भिवंडी यह नाम सुनते ही कपड़ा इंडस्ट्री की याद आती है. यह शहर पूरे भारत के 35 प्रतिशत पावरलूम का घर है. यानी देश में जो कपड़ा बनता है उसका एक बड़ा हिस्सा यहीं से आता है. लेकिन अभी इस शहर का कपड़ा उद्योग बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है. वजह है पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में चल रहा युद्ध.
इस युद्ध की आग भले ही हजारों किलोमीटर दूर जल रही हो, लेकिन इसकी तपिश भिवंडी के बुनकरों और मजदूरों तक पहुंच गई है. कारखाने बंद हो रहे हैं, मजदूर गांव लौट रहे हैं और मालिक दिवालिया होने के कगार पर हैं. आइए पूरा मामला समझते हैं.
भिवंडी का कपड़ा उद्योग कितना बड़ा है?
भिवंडी महाराष्ट्र का एक शहर है जो मुंबई के पास है. यहां लाखों पावरलूम मशीनें चलती हैं जो कपड़ा बनाती हैं. पूरे भारत में जितने पावरलूम हैं उनका 35 प्रतिशत सिर्फ इसी शहर में है. यहां काम करने के लिए देशभर से मजदूर आते हैं. कपड़े के साथ-साथ इससे जुड़े और भी कई काम-धंधे चलते हैं जैसे धागे का काम, बीम बनाना और कपड़ा ढोना. यह पूरा एक बड़ा तंत्र है जिसमें लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है.
पश्चिम एशिया के युद्ध का भिवंडी से क्या कनेक्शन है?
यह समझना बहुत जरूरी है. कपड़ा बनाने में एक खास तरह का धागा इस्तेमाल होता है जिसे मानव निर्मित फाइबर यानी एमएमएफ कहते हैं. यह धागा कच्चे तेल से बनता है. पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं.
यह भी पढ़ें: ग्राउंड रिपोर्ट: मदरसन कंपनी की भिवाड़ी यूनिट में श्रमिकों का विरोध प्रदर्शन जारी, प्रशासन के प्रयास फेल
जब कच्चा तेल महंगा होता है तो उससे बनने वाला धागा भी महंगा हो जाता है. धागा महंगा होने से कपड़ा बनाने की लागत बढ़ जाती है. लेकिन कारखाना मालिक मजदूरों की मजदूरी नहीं बढ़ा पा रहे और न ही कपड़े के दाम उतने बढ़ा पा रहे. नतीजा यह है कि कारोबार घाटे में जा रहा है.
मजदूरों का क्या हाल है?
भिवंडी की असली तकलीफ मजदूरों की कहानी में दिखती है. AS एंटरप्राइजेज के मालिक सिराज और अयाज अंसारी ने बताया कि उनके यहां करीब 70 मजदूर थे, जिनमें से 50 प्रतिशत यानी आधे अपने गांव लौट चुके हैं. धागे की कीमत बढ़ी है लेकिन मजदूरी वही है, इसलिए काम चलाना मुश्किल हो गया है.
गौहर इस्लाम नाम के एक पावरलूम मालिक की स्थिति और भी बुरी है. उनके यहां छह मजदूर थे जिनमें से पांच गांव चले गए क्योंकि उनका यहां गुजारा नहीं हो रहा था. गौहर ने कारखाना बंद कर दिया है लेकिन फिर भी उनका खर्चा 35,000 रुपये महीने का है और आमदनी कुछ नहीं.
बीम का काम करने वाले ठेकेदार सादिक खान ने बताया कि उनके यहां 30 लोग काम करते थे जिनमें से 15 गांव चले गए और कुछ और जाने की तैयारी में हैं. एक बीम बनाने में करीब तीन घंटे लगते हैं और अब उसकी मांग भी कम हो गई है.
एक मजदूर की कहानी जो दिल हिला देती है
जितेंद्र कुमार नाम के एक मजदूर ने बताया कि उस दिन से टिफिन सर्विस बंद हो गई है और उन्होंने सुबह से कुछ नहीं खाया. उनके भाई आठ घंटे से LPG सिलिंडर की लाइन में खड़े हैं लेकिन पांच किलो का सिलिंडर भी नहीं मिला. और गांव जाना भी मुमकिन नहीं क्योंकि वहां भी कोई काम नहीं है.
LPG की किल्लत अलग समस्या बन गई
युद्ध की वजह से सिर्फ धागा ही नहीं, कमर्शियल LPG गैस की भी भारी कमी हो गई है. कारखानों और घरों दोनों जगह इसकी किल्लत है. मजदूरों के लिए खाना बनाना भी मुश्किल हो गया है.
यह समस्या सिर्फ भिवंडी में नहीं है
महाराष्ट्र सरकार की कपड़ा समिति के पूर्व सदस्य पुनित चिमासिया ने बताया कि सूरत में भी कपड़ा उद्योग सिर्फ आधे दिन काम कर रहा है. वहां विदेश से आए ऑर्डर रद्द हो गए हैं. हालात इतने बुरे हैं कि कारखाना मालिक मिलकर मजदूरों को खाना दे रहे हैं ताकि वे गांव न चले जाएं.
यह भी पढ़ें: 20,400 टन LPG लेकर कांडला पोर्ट पहुंचा जग विक्रम, सीजफायर के बाद पार किया था होर्मुज
भिवंडी के ही एक और लूम मालिक हिरेन नागड़ा ने कहा कि वे अब बस एक महीने और चल सकते हैं उसके बाद काम बंद करना पड़ेगा. सरोश फकीह नाम के लूम मालिक ने साफ कहा कि भिवंडी का कपड़ा उद्योग पूरी तरह बंद होने के कगार पर है.
नेताओं और उद्योग संगठनों ने क्या कहा?
भिवंडी पूर्व से समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख ने मांग की है कि राज्य सरकार कपड़ा उद्योग के लिए एक खास राहत पैकेज दे. उन्होंने कहा कि उद्योग पहले से ही बिजली के बढ़े हुए दामों से परेशान है और बुनकरों के संगठन ने बताया है कि सिर्फ एक महीने में चार हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. अगर सरकार ने दखल नहीं दिया तो बेरोजगारी बहुत बढ़ जाएगी.
मुस्तफा शेख