'हथियार नहीं, मुख्यधारा ही रास्ता...', 43 सालों तक जंगल में रहे पूर्व माओवादी नेता का युवाओं को संदेश

सेंट्रल इंडिया के पूर्व माओवादी नेता भूपति ने लगभग 40 सालों के हथियारबंद संघर्ष के बाद 15 अक्टूबर 2025 को गढ़चिरोली में 60 साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का ऐतिहासिक फैसला किया. 70 साल भूपति ने कहा कि देश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों में सशस्त्र क्रांति अब व्यावहारिक नहीं रही. उन्होंने बताया कि संगठन 2013 के बाद जनता से कट चुका था, जिससे अंत की शुरुआत हुई.

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साथियों की मौत से भूपति का टूटा हौसला (Photo: Representational) साथियों की मौत से भूपति का टूटा हौसला (Photo: Representational)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:17 PM IST

सेंट्रल इंडिया के माओवादी आंदोलन के पूर्व नेता मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति ने करीब चार दशक तक चलाए गए हथियारबंद संघर्ष को छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का ऐतिहासिक फैसला किया पिछले साल 15 अक्टूबर 2025 को किया था. गढ़चिरोली में भूपति ने 60 माओवादी कैडरों के साथ आत्मसमर्पण किया था. गढ़चिरोली में उनके खिलाफ 70 से अधिक मामले दर्ज थे, जो उनकी आंदोलन में एक्टिव रोल को दर्शाते हैं.

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70 साल के भूपति ने अपनी कई सालों की संघर्ष भरी जिंदगी का एक्सपीरियंस शेयर करते हुए कहा कि अपने साथियों को एक-एक कर मरते देखना बहुत ही दुखद था. नवंबर 2024 में उन्होंने माओवादी संगठन के टॉप लीडरशिप से साफ कहा था कि मौजूदा परिस्थितियों में हथियारबंद संघर्ष अब प्रैक्टिकल नहीं रह गया है. उनका मानना है कि देश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक स्थिति में हथियारबंद संघर्ष का रास्ता अब बंद हो चुका है.

भूपति ने बताया कि उन्होंने 43 साल जंगलों में बिताए और 15 सालों बाद पहली बार बिजली देखी. उन्होंने साफ किया कि उनकी लड़ाई पुलिस से नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ थी. उनकी राय में जब तक समाज में एक्सप्लोइटेशन बना रहेगा, तब तक लोग क्रांति की ओर कदम बढ़ाएंगे. इसलिए व्यवस्था को सुनिश्चित करना चाहिए कि नक्सलवाद की आवश्यकता ही न पड़े.

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उन्होंने यह भी खुलासा किया कि 2013 के बाद गढ़चिरोली में माओवादी संगठन में नई भर्ती नहीं हुई क्योंकि संगठन जनता से कट चुका था, जो अंत की ओर जाने का संकेत था.

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तेलंगाना के पेद्दापल्ली में ब्राह्मण परिवार में जन्मे भूपति ने इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट से पढ़ाई की और कभी चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने का सपना देखा था. लेकिन सामाजिक और पारिवारिक संघर्ष ने उन्हें छात्र राजनीति और फिर माओवादी आंदोलन की ओर मोड़ दिया.

उन्होंने साफ किया कि वे अपनी पॉलिटिकल आइडियोलॉजी नहीं छोड़ रहे, केवल हथियार त्याग रहे हैं. अब वे मुख्यधारा में रहकर देश की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को बेहतर समझना चाहते हैं. अंत में उन्होंने अपने माओवादी साथियों से भी अपील की कि वे हकीकत को स्वीकार कर हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौट आएं, ताकि समावेशी विकास की राह बन सके.

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