की सियासत ही 360 डिग्री घूम गई है. डिप्टी सीएम पद ही नहीं बल्कि वित्त मंत्री पद से लेकर महाराष्ट्र की मराठा राजनीति, चीनी लॉबी और कॉपरेटिव पॉलिटिक्स पर सियासी प्रभाव पड़ेगा.
महाराष्ट्र की सियासत के अजित पवार राजनीतिक धुरी थे, जिनके सहारे बीजेपी महायुति के सियासी पावर का बैलेंस बनाकर चल रही थी. लेकिन, अब गठबंधन की सियासत में उसे सिर्फ ताकतवर अजित पवार की तलाश नहीं करनी बल्कि उनके जाने से महाराष्ट्र की राजनीति में पैदा हुए 'शून्य' को भी भरने की चुनौती खड़ी हो गई?
किसके हाथ में होगी NCP की कमान
अजित पवार के निधन के बाद सभी के मन में सवाल है कि एनसीपी का क्या होगा? एनसीपी की कमान कौन संभालेगा, क्या एनसीपी के दोनों गुट फिर से एकजुट हो जाएगा या एनसीपी टूटकर बिखर जाएगी. शरद पवार से अलग होने के बाद से एनसीपी की बागडोर अजित पवार के हाथों थी और पार्टी में नंबर दो की पॉजिशन पर प्रफुल्ल पटेल काबिज रहे. प्रफुल्ल पटेल एनसीपी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं.
अजित पवार के उत्तराधिकारी की अब जब तक तलाश हो जाती है, तब तक पार्टी की के कमान प्रफुल्ल पटेल के पास रहने वाली है. प्रफुल्ल पटेल एनसीपी के पुराने और अनुभवी नेता हैं, वह मास लीडर नहीं हैं. सुनील तटकरे महाराष्ट्र एनसीपी के अध्यक्ष हैं. उनका कोंकण में मजबूत बेस है और संगठन संभालने में वह अच्छे हैं. लेकिन पूरे राज्य में उनका प्रभाव कम ही है, ऐसे छगन भुजबल और धनंजय मुंडे ओबीसी नेता हैं. दोनों राज्य में लोकप्रिय हैं, लेकिन वे विवादों में रहे.
अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार राज्यसभा सदस्य हैं और बेटे पार्थ पवार 2019 में लोकसभा चुनाव लड़े थे, लेकिन जीत नहीं सके. अजित पवार ने अपनी पत्नि और बेटे को अपने सियासी वारिस के तौर पर जरूर राजनीति में लाए थे, लेकिन उनके पास राजनीतिक अनुभव बहुत ज्यादा नहीं है और उनका मजबूत बेस भी नहीं. ऐसे में पवार परिवार क्या फिर से एकजुट हो जाएगा और शरद पवार के नेतृत्व में पूरी एकजुट हो पाएगी. अजित पवार के रहते हुए पवार परिवार के रिश्तों पर बीच जमी बर्फ पिघलने लगे थे. निकाय चुनाव में एनसीपी के दोनों धड़ मिलकर चुनाव लड़े थे. ऐसे में देखना होगा कि एनसीपी के कमान किसके मिलती है?
महाराष्ट्र का वित्त मंत्री कौन होगा
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के बाद सरकार के सामने न केवल राजनीतिक बल्कि प्रशासनिक स्तर पर चुनौती खड़ी हो गई है. अजित पवार का निधन ऐसे समय में हुआ है, जब बजट सत्र नजदीक है. अजित पवार लंबे समय से वित्त मंत्रालय संभाल रहे थे. अब निधन के बाद सवाल यही है कि वित्त मंत्री कौन बनेगा.
राज्य में बजट सत्र 23 फरवरी से शुरू हो रहा है और मार्च के पहले सप्ताह में बजट पेश होना है. ऐसे में अजित पवार की जगह नए वित्त मंत्री को बजट पेश करना होगा. अजित पवार इस बार अपना 12वां राज्य बजट पेश करने वाले थे. ऐसा कर पाते तो महाराष्ट्र में सबसे अधिक बजट प्रस्तुत करने वाले वो दूसरे वित्त मंत्री बन जाते. अब देखना होगा कि वित्त मंत्री का पद महायुति में एनसीपी के पास रहेगी या फिर किसी सहयोगी दल के पास चला जाएगा. राज्य में वित्त विभाग को पावरफुल माना जाता है.
मराठा राजनीति का क्या होगा?
महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा वोटर काफी निर्णायक माने जाते हैं, लेकिन मराठी सियासत में अजित पवार एक बड़े चेहरे थे. अजित पवार के निधन हो जाने से पूरी तरह मराठा राजनीति में शून्य पैदा हो गया है. मराठा राजनीतिक कई गुटों में बिखरी है, लेकिन उसका चेहरा अभी भी पवार परिवार ही है.पृथ्वीराज चव्हाण और दिवंगत विलासराव देशमुख से जुड़े नेता अब भी कांग्रेस के साथ हैं.
वहीं, पूर्व सीएम अशोक चव्हाण गुट और पद्मसिंह पाटील गुट बीजेपी के साथ से जुड़े हैं, लेकिन मराठा सियासत पर उनकी पकड़ कमजोर हुई है. इसीलिए अशोक चव्हाण अपना सियासी दुर्ग को बचाए नहीं रख सके. हालांकि, अजित पवार की पत्नि सुनेत्रा पवार का ताल्लुक पद्मसिंह पाटील घराने से है. इसके चलते ही अजित पवार बीजेपी में आए थे.
अजित पवार के चलते मराठा आंदोलन मुखर नहीं हो पा रहा था. लेकिन अब वह जोर पकड़ सकता है. सीएम फडणवीस ब्राह्मण समुदाय से आते हैं. ऐसे में ब्राह्मण और मराठा के बीच सियासी तालमेल बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे मराठी अस्मिता का दांव लगातार खेल रहे हैं.
कॉपरेटिव पॉलिटिक्स पर होगा संग्राम
महाराष्ट्र की सियासत में सहकारिया और चीनी मीलें मराठा समुदाय के राजनीति केंद्र में रही है. ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सहकारी समितियों का मजबूत जाल, जैसे कि मार्केटिंग फेडरेशन, सीधे कृषि क्षेत्र को प्रभावित करता है. इन सहकारी संस्थाओं (बैंक, सोसाइटी) के माध्यम से नेता अपने क्षेत्र में राजनीतिक पैठ और समर्थकों का आधार बनाते हैं. राज्य में 2 लाख से अधिक समितियां लगभग 7 करोड़ सदस्यों को प्रभावित करती हैं.
सहकारी आंदोलन में अधिकांश नेतृत्व मराठा समुदाय के पास रहा है, जो राज्य के कुल राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करता है. अजित पवार ने अपनी सियासी पारी का आगाज कॉपरेटिव पॉलिटिक्स से शुरू किया है और शरद पवार की सियासी ताकत की जड़े इन्हीं समितियों में रही है. चाचा-भतीजे की जोड़ी ने मिलकर सूबे में कांग्रेस की राजनीति को सहकारिता पर कब्जा जमाकर खत्म किया था.
अजित पवार जैसे नेता के नहीं रहने से शरद पवार फिर से अपने पैर जमा सकते हैं, पर उनकी उम्र बाधा बन सकती है. हालांकि, बीजेपी की नजर सहकारिता क्षेत्र पर है. बीजेपी कॉपरेटिव पॉलिटिक्स के जरिए पश्चिम महाराष्ट्र में अपनी सियासी जड़े जमा सकती है. ऐसे में बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस से लेकर एकनाथ शिंदे तक एक्टिव हो सकते हैं.
चीनी मील लॉबी का क्या होगा?
महाराष्ट्र में चीनी मिलों, दुग्ध संघों और सहकारी बैंकों पर नियंत्रण के जरिए कांग्रेस और एनसीपी जैसे दल दशकों से ग्रामीण वोटबैंक (विशेषकर मराठा समुदाय) को मजबूत करते आए हैं. चीनी मिल लॉबी राज्य की राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक अत्यंत प्रभावशाली हिस्सा है, जिसमें 199 से अधिक सहकारी और निजी मिलें संचालित हैं, जो मुख्य रूप से सोलापुर, अहमदनगर और नांदेड़ जैसे क्षेत्रों में केंद्रित हैं. यह उद्योग न केवल गन्ना किसानों की आय से जुड़ा है, बल्कि क्षेत्रीय नेताओं के लिए राजनीतिक शक्ति का आधार भी रहा है.
सहकारी चीनी मिलें स्थानीय राजनेताओं के लिए सत्ता की सीढ़ी रही हैं, जो किसानों को अपने पक्ष में रखने का साधन है. शरद पवार को परंपरागत रूप से इस लॉबी का एक बड़ा रक्षक माना जाता रहा है, लेकिन उसे अजित पवार ने पहले सेंध लगाई और पिछले कुछ वर्षों से अमित शाह के नेतृत्व में केंद्र सरकार का इस क्षेत्र पर नियंत्रण बढ़ा है.
महाराष्ट्र में चीनी मील सोलापुर में 45, अहमदनगर में 26 और नांदेड़ में 29 मिलें हैं, सबसे प्रमुख गन्ना पेराई क्षेत्र हैं, जहां सहकारी और निजी मिलें दोनों कार्यरत हैं.राज्य में सहकारी 98 और निजी 101 मिलों की संख्या लगभग बराबर है, जो इस क्षेत्र में बढ़ते निजी निवेश को दर्शाता है. राज्य में गन्ना की खेती और चीन मील किसानों की रीड माने जाते हैं. चीनी मील लॉबी राज्य की सत्ता बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. ऐसे में अजित पवार के न होने के बाद चीनी मील लॉबी के बीच सियासी संग्राम छिड़ सकता है.
कौन होगा अब नया डिप्टी सीएम ?
महाराष्ट्र में 2023 से 'ट्रिपल इंजन' सरकार चल रही थी. अजित पवार के रूप में महायुति का एक इंजन पटरी से उतर गया है. अजित पवार गुट के 41 विधायक हैं,जबकि एकनाथ शिंदे के 57 और बीजेपी के 132 विधायक, बहुमत का आंकड़ा 145 का है. ऐसे में अजित दादा के चले जाने का सियासी असर फडणवीस की सरकार पर नहीं पड़ेगा, लेकिन अब सवाल यही है कि अजित पवार की जगह कौन तीसरा डिप्टी सीएम होगा.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस महायुति में सियासी बैलेंस बनाए रखने के लिए शिंदे और अजित पवार को डिप्टी सीएम बना रखा था, लेकिन अब अजित दादा का निधन हो चुका है. इस तरह एनसीपी कोटे से डिप्टी सीएम की कुर्सी खाली हो गई है. ऐसे में अजित गुट इस पद का दावेदार अवश्य बना रहेगा. एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल से लेकर छगन भुजबल जैसे दिग्गज नेता हैं, जो डिप्टी सीएम की कुर्सी पर दांव ठोक सकते हैं. इससे पार्टी में सियासी गुटबाजी बढ़ सकती है. अब देखना होगा कि डिप्टी सीएम की कुर्सी किसे मिलती है?
कुबूल अहमद